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मंगलवार, दिसंबर 17

मन से कुछ बातें

मन से कुछ बातें



मन ! निज गहराई में पा लो, 

एक विशुद्ध हँसी का कोना 

 बरबस नजर प्यार की डालो 

बहुत हुआ अब रोना-धोना !


किस अभाव का रोना रोते 

 उपज पूर्ण से नित्य पूर्ण हो, 

 सदा संजोते किस कमी को

खुद अनंत शक्ति का पुंज हो !


स्वयं ‘ध्यान’ तुम ‘ध्यान’ चाहते 

लोगों का कुछ ‘ध्यान’ बँटाकर 

निज ताक़त को भुला दिया है 

इधर-उधर से माँग-माँग कर !


आख़िर कब तक झुठलाओगे 

अपनी महिमा के पर्वत को, 

नज़र उठाकर ऊपर देखो 

उत्तंग शिखर छूता नभ को !


रोज-रोज का वही पुराना 

छोड़ो भी अब राग बजाना, 

कृष्ण बने सारथी तुम्हारे 

कैसे  कोई चले  बहाना !




सोमवार, दिसंबर 18

इक लहर उठी श्वासों की



 इक लहर उठी श्वासों की

ओउम् की पुकार उठी 
हुई जागृत रग-रग तन की,
रेशा-रेशा लहराया
मन की हर विस्मृति टूटी !
  
उड़ चली डोर श्वासों की
मन ह्रदय पतंग हो उठा,
तोड़ सभी तन के बंधन  
  चिदाकाश में उड़ा किया !

इक लहर उठी श्वासों की
मानस धवल  हंसा हुआ,
 मृदु भावों के सरवर में
वह अनवरत तिरता रहा !

 इक पटल बना श्वासों का 
घिस-घिस कर चमकाया मन
जाग उठा चिन्मय झिलमिल 
  झलकाये अंतर दर्पण  !

 पुल बना सहज श्वासों का
जब मानस की धारा पर,
परम अनंत की खोज में
चल पड़ा ह्रदय  यायावर !
 
दीप जलाया श्वासों का
हुआ नूर भीतर-बाहर,
मन माणिक जगमगाया
अकम्पित उजली लौ पर  !

माला गुंथी श्वासों की
 शुभ सुमनों से ओंउम् के,
 प्रियतम की खोज में मनस
 ले  चला थाम हाथों में  !

डाली समिधा श्वासों की 
 हवन कुंड मन-अंतर में , 
परम सत्य तब प्रकट हुआ
ओंउम्.. ओंउम्... ओंउम्.. में !


गुरुवार, फ़रवरी 9

जिसने भी पहचाना सच को




जिसने भी पहचाना सच को  

मानस हंस ध्यान के मोती 
चुन-चुन कर नित पुलकित होता, 
सुमिरन की डोरी में जिसको 
अंतर मन लख, निरख पिरोता !

मुस्कानों में छलक उठेगी  
सच्चे मोती की शुभ आभा, 
जिसने भी पहचाना सच को  
दुनिया में है वही सुभागा !

ध्यान बिना अंतर मरुथल सम  
मन पंछी भी फिरे उदासा,
रस की भीनी धार बहेगी  
वह लेकिन प्यासा का प्यासा !

कोई भीतर डुबकी मारे 
छू भी लेता बस उस घट को, 
अमीय छलके जहाँ  निरन्तर 
खोले जब उर घूँघट पट को !

ध्यान बरसता कोमल रस सा 
कण-कण काया का भी हुलसे, 
खोजें इक सागर गहरा सा 
व्यर्थ त्रिविध आतप  में झुलसें !

तृप्त हुआ जब मन का सुग्गा 
केवल इक ही नाम रटेगा, 
कृत-कृत्य हो जगत में डोले 
जैसे मन्द समीर बहेगा !

या सुवास बनकर  फैलेगा  
जगती के इस सूनेपन में, 
शब्द सहज झरेंगे जैसे 
पारिजात झरते  उपवन में !

रविवार, सितंबर 11

रविवार की सुबह सुहानी


आजकल महानगरों में अक्सर ऐसा होता है कि एक ही शहर में रहने वाले पुत्र-पुत्रियाँ केवल छुट्टी के दिन माता-पिता से मिलने आ पाते हैं। काम का इतना बोझ होता है उन पर कि सुबह से शाम तक कम्प्यूटर की स्क्रीन के आगे बैठना पड़ता है।


रविवार  की सुबह सुहानी 

 

लघु फ़्लैट के वातावरण से 

खुली हवा में साथ प्रकृति के 

दिल खोल विश्राम करो फिर 

मुक्त हृदय से दौड़ लगाओ, 

 

रविवार  की सुबह सुहानी 

बुला रही है घर को आओ !

