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बुधवार, अगस्त 9

कुछ दोहे


कुछ दोहे


वाणी से साथी बनें, वाणी अरि बनाये 

वाणी अगर कठोर है,मनस सुख ले जाये 


वाणी के सायक चलें, कुछ भी रहे न शेष 

अभी-अभी जो राग था, बन जाता है द्वेष 


वाणी का आदर करें, करें न इससे चोट 

अपने जन ही ग़ैर बन, व्यर्थ निकालें खोट 


वाणी जोड़े दिलों को, सुख का है आधार 

वाणी ही संबल बने, बन जाती है प्यार 


वाणी इक वरदान है, देवी की है देन

सम्मान इसका रखें, येन, केन, प्रकारेण


शनिवार, जुलाई 17

ध्यान


ध्यान 

जब हम बोलते हैं 

भीतर या बाहर

तो दूसरा रहता  है 

जब चुप रहते हैं 

तो कोई दूसरा नहीं होता 

एक हो जाती है सारी कायनात 

जब घटता है मौन

भीतर या बाहर

फिर जहाँ न राग रह  जाता है न द्वेष 

न सुख और न ही दुःख 

जहाँ खुद से मिलना होता है 

और मृत्यु का भय भी खो जाता है 

उस मौन को पा लेना ही ध्यान है 

यही स्रोत है जीवन का 

शायद यहीं रहते भगवान हैं !


रविवार, जून 9

गंध और सुगंध




गंध और सुगंध

जब मन द्वेष के धुंए से भर जाये
या भीतर कोई चाह जगे
अपने को खोजने की थोड़ी कोशिश करें
यह गंध कहाँ से आ रही है ?
दबी होगी कहीं कोई दुर्वासना
किसी प्रतिशोध की भावना
कोई अपमान जो चुभा हो गहरे कभी
सारी गंधें वहीं जन्म लेती हैं
जब नहीं रहेगी कोई आकांक्षा
हार और जीत की कामना
मिट जाएगी हर उलझन
खिल जायेंगे ध्यान के सुमन
और तब नहीं पूछना होगा
 यह सुगंध कहाँ से आ रही है ?