जीवन क्या है
कौन जानता, जीवन क्या है
श्वासों का आना-जाना है ?
जन्म से मृत्यु की घड़ियों में
स्वयं से प्रीत बढाना है ?
जग तो इक आईना ही है
जिसमें खुद की झलक मिल रही,
नए-नए रस्तों पर चल के
एक वही तस्वीर खिल रही !
तन साबुत रखने की खातिर
मन को मार रहा है कोई,
मन को उसका चैन दिलाने
खुद को हार रहा है कोई !
तन-मन से भी ऊब गया जो
भेद सृष्टि के पाना चाहे,
नींद, क्षुधा बिसरा के पल-पल
ज्ञान की जोत जलाना चाहे !
जीवन एक है तल अनेक हैं
सत्य सभी के जुदा यहाँ हैं,
महलों में कोई है उनींदा
फुटपाथों पर नींद जवां है !
अजब खेल है यह जीवन का
सभी यहाँ व्यस्त लगते हैं,
अंत में खाली जाते देखा
जाने क्या दिल में भरते हैं !