 

 कर्मयोगी आधुनिक युग के 

कह सकते हैं जिन्हें तपस्वी, 

 न खाने की सुध न निद्रा का

 निश्चित रहा समय है कोई !

 

व्यायामों की बात दूर है 

कठिन है सुबह-शाम टहलना, 

 सब सुख छोड़ नौकरी ख़ातिर

ऑन  लाइन  नाते निभाना  !

 

आज करो कुछ दिल की बातें 

गहराई से ध्यान लगाओ, 

लंबी तानो सिट  आउट में   

या फिर कोई खेल जमाओ !

 

इतवार की सुबह सुहानी 

बुला रही है घर आ जाओ !

 

एक शर्त है उसे मानना 

रख  के सारी चिंता आना, 

लैप टॉप के साथ ही सारी

डेड लाइन वहीं रख आना !

 

कुछ घंटे तो अपनी ख़ातिर 

जीने के हित आज बचाओ,

घर का बना हुआ भोजन है 

लेकर स्वाद मज़े से खाओ ! 

 

भानुवार की सुबह सुहानी 

बुला रही है घर आ जाओ !


मंगलवार, अगस्त 24

थिर शांत झील में

थिर शांत झील में 


दूर कहीं जाना नहीं 

निज गाँव आना है 

संसृति को निहारा 

ध्यान अब जगाना है 

खुद को बचाया सदा 

जीवन के खेल में 

भेद सभी खुल गये  

खुद को मिटाना है 

भोर सदा से जहाँ 

मधू ऋतु खिली रहे 

भावों के लोक से 

गुजर वहाँ जाना है 

भ्रम की दीवार गिरे 

पुनः आर-पार दिखे 

सधे होश कदम उठे 

राग मिलन गाना है 

युगों युग बीत गए 

चक्रव्यूह में घिरे 

तोड़ हर राग-द्वेष 

पाना ठिकाना है 

रहा सदा से वहीँ 

सूत भर हिला नहीं 

थिर शांत झील में 

चाँद को समाना है 

दूर नहीं जाना कहीं

निज गाँव आना है 


 

मंगलवार, दिसंबर 15

ध्यान में

ध्यान में 
 ज्यों बेदखल कर देता है 
कोई पिता नाकारा संतति को 
अपनी वसीयत से 
कई बार समझाने पर  
राह पर न आना चाहे जो 
वैसे ही नादां मन जब तक नहीं किया जाता बेदखल 
चैन नहीं मिलता पल भर 
अतीत की स्मृतियों को उभारेगा
नए-नए सुझाव और विचार देगा उन्नति के 
पूर्वाग्रहों और धारणाओं से बाँधना चाहेगा 
ऊँच-नीच समझाएगा 
वैसे जैसे पुत्र रोयेगा -गिड़गिड़ायेगा 
 कठोर होना पड़ता है पिता को 
ऐसे ही झटक देना होगा विवेक से 
और स्वयं में पूर्णतया का अनुभव कर
 अपनी ही गरिमा में ठहरना सीखना होगा 
मन तो बच्चा है लाख समझाओ 
वही उसकी फितरत है 
वह बड़ा होना नहीं चाहता !
 

रविवार, सितंबर 13

पंत


 पंत

प्रकृति के, सुकुमार कवि 

घुंघराले केश सजे आनन पर, 

वाणी मधुर, कोमल छवि 

कविता फूटी स्वतः झर-झर !

प्रकृति के सुंदर चितेरे 

नामकरण स्वयं का किया, 

फूलों, वृक्षों से गहरे नाते  

बचपन से ही काव्य रचा !

घर में छोटे, बड़े दुलारे 

सुंदर वस्त्रों का आकर्षण, 

किन्तु सदा वैरागी था मन

साधु-सन्तों का संग किया 

घँटों ध्यान साधना करते, 

उस अखण्ड अविनाशी से व

लौ लगाई उसके जग से 

जिसने जो माँगा, सहर्ष दिया 

भिक्षु हो या मित्र, संबन्धी 

अपना हो या दूर का परिचित, 

कभी भेद न करते तिलभर 

बापू को आराध्य बनाया 

अरविन्द से मिली शांति चिरन्तन, 

महादेवी, निराला, दिनकर का

 साथ मिला, मित्र थे बच्चन !

