पूर्णता
कोई चाहता है
कि हम आगे बढ़ें
इसलिए वह रास्ते में
पत्थर रख देता है
कोई चाहता है
कि हम ऊँचा उठें
इसलिए वह पैरों में
बेड़ियाँ डाल देता है
कोई चाहता है
कि हम मुक्त हो जायें
इसलिए वह भीतर प्रेम जगा देता है
कोई चाहता है
हम पूर्ण विकसित हों
इसलिए वह पाहन, बेड़ियाँ, प्रेम
सब के साथ पूर्णता की चाह भी
भर देता है !!
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बहुत अच्छी, सचमुच बहुत ही अच्छी कविता है यह
जवाब देंहटाएंप्रोत्साहन हेतु स्वागत व आभार जितेंद्र जी!
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 11 मई, 2026
जवाब देंहटाएंको लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
बहुत बहुत आभार दिग्विजय जी!
हटाएंकितना प्यार करता है वो हमेशा और आपकी यह सुंदर कविता भी उतना ही प्यार करती है ।
जवाब देंहटाएंवाक़ई वह अनाम हमसे प्रेम करता है !! स्वागत व आभार प्रियंका जी!
हटाएंप्रेम में मुक्त होना, बहुत प्यारी बात है.
जवाब देंहटाएंकविता के मर्म को समझाती हुई सुंदर प्रतिक्रिया हेतु स्वागत व आभार!
हटाएंवाह! बहुत खूब! प्रेम में मुक्ति ..और क्या चाहिये..
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार शुभा जी!
हटाएंयही "चाह" ही है जो हर बेड़ी की काट है
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना ❤️
सही कहा है आपने, स्वागत व आभार!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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