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शनिवार, जनवरी 4

अब तो कुछ बात हो

अब तो कुछ बात हो


फूलों से बात करें, बिछौना बने घास
डालियों के साथ झूमें, निहारें आस-पास

चाँद संग होड़ लगे, चाँदनी संग हम भी जगें
सो लिए बरसों बरस, अब तो प्रमाद छंटे

जीवन को मांग लें, अनकही प्रीत को
सीख लें कुदरत से, बंटने की रीत को

स्वप्नों को तोड़ दें, सच से मुलाकात हो
भरमाते उम्र बीती, अब तो कुछ बात हो

आँखों में डाल आँखें, खुद से भी मिलें कभी
होना ही काफी है, बन न कुछ पाए कभी

होकर ही जानेंगे, कुदरत का हैं हिस्सा
जाने कब आँख मुँदे, बन जाएँगे किस्सा


शुक्रवार, जून 22

जाने कब फिर मिलना हो


जाने कब फिर मिलना हो


कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें
कलियों का कब खिलना हो
जाने कब फिर मिलना हो !

चंद श्वास लेकर आये थे
कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,
कहीं अधूरा न रह जाये
किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !

तुम झाँकों मेरे नयनों में
फुरसत ऐसी कल ना हो,  
जाने कब फिर मिलना हो !

कितने संगी चले जा चुके
अभिनय करते थके थे शायद,
मंच कभी खाली न हुआ यह
स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

पलकों को न बंद करो तुम
जाने किस पल चलना हो
 जाने कब फिर मिलना हो !

जितना साथ मिला सुंदर था
इक-दूजे में झलक भी पायी,
स्वप्नों में वह छिपी न रहती
जग कहता है जिसे खुदाई !

हाथ थाम लो पल भर को तुम
अधरों का कब सिलना हो
जाने  कब फिर मिलना हो !