नई भोर
फिर भोर हुई
फिर कदम उठे
फिर अंतर उल्लास जगा
रस्तों पर हलचल मन के
बीता पल जिसमें तमस घना
फिर आशा खग ने पर तोले
उर प्रीत भरी वाणी बोले
लख जग भीगा अंतरमन
प्राणों में नव संचार भरे
कुसुमों ने फिर महकाया वन
पलक झपकते कहीं खो गयी
घोर निशा का हुआ अंत
भीतर लेकर कुछ लक्ष्य नये
नई भोर आयी जीवन में
उर आतुर करने को स्वागत
जाने क्या लाया है आगत