कला-विज्ञान, मेल हो कैसे 

करते रहे सदा समन्वय, 

अकुलाया था अंतर, लख कर

ग्रामीणों का जीवन दुखमय !

स्त्री रूप में लख प्रकृति को 

नारी को सम्मान दिया, 

रूप-भाव दोनों का ही 

उर अंतर से अनुभव किया  ! 


बुधवार, जून 24

योगी

योगी 

प्रमाद की नींद पर 
कभी सुदिन खड़ा नहीं होता 
यह सही है, जब जाग जाए मन 
तभी उसके लिए सवेरा होता !

वे  विलग हैं,अनोखे हैं 
 स्वार्थ उन्हें नहीं चलाता
उनकी ऊर्जा का स्रोत अहंकार से नहीं 
परमात्मा से है आता !

भय से भाग खड़े हों
या क्रोध से करें सामना 
यह सामान्य जन करते होंगे 
विपदा आने पर, 
वे योगारूढ़ हो 
शांत मन से करते हैं मुकाबला 
भीतर ठहर कर !

न लाभ की चिंता है उन्हें 
लोभ नहीं डुलाता
निमित्त बने हैं किसी के, कर्ता वही है 
 उसका काम करना भाता !

ध्यान और समर्पण की गंगा 
जहाँ दिन-रात बहती है, 
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के पीछे 
तुरीया स्वतः ही रहस्य खोल देती है !
अँधेरे में जग जल रहा हो 
जब अज्ञान के हाथों 
ज्ञान की आँख ही उसको 
बचा सकती है !  

बुधवार, मई 6

लॉक डाउन में ढील

लॉक डाउन में ढील


ग्रीन, रेड और ऑरेंज जोंस में 
अब  बंट गए हैं लोग 
लगता है, विभाजन ही मानव की नियति है 
ग्रीन में आजादी अधिक है 
जिंदगी पूर्ववत होने का आभास दे रही है 
अति उत्साह में लोग भूल जाते हैं 
चेहरे पर मास्क लगाना 
और दो गज की दूरी बनाये रखना 
वे इस तरह बाहर निकल आये हैं 
जैसे पिंजरों से पंछी 
सब्जी-फल की दुकानों से ज्यादा 
लगी हैं लंबी-लंबी कतारें 
उन दुकानों पर, 
जहाँ मस्ती और चैन के नाम पर 
जहर बिकता है 
पर नशे का व्यसन उन्हें विवश करता है 
अथवा वे डूब जाना चाहते हैं 
जीवन की वास्तविकताओं को भुलाकर 
किसी ऐसे लोक में 
जहाँ न नौकरी जाने का गम है 
न कोरोना से ग्रस्त हो जाने का 
वे चैन की नींद सो सकेंगे चंद घण्टे शायद बेहोशी में 
काश ! कोई उन्हें बताये 
एक चैन और भी है, जो बेहोशी में नहीं 
होश में मिलता है 
जिसे पाकर ही दिल का कमल पूरी तरह खिलता है 
जहाँ टूट जाती हैं सारी सीमाएं 
मन उलझनों से पार... खुद से भी दूर लगता है 
यह अनोखा नशा ध्यान का 
ऊर्जा से भरता है 
और यह बिन मोल ही मिलता है !


सोमवार, फ़रवरी 3

पारिजात हों उपवन में

पारिजात बिखरें उपवन में

मानस हंस ध्यान के मोती 

चुन-चुन कर पुलकित होता है , 

सुमिरन की डोरी में जिसको 

अंतर मन निरख पिरोता है  !


मुस्कानों में छलक उठेगी  

सच्चे मोती की शुभ आभा, 

जिसने पहचाना है सच को  

इस दुनिया में वही सुभागा !


ध्यान बिना अंतर है मरुथल 

मन पंछी भी फिरे उदासा,

रस की भीनी धार बह रही  

वह है क्यों प्यासा का प्यासा !


कोई भी जो डुबकी मारे 

छू ही लेता उस पनघट को, 

अमृत छलके जहाँ अनवरत 

खोलो मन के घूँघट पट को !


ध्यान बरसता कोमल रस सा 

कण-कण काया का भी हुलसे, 

खोजें इक सागर गहरा सा 

व्यर्थ ताप में क्योंकर झुलसें !


तृप्त हुआ जब मन यह सुग्गा 

बस उसका ही नाम रटेगा, 

कृत-कृत्य हो  जगत में डोले 

जैसे मन्द समीर बहेगा !


या सुवास बनकर फैलेगा  

जगती  के इस सूनेपन में, 

शब्द सहज झरेंगे जैसे 

पारिजात बिखरें  उपवन में !


बुधवार, अगस्त 21

उसने कहा था


उसने कहा था 


एक ही पाप है
और कितना सही कहा था
उस एक पाप का दंड भोग रहा है हर कोई
बार-बार दोहराता है
उस एक पाप के बोझ तले दबकर
पिसता है, नींदें गंवाता है
खुद की अदालत में खड़ा होता है
वादी भी स्वयं है और प्रतिवादी भी
अपने ही विरुद्ध किया जाता है यूँ तो हर पाप
यह पाप भी खुद को ही हानि पहुंचाता है
इसका दंड भी निर्धारित करना है स्वयं ही
'असजगता' के इस पाप को नाम दें 'प्रमाद' का
अथवा तो स्वप्नलोक में विचरने का
जहाँ जरूरत थी... जिस घड़ी जरूरत थी...
वहाँ से नदारद हो जाने का
यूँही जैसे झाँकने लगे कोई बच्चा कक्षा से बाहर
जब सवालों के हल बताये जा रहे हों
या छोड़ दे कोई खिलाड़ी हाथ में आती हुई गेंद
उसका ध्यान बंट जाये
हर दुःख के पीछे एक ही कारण है
अस्तित्त्व को हर पल उपलब्ध होना ही निवारण है
वरना रोना ही पड़ेगा बार-बार
 सजगता ही खोलेगी सुख का द्वार !

शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

यह पल 

अतीत के अनन्त युग सिमट  आते हैं 
वर्तमान के एक नन्हे से क्षण में 
भविष्य की अनंत धारा भी 
छोटा सा यह पल कितना गहरा है 
साक्षी है जो बीते  बरसों का 
और छिपा है जिसमें भावी का हर स्वप्न 
हर क्षण अतीत की कोख से जन्मा  है और 
निज गर्भ में समेटे है  कल 
नहीं टूटती है यह श्रृंखला 
नहीं टूटी है आजतक !
इस पल में ठहरना ही ध्यान है 
इस पल में रुकना ही तोड़ देता है हर सीमा 
जो घेर लेती है आत्मा को 
करने कैद उसकी ही मान्यताओं के घेरे में !


सोमवार, मार्च 9

विपासना का अनुभव -अंतिम भाग

विपासना का अनुभव 

सुबह आठ बजे से नौ बजे तक, दोपहर ढाई से साढ़े तीन बजे तक तथा शाम छह से सात बजे तक सामूहिक साधना होती थी. जिसमें सभी साधकों का पूरे वक्त उपस्थित रहना आवश्यक था. शेष समय में कभी–कभी पुराने साधकों को अपने निवास स्थान पर ध्यान करने के लिए कहा जाता था और कभी-कभी कुछ नये और पुराने साधकों को शून्यागारों में ध्यान करने के लिए कहा जाता था. गोल पगोड़ा में स्थित शून्यागार एक विशिष्ट आकार के छोटे-छोटे ध्यान कक्ष थे, जिनमें अकेले बैठकर ध्यान करना होता था. एक दिन शून्यागार में ध्यान करते हुए अनोखा अनुभव हुआ, जिसमें एक क्षण के लिए स्वयं को देह से अलग देखा, जैसे मैं पृथक हूँ और देह बैठकर ध्यान कर रही है. जैसे ही इस बात का बोध हुआ, अनुभव जा चुका था.

