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बुधवार, नवंबर 5

चाह जब जागे मिलन की

चाह जब जागे मिलन की 


निज आत्म में जागना है 

न कि जगत से भागना है, 

मिला बाहर, वही भीतर 

नहीं अब कुछ माँगना है !


भाव अपना शुद्ध हो जब 

प्रेम रस भीतर रिसेगा, 

मधुर प्रकाश ज्योत्सना का 

सहज उर से छन बहेगा !


श्रद्धा की भूमि ह्रदय में 

पुष्प कोमल भावना के, 

चाह जब जागे मिलन की 

भाव हों आराधना के !


वह अदेखा, वह अजाना 

निकट से भी निकट लगता, 

सुरभि सुमिरन की अनोखी 

पोर-पोर प्रमुदित होता ! 


माँग जो भी, वह मिला है  

तुझसे न कोई गिला है, 

कभी कुम्हलाया न अंतर 

जिस घड़ी से यह खिला है !


शुक्रवार, अक्टूबर 3

तू ही भरे रंग माया के

तू ही भरे रंग माया के


भाव सभी अर्पित करते हैं 

प्रेम और करुणा जो तुझसे, 

पल-पल इस जग में झरते हैं 

कष्ट हमारा हर हरते हैं !


मधुर तृप्ति का भाव जगा जो 

अतृप्ति का भी घाव लगा जो, 

चैन और बेचैनी उर की 

तेरे चरणों पर रखते हैं !


शांति औ' आनंद की मूरत 

देवी ! तू अज्ञान को हरे, 

तू ही भरे रंग माया के

हर वर माथे पर धरते हैं !


जगे परम स्वीकार ह्रदय में 

विश्रांति मिल जाये चरण में, 

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में 

ध्यान सदा तेरा करते हैं ! 


देवी ! तेरे रूप हज़ारों 

कथा अनेकों, नाम हज़ारों, 

किस-किस को जाने यह लघु मन 

तुझमें ही जीते मरते हैं !



शुक्रवार, फ़रवरी 21

मन

मन 


नींदों के पनघट पे 

यादों को बुनता है, 

ख़्वाबों के झुरमुट में 

शब्द पुष्प चुनता है !


भावों की माला रच 

ताल में पिरोता है, 

अर्पित कर चरणों में 

अश्रु में भिगोता है !


जाने क्या पाएगा 

गीत रोज़ गाता है, 

तारों से बात करे 

चंदा संग जगता है !


किसकी वह राह तके 

किसको पुकारे सदा, 

शब्दों की नाव बना 

मन, सागर तिरता है !


शुक्रवार, सितंबर 20

कविता

कविता 

सुना आपने

अब कविता पढ़ना मुझे नहीं भाता 

अक्सर मैं कविता का पेज ही खोल कर नहीं देखती 

टिकने ही नहीं देती आँखों को शीर्षक पर

 एक क्षण के लिए भी 

शायद भय है अंतर्मन में 

पुराना प्रेम जाग न उठे 

न लगने लगें कविताएँ अपनी-अपनी 

सो दूर से ही नमन करती हूँ 

नहीं तौलती शब्दों को 

भावों को अनुभूति में नहीं लाती

विचारती हूँ, परखती हूँ 

पर नहीं देखती, न छूती  

वृक्षों, पत्तियों और फूलों को 

मैं बिगड़ गई हूँ 

एक कली ने कल राह चलते कहा था 

मैंने अनसुना कर दिया 

कान नहीं दिये 

क्योंकि अब मैं वह नहीं रही 

मुझे अभाव नहीं है कोई 

 सभी कुछ है 

अब फूलों को अपना दुख सुनाने को रहा ही नहीं 

हवा का संगीत सुनने का वक्त नहीं 

फिर क्यों कविता पढ़ूँ 

क्यों अफ़सोस करूँ 

भ्रष्टाचार पर, असमानता पर, बेरोज़गारी पर 

क्यों नाराज़ रहूँ भ्रष्ट सत्ता से 

अब मैं स्वतंत्र हूँ 

अपने पैरों पर हूँ 

अब सब ठीक चल रहा है 

पेड़ कहीं कटते होंगे 

मुझे आवाज़ सुनायी नहीं देती 

नारे लगते होंगे, जुलूस निकलते होंगे 

पर वे बेमतलब हैं 

पहाड़ों पर आग लगती होगी शायद 

पर मैंने खिड़की कहाँ खोली है 

बंद हैं आँखें मेरी 

सपनों में नहीं 

अब तो ज़िंदगी चलने लगी है 

मैंने इसकी सेहत का जाम पिया था 

नये वर्ष पर 

शुभकामना भी दी थी 

अब मुझे कविता ज़रूरी नहीं लगती 

कि अच्छे-भले शब्दों को 

साथ-साथ रख दिया जाये यूँही 

मन बहलाव के लिए 

सुना आपने कविता अब 

ऊपर की या नीचे की शै हो गई है 

दूसरी श्रेणी की !


बुधवार, अक्टूबर 4

भावों का अभाव उर खलता


भावों का अभाव उर खलता


बनता सहज अभाव का भाव

 भावों का अभाव उर खलता

टिकी ‘नहीं’ पर  नज़र  सदा ही 

मन ‘है’ को  देख नहीं पाता  !


जग, सोने का अभिनय करता

नूतन रंग सपन में भरता,

पल दो पल का भ्रम है सपना 

 सत्य  देखने से यह डरता  !


 कठिन जगाना जगे हुए को

 जल से तेल न होता हासिल,

फिर भी जतन यहाँ जारी है 

दूर दिखायी देता साहिल !


कभी होश आ खुलेगी आँख 

नभ निज होगा जगेंगी पाँख,

देर न हो जाये डर यह है

रिसता जीवन लाखों सुराख !


शुक्रवार, जनवरी 13

कविता

कविता 


कोई एक भाव 

एक शब्द, एक विचार 

उतर आता है न जाने कहाँ से 

और पीछे एक धारा बही आती है 

अक्सर कविता ऐसे ही कही जाती है

अनायास, अप्रयास 

कभी थम जाती है कलम तो जानना कि 

प्रवाह रुक गया है 

कि मार्ग में अवरोध है 

कोई पाहन इच्छाओं का  

या कोई दीवार द्वेष की  

नकार की बाड़ तो नहीं लग गयी 

जिन्हें हटाते ही फिर बहेगी 

कल-कल छल-छल 

काव्य की अजस्र धारा 

निरंतर भिगोती हुई अंतर व बाह्य जगत 

आलोकित होगा 

मन प्राण ही नहीं 

देह का एक-एक कण ! 


बुधवार, जून 22

नदिया ज्यों नदिया से मिलती

नदिया ज्यों नदिया से मिलती  

हर भाव तुझे अर्पित मेरा 

हर सुख-दुःख भी तुझसे संभव, 


यह ज्ञान और अज्ञान सभी 


तुझसे ही प्रकटा सुंदर भव !



तू बुला रहा हर आहट में 


हर चिंता औ' घबराहट में, 


तूने थामा है हाथ सदा 


आतुरता नहीं बुलाहट में !



हो स्वीकार निमंत्रण तेरा


तेरे आश्रय में सदा रहूँ, 


अब लौट मुझे घर आना है 


तुझ बिन किससे यह व्यथा कहूँ !



‘​​मैं’ तुझसे मिलने जब जाता 


मौन मौन में घुलता जाये, 


शब्द हैं सीमित मौन असीम 


वही मौन ‘तू’ को झलकाए !



‘मैं’ खुद को कभी लख न पाता 


जगत दिखा जब मिलने जाए, 


खुद से अनजाना ही रहता 


वक्त का पहिया चलता जाए !



नदिया ज्यों नदिया से मिलती 


सागर में जा खो जाती है, 


‘मैं’ ‘तू’ में सहज विलीन हुआ  


कोई खबर नहीं आती है !





गुरुवार, अप्रैल 21

कविता

 कविता 

भला किससे है 

कविता की महक और मिठास 

शब्दों के सुमधुर जाल से 

या भावों के सुर और ताल से 