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बुधवार, अप्रैल 15

उतर आये हैं वे सड़कों पर


 उतर आये हैं वे सड़कों पर 


छा गयी  है जैसे भय की इक विशाल बदली 
आस का सूरज कहीं नजर नहीं आता  
अनिश्चितता के इस वातावरण में 
आशंकाओं के दंश चुभते ही जाते हैं 
खाली हाथ, क्षुधा से पीड़ित, मनों में चिंता 
मजदूरों की रोजी ही नहीं  छिनी 
छिना है उनके जीवन का आधार 
उनका आत्मसमान, 
अपने हाथों से कमा कर खाने का सुख
उनके सपने 
परिवार के स्नेह से वंचित परदेस में
वे जी रहे थे जिस श्रम के बलबूते 
वही छिन गया है...
उनके जीवन का 
सहज मार्ग ही जैसे छूट गया है !
मजबूर होकर ही शायद 
वे उतर आये हैं सड़कों पर 
मिलकर उन्हें थामना होगा 
इससे पहले कि वे धैर्य छोड़ दें 
मालिक मजदूर का नाता तोड़ दें 
उनका देय उन्हें देना होगा  
झाँकना होगा उनके मनों में 
भीतर जितनी आशंका होगी 
बाहर उतनी दूरी बढ़ेगी 
उन्हें बताना होगा, यह लड़ाई लंबी है 
बदले हुए हालात में वे भी एक सैनिक हैं 
उन्हें सहन होगा यह दर्द 
जीवन के लिए, देश के लिए 
परिवर्तन आएगा, इतना तो तय है !


गुरुवार, अप्रैल 21

अर्थवान मन

अर्थवान मन

समेट ले सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर
या ‘न कुछ’ हो जाये
मन तभी अर्थवान होता है
वरना तो बस परेशान होता है
कभी इस बात से चिढ़ता कभी
उस बात से हैरान होता है
कल्पनाशील है सो दुःस्वप्न जगाता है
चिंता के झाड़ खड़े कर इर्दगिर्द
स्वयं को उनसे घिरा पाता है
लड़ता कभी औरों को लड़वाता है
जो बन सकता था फुहार शांति की
तपकर खाक हुआ जाता है
प्रीत का जो झरना भीतर कैद है
बनकर चट्टान उसके मुहाने पर बैठ जाता है
जुड़ा ही था जो अस्तित्त्व से सदा
उसे तोड़कर स्वयं को ही घायल बनाता है
कौन समझाये उसे जो ज्ञान की खान है खुद ही
पर नजरें सदा औरों पर गड़ाता है
सिमट आये अनंत जिसके आंचल में
वह एक कतरे के लिए आँसू बहाता है ! 

सोमवार, जुलाई 22

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आप सभी को शुभकामनायें

गुरु पूर्णिमा 

सदगुरु दूत खुदा का न्यारा
उसकी ओर ही करे इशारा I

जग को रब की खबर सुनाये
उस जैसा ही नेह लुटाए I

एक यही लाया पैगाम
कण-कण में व्यापा है राम I

साक्षी है वह परम ब्रह्म का
राज खोलता सृष्टि भ्रम का I

सदगुरु जीवन का संगीत
पोर-पोर से गाये गीत I

सबका पल पल रखता ध्यान
सदा सभी को अपना मान I

सदगुरु दूर करे अज्ञान
प्रेम भरे मिटा अभिमान I

सदगुरु शिखरों पर ले जाये
मन को सुंदर पंख लगाये I

जैसे एक अलौकिक घटना
सदगुरु सुंदर सच्चा सपना I

दूर करे हर चिंता मन की

पकड़ा दे मस्ती जीवन की I

शुक्रवार, सितंबर 7

तू अंतर को प्रेम से भर ले



तू अंतर को प्रेम से भर ले

व्यर्थ ही तू क्यों चिंता करता
तेरे लिए तो मैं हूँ ना,
तू अंतर को प्रेम से भर ले
कुछ अप्राप्य रहेगा ना !

तुम हम फिर मिलकर डोलेंगे
उलझन में तू क्यों भ्रमता है,
मन जो गोकुल बन सकता था
क्यों उदास सा तकता है !

तू है मेरा प्रियतम अर्जुन !
वंचित क्यों है परम प्रेम से,
क्या जग में जो पा न सकता
जग चलता है यह प्रेम से !

सब कुछ सौंप दिया है तुझको
अगन, पवन, जल और धरा में,
किस आकर्षण में बंध कर तू
डोले सुख-दुःख, मरण-जरा में !

करुणा सदा बरसती सब पर
बस तू मन को पात्र बना ले,
जीवन बन जायेगा मंदिर
दिवस-रात्रि का गान बना ले !