बुधवार, अगस्त 26
श्वासों की समिधा को
सोमवार, जुलाई 20
भीतर दीपक एक जला है
भीतर दीपक एक जला है
बना रहे जागरण ह्रदय में
धरा-गगन पावन बन जाते,
दें दृष्टि सम्मान की भीतर
ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते !
ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता
ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,
धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा
ऊर्जा स्रोत सहज पा लेती !
श्वासों के पुल पर ही मन का
राही आगे बढ़ता जाता,
शक्ति से पूरित हुईं श्वासें
भीतर रस्ता खुलता जाता
देह एक देवालय जिसमें
श्वास एक अर्चन सी चलती,
भीतर दीपक एक जला है
उस अनाम की पूजा होती !
श्वासें हैं वे तार अनोखे
जो पूर्ण ब्रह्मांड को जोड़ें
गूँज रहा अस्तित्त्व निरंतर
श्वासों को सजग हुए छोड़ें !
बुधवार, जुलाई 15
अथ योगानुशासनम्
अथ योगानुशासनम्
अनुशासन यदि नहीं सधा तो
सब संकल्प हवा ही होंगे,
संदेहों को दूर करे यह
धैर्य और साहस पनपेंगे !
हर गति इक दर्पण बन जाती
हर श्वास झलकती है उसमें,
तन का आसन मन में ढलता
मन ही भाग्य विधाता जग में !
बाहर का अनुशासन भीतर
तालमेल बन कर मिलता है,
खुले नयन से जग को देखें
ध्यान ज्ञान बन कर खिलता है !
हर श्वास में भरा हो साहस
हर निःश्वास हरे संदेह,
अग्नि जलेगी तीव्र तभी जब
होंगी विशुद्ध श्वासें व देह !
इड़ा, पिंगला में जब बहती
हो अबाधित श्वास की धारा,
सुषुम्ना स्वत: जाग ही जाती
संग बढ़ती ज्ञान की धारा !
स्थिरता से ऊर्जा बढ़ जाये
संघर्षों से कम हो जाती,
झुकते नहीं युद्ध में योद्धा
संतुलन से शक्ति ही बढ़ती !
देह जितनी लचीली होगी
मन भी उतनी शीघ्र झुकेगा,
किया समर्पण जब दोनों ने
भीतर का सामर्थ्य बढ़ेगा !
देह, श्वास, मन तीनों मिलकर
देवालय ह्रदय में बनाते
शुद्ध हुए वे निज प्रयत्न से
आत्मा को उसमें बैठाते !
गुरुवार, अक्टूबर 30
वही थाम लेता राहों में
वही थाम लेता राहों में
कोई लिखवा जाता है ज्यों
जहाँ कलम, कागज सम्मुख है,
अक्षर भरते से जाते हैं
मौन सदा, जो जगत प्रमुख है !
वही शब्द है वही अर्थ भी
वही गीत प्राणों में भरता,
वही श्वास बन आता जाता
वही स्वयं से जोड़े रखता !
जिसके होने से ही हम हैं
एक पुलक बन तन में दौड़े,
वही थाम लेता राहों में
व्यर्थ कहीं जब मन यह दौड़े !
होकर भी ना होना जाने
उसके ही हैं हम दीवाने,
जिसे भुला के जग रोता है
याद करें हम लिखें तराने !
जो भी उसकी याद दिलाये
वही गुरू सम पूजा जाये,
सपनों की अब कौन सुने? जब
नींदों को ही हर ले जाये !
सोमवार, मई 26
बुधवार, जून 26
प्रेम
प्रेम
बाँटने से बढ़ता है प्रेम
भीतर भरा है प्रेम का जो स्रोत
उसे लुटाने का
अवसर ही जीवन है
बन जाता तब तुम्हारा मन
ईश्वर का आँगन है
वही बहता है शिराओं में रक्त बनकर
वही श्वास के साथ फेरा लगाता है
उसकी याद में बहाया एक-एक अश्रु
महासागरों की गहराई भर जाता है
प्रेम कोई शब्द नहीं
न ही भाव या भावना कोरी
नहीं कृत्य या चाहत कोई
यह तुम हो
तुम्हारे होने का प्रमाण है
यही तो धरा को धारने वाला आसमान है
प्रेम श्रद्धा और विश्वास है
किसी को कुछ देने की आस है
हज़ार ख़ुशियों के फूल उगाने वाली बेल है
प्रेम बना देता हर आपद को खेल है
इसकी एक किरण भी उतर जाये मन में
बिखेर देना किसी महादानी की तरह
प्रेम में होना ही तो होना है
यही बीज दिन-रात मनु को बोना है !
सोमवार, दिसंबर 18
इक लहर उठी श्वासों की
इक लहर उठी श्वासों की
हुई जागृत रग-रग तन की,
रेशा-रेशा लहराया
मन की हर विस्मृति टूटी !
मन ह्रदय पतंग हो उठा,
तोड़ सभी तन के बंधन
चिदाकाश में उड़ा किया !
मानस धवल हंसा हुआ,
मृदु भावों के सरवर में
वह अनवरत तिरता रहा !
घिस-घिस कर चमकाया मन
जाग उठा चिन्मय झिलमिल
झलकाये अंतर दर्पण !
जब मानस की धारा पर,
परम अनंत की खोज में
चल पड़ा ह्रदय यायावर !
हुआ नूर भीतर-बाहर,
मन माणिक जगमगाया
अकम्पित उजली लौ पर !
शुभ सुमनों से ओंउम् के,
प्रियतम की खोज में मनस
ले चला थाम हाथों में !
हवन कुंड मन-अंतर में ,
परम सत्य तब प्रकट हुआ
ओंउम्.. ओंउम्... ओंउम्.. में !
बुधवार, अप्रैल 19
श्वास-श्वास में सिमरन हो जब
श्वास-श्वास में सिमरन हो जब
श्वासों में मत भरें सिसकियाँ
हैं सीमित उपहार किसी का,
दीर्घ, अकंपित अविरत गति हो
इनमें कोई राज है छुपा !
श्वास-श्वास में सिमरन हो जब
वाणी में इक दिन छलकेगा,
मन को बाँधे ऐसी डोरी
श्वासों से ही मधु बरसेगा !
श्वासों का आयाम बढ़े जब
सारा विश्व समाता इनमें,
एक ऊर्जा है अनंत जो
ज्योति वह प्रदाता जिसमें !
श्वासों की माला पहनी है
भरे सुगंधि मधुराधिपति की,
इनकी गहराई में जाकर
द्युति निहारें हृदय मोती की !
शुक्रवार, नवंबर 11
अब तो इक ही धुन बजती है
अब तो इक ही धुन बजती है
अब जब तुम हो साथ हमारे
खोज रहे तब भला किसे हम,
श्वासों में हो, प्राणों में तुम
ढूँढे भला किसे नादां मन !
वाणी मुखर नहीं अब रहती
सिमट शब्द ज्यों भीतर सोए,
निशदिन उस का साथ मिला है
जिसे पुकारा करते थे वे !
यूँही समय बिताने ख़ातिर
आँख मिचौली खेल रहे थे,
ढूँढने का बहाना करते
तुम तो सारा वक्त यहीं थे !
कैसे कहें तुम्हारी बातें
बढ़ा गयी थीं दिल की धड़कन,
जब आँखों में फूल खिले थे
कैसे दें उस पल का विवरण!
कोई बोध नहीं पाया है
किया न कोई कर्म अनूठा,
कैसे साधें भक्ति भला जब
पृथक नहीं तुमको जाना है !
दुःख बिसराया सुख भी छूटा
अब तो इक ही धुन बजती है,
तुम हो, जग है, नयन देखते
पल-पल यह धरती सजती है !
एक लगन भीतर जागी थी
जिसने अब अधिकार किया है,
उसे छुड़ाया जो पकड़ा था
केवल अजर दुलार दिया है !
मंगलवार, अक्टूबर 11
यज्ञ भीतर चल रहा है
यज्ञ भीतर चल रहा है
श्वास समिधा बन सँवरती
प्रीत जगती की सुलगती,
मोह कितना छल रहा था
सहज सुख अब पल रहा है !
मंत्र भी गूजें अहर्निश
ज्योति माला है समर्पित,
कामना ज्वर जल रहा था
अहम मिथ्या गल रहा है !
अनवरत यह यज्ञ चलता
प्राण दीपक नित्य जलता,
पास न कुछ हल रहा था
उम्र सूरज ढल रहा है !
खोजता था मन युगों से
छला गया स्वर्ण मृगों से,
व्यर्थ भीतर मल रहा था
परम सत्य पल रहा है !
चाह थी नीले गगन की
मृत्यू देखी हर सपन की,
स्नेह घृत भी डल रहा था
द्वैत अब तो खल रहा है !
सोमवार, अप्रैल 18
चाँद बनकर
चाँद बनकर
मैंने चाँद बनकर धरा को देखा
लहू से सराबोर
लोगों को झूमते गाते देखा
संग बहते हुए हवाओं के
इक बूँद श्वास के लिए तरसते देखा
अनंत रिक्तता में छा गया था वजूद मेरा
चंद चीजों के लिए बिलखते देखा
वह जो उड़ सकता था पल में
जमीं से फलक तक
धीमे-धीमे से उसे सरकते देखा
मैं ही मालिक था चाँद तारों का
चंद सिक्कों के लिए झगड़ते देखा
जला सूरज सा कोई दिन-रात सदा
भय से अंधेरों में किसी को सिसकते देखा !
बुधवार, मार्च 30
जीवन मधुरिम काव्य परम का
जीवन मधुरिम काव्य परम का
फिरे सहज श्वासों की माला
हम भाव सुगंध बनें,
जीवन मधुरिम काव्य परम का
इक सरस प्रबंध बनें !
जगती के इस महायज्ञ में
आहुतियाँ अपनी हों,
निशदिन बंटता परम उजास
मेधा शक्ति ज्योति हो !
शब्द गूँजते कण-कण में नित
बाँचें ज्ञान ऋचाएं,
चेतन हो हर मन सुन जिसको
गीत वही गुंजायें !
शुभता का ही वरण सदा हो
सतत जागरण ऐसा,
अधरों पर मुस्कान खिला दें
हटें आवरण मिथ्या !
उसकी क्षमता है अपार फिर
क्यों संदेह जगाएं,
त्याग अहंता उन हाथों की
कठपुतली बन जाएँ !
.jpg)
.jpg)
.jpg)




.jpeg)