विपश्यना आरम्भ होने पर चौथे दिन के उत्तरार्ध से गुरूजी ने शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान देने को कहा. पहले दिन केवल नाक के छल्लों तथा ऊपर वाले होंठ के ऊपर वाले भाग पर ही, बाद में सिर से लेकर पैर तक एक-एक अंग पर कुछ क्षण रुकते हुए वहाँ होने वाली किसी भी तरह की संवेदना को देखना था. यह संवेदना किसी भी प्रकार की हो सकती थी, दर्द, कसाव, खिंचाव, सिहरन, खुजली, फड़कन या अन्य किसी भी प्रकार का शरीर पर होने वाला अनुभव. मुख्य बात यह थी कि संवेदना चाहे सुखद हो या दुखद, उसके प्रति किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करनी थी. वे सभी संवेदनाएं स्वतः ही उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती हैं, साक्षी भाव से इस अनित्यता के नियम का दर्शन करना था. हमारा अंतर्मन न जाने कितने संस्कार छिपाए है और हर पल हम नये संस्कार बनाते चल रहे हैं. हमसे जाने-अनजाने जो भी गलत-सही हुआ है, उसका हिसाब तो चुकाना ही होगा. औरों को देखकर जो द्वेष का भाव मन में जगता है वह भीतर गाँठ बनकर टिक जाता है. प्रकृति का नियम है विकार जगाया तो व्याकुल तो होना ही पड़ेगा. अतीत में जगाये विकार समय आने पर देह पर किसी न किसी रोग के रूप में आकर प्रकट हो सकते हैं. साक्षी का अनुभव होने के बाद राग, द्वेष व मोह के बंधन नहीं बंधते.
आठवां दिन आते आते तो मन भी जैसे दूर खो गया लगता था, देह पर होने वाले सुख-दुःख जैसे किसी और को हो रहे हैं. मन एक असीम मौन में डूबा हुआ है. लगा, सारा विश्व जैसे एक ही सूत्र में पिरोया हुआ है और वह सूत्र मुझ से होकर भी जाता है, सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा, यह देह एक दिन गिर जायेगी फिर भी यह चेतना किसी न किसी रूप में तो रहेगी ही. एक दिन गोयनका जी ने कहा, मन और देह दोनों एक नदी की तरह हैं. मौसम बदलते हैं तो नदी भी बदलती है वैसे ही मन और देह के भी मौसम होते हैं. देह का आधार अन्न है और मन का आधार संस्कार हैं जो हर पल बनते-मिटते रहते हैं. मन के किनारे बैठकर जो इसे देखना सीख जाता है वह इससे प्रभावित नहीं होता.

एक रात्रि स्वप्न में स्वयं को किसी दुःख से छुड़ाने के लिए रोकर पुकार लगाते सुना, फिर अपने ही मुँह से एक धातु का उपकरण निकालकर हाथ में रखा, स्पष्ट था कि पीड़ा का कारण यही था. तब जैसे किसी ने कान में फुसफुसा कर कहा, अपने आप को स्वयं ही क्यों दुखी बनाती हो? फिर नींद खुल गयी. एक स्वप्न में देखा, उठना चाहती हूँ पर आँखें हैं कि खुलने का नाम नहीं लेतीं, बंद आँखों से ही चल पड़ती हूँ तो सामने दीवार आ जाती है, दिशा बदल कर सडक पर आ जाती हूँ और आँखें खोलने में समर्थ हो जाती हूँ. एक स्वप्न में खुद को निरंतर ७८६ को उच्चारित करते हुए पाया. एक और स्वप्न में भगवान शंकर का जयकार करते हुए. ये सारे स्वप्न यही तो बता रहे थे कि न जाने कितने बार यह चक्र घूम चुका है अब कहीं तो इसे रुकना होगा. कभी-कभी ऐसे व्यर्थ के विचार भी आते कि हँसी आती, पर जो जो भीतर रिकार्ड किया है वह तो निकलेगा ही, सारी साधना समता भाव बनाये रखने की है. कोई भी अनुभव कितना भी सुंदर क्यों न हो समाप्त हो जाता है, पर भीतर की समता एक चट्टान की तरह अडिग रहती है.

अंतिम दिन का पाठ भी अतुलनीय था, जिसमें मंगल मैत्री सिखायी गयी. प्रतिदिन सुबह व शाम की साधना के बाद सारे विश्व के लिए मंगल कामना करने को कहा गया अपने सारे पुण्य केवल स्वयं की शुद्धि के लिए समाप्त न हो जाएँ सब दिशाओं में उन्हें प्रसारित करना होगा. सबके मंगल में ही अपना मंगल छिपा है, भगवान बुद्ध की यह मंगल भावना कितनी पावन है. धरा पर यदि कोई जगा हुआ न हो तो इसकी रौनक कोई देख ही न पाए, उस तरह, जिस तरह यह वास्तव में है ! जो दिखायी नहीं देता, वह उससे ज्यादा सुंदर है जो दिखायी देता है. ‘शील, समाधि और प्रज्ञा’ भगवान बुद्ध के बताये इस मार्ग पर चलकर न जाने कितने लोग दुखों से मुक्ति का अनुभव कर चुके हैं, और अनेक भविष्य में भी करते रहेंगे.