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शुक्रवार, दिसंबर 7

अपने जैसा मीत खोजता




अपने जैसा मीत खोजता


ओस कणों से प्यास बुझाते,
जगती के दीवाने देखे,
चकाचौंध पर मिटने वाले
बस नादां परवाने देखे !

जो है, वही उन्हें होना है
अपने जैसा मीत खोजते,
घर है, वहीं उन्हें बसना है
वीरानों में रहे भटकते !

बदल रहा है पल-पल जीवन
जिसमें थिरता कभी न मिलती,
बांट रहा है किरणें सूरज
दिल की लेकिन कली न खिलती !

घुला-मिला सा खारापन ज्यों
तप कर निर्मल नीर त्याग दे,
छुप कर बैठा निजता में ‘पर’
वैरागी वह मिटा राग दे !

 गीत सुरीला गूँज रहा है
कोई चातक श्रवण लगाए,
मतवाला ढूंढें न मिलता
उर में पावन प्रीत जगाए !


मंगलवार, नवंबर 27

स्वर्ण रश्मियों सा छू लेता




स्वर्ण रश्मियों सा छू लेता



माँ शिशु को आँचल में छुपाती
आपद मुक्त बनाती राहें,
या समर्थ हथेलियाँ पिता की
थामें उसकी नन्हीं बाहें !

वैसे ही सिमटाये अपने
आश्रय में कोई अनजाना,
उस अपने को, जिसने उसकी
चाहत को ही निज सुख माना ! 

अपनाते ही उसको पल में 
बंध जाती है अविरत डोर,
वंचित रहे अपार नेह से
 जो मुख न मोड़े उसकी ओर !

जो बेशर्त बरसता निशदिन 
निर्मल जल धार की मानिंद,
स्वर्ण रश्मियों सा छू लेता
अमल पंखुरियों को सानंद !

कर हजार फैले चहूँ ओर
थामे हैं हर दिशा-दिशा से,
दृष्टिगोचर कहीं ना होता
पर जीवन का अर्थ उसी से !

सोमवार, मार्च 31

बन जाये मन स्वयं उजास

बन जाये मन स्वयं उजास




झर जाता है कुम्हलाया पुष्प
 धरा पर आहिस्ता से जैसे
बिखर जाती है पाँखुरी-पाँखुरी
सहजता से विलग हो डाली से
पिघल जाये वैसे ही सारी उदासी
मन रहे निर्मल.. पल पल..
यही प्रार्थना है !

हर बादल बरस जाता है जैसे
निज भार से हो पीड़ित
बिखर जाती है बूँद बूँद
सहजता से धरा पर
खो जाये हर छोटी बड़ी कामना
 खिला रहे मन का आकाश..
निरभ्र नील वितान सा
यही अर्चना है !

उजाला भर जाता है जैसे
नन्हा सा एक दीया..
जल जाये दुःख के तेल में
बाती अहंकार की
बन जाये मन स्वयं उजास
यही वन्दना है !



मंगलवार, मार्च 4

आना वसंत का

आना वसंत का

जब नहीं रह जाती शेष कोई आशा
 निराशा के भी पंख कट जाते हैं तत्क्ष्ण !
जब नहीं रह जाती ‘मैं’ की धूमिल सी छाया भी
उसकी झलक मिलने लगती है उसी क्षण
निर्भर, निर्मल वितान सा जब फ़ैल जाता है
मन का कैनवास
 प्रेम के रंग बिखेर जाता है कोई अदृश्य हाथ
माँ की तरह साया बन कर चेताती चलती है
छंद मयी हो जाती है कायनात !
छूट जाते हैं जब सारे आधार
तब ही भीतर कोई कली खिलती है
बज उठते हैं मृदंग और साज
जुड़ जाते हैं जाने किससे अंतर के तार !
जब पक जाता है ध्यान का फल भी
झर जाता है जन्मों का पतझड़
और उतर आता है चिर वसंत जीवन में !



गुरुवार, मार्च 14

पांखुरी-पांखुरी मन खिलता है


पांखुरी-पांखुरी मन खिलता है


एक निर्झरी सी भावों की
जाने कहाँ से फूटी भीतर,
हटा पत्थरों की सीमा को
उमड़े ज्यों जलधार निरंतर !

जाने कहाँ छिपा रखा था
पाहन सा दिल भारी तो था,
जाने किसकी करे प्रतीक्षा
आखिर एक पुजारी तो था !

आज उमड़ ही आया अभिनव
इक सैलाब विमल अविरल सा
डूबे जिसमें संशय सारे
ज्यों संगम का तट निर्मल सा !

मीलों तक अब बिछा मोद है
सहज हुआ हर पल मिलता है,
जैसे नभ में तिरते पंछी
पांखुरी-पांखुरी मन खिलता है !

एक ही जीवन, एक ऊर्जा
विष भी वही, वही है अमृत,
मिल जाती पगडंडी सच की
नहीं सुहाए जिसको अनृत !