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शुक्रवार, दिसंबर 14

घाटियाँ जब खिलखिलायीं


घाटियाँ जब खिलखिलायीं

बह रही थी नदी उर की
बने पत्थर हम अड़े थे,
सामने ही था समुन्दर
नजर फेरे ही खड़े थे !

गा रहा था जब कन्हैया
बांसुरी की धुन सुनी ना,
घाटियाँ जब खिलखिलायीं
राह भी उनकी चुनी ना !

भीगता था जब चमन यह
बंद कमरों में छिपे थे,
चाँद पूनो का बुलाता
नयन स्वप्नों से भरे थे !

सुख पवन शीतल बही जब
चाहतों की तपिश उर में,
स्नेह करुणा वह लुटाता
मांगते थे मन्दिरों में !

आज टूटा भरम सारा
झूमती हर इक दिशा है,
एक से ही नूर बरसे
प्रातः हो चाहे निशा है !
 


मंगलवार, फ़रवरी 24

पंख बिन ही उड़ रहा है

पंख बिन ही उड़ रहा है



मिट गया चुपचाप भू में
खिल उठा वह ही गगन में,
गंध बन कर डोलता भी
मुस्कुराता है चमन में !

हट गया चुपचाप मग से
घट भरा वह ही मिलन से,
पंख बिन ही उड़ रहा है
प्रीत की सोंधी लगन से !

खो गया जो व्यर्थ ही था
पा लिया इक अर्थ सुंदर,
झर गया ज्यों जीर्ण जर्जर
नव मिला तब लक्ष्य मनहर !