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शनिवार, मई 9

पूर्णता

पूर्णता 


कोई चाहता है 

कि हम आगे बढ़ें 

इसलिए वह रास्ते में 

पत्थर रख देता है

कोई चाहता है

 कि हम ऊँचा उठें  

इसलिए वह पैरों में 

बेड़ियाँ डाल देता है 

कोई चाहता है 

कि हम मुक्त हो जायें 

इसलिए वह भीतर प्रेम जगा देता है 

कोई चाहता है 

हम पूर्ण विकसित हों 

इसलिए वह पाहन, बेड़ियाँ, प्रेम 

सब के साथ पूर्णता की चाह भी 

भर देता है !! 


 

गुरुवार, जून 29

खो जाता अनंत आकाश

खो जाता अनंत आकाश

ख्वाब मंजिलों के अंतर में
 पाहन बाँध पगों में चलते,
नील गगन में उड़ना चाहें
बँधी बेड़ियाँ खोल न पाते !

नजरें सदा क्षुद्र पर रहतीं
खो जाता अनंत आकाश,
घोर अँधेरे बसे हृदय में
ढूँढ़ रहा मन प्रखर प्रकाश !

सदा बँधी तट पर लंगर से
बरसों बरस नाव को खेते,
सुदूर कहीं प्रयाण न होता
गीत सदा उस तट के गाते !

छोटे-छोटे सुख की खातिर
कभी परम का दरस न होता,
जिसके कारण ही जीवन है
कण भर उसका परस न होता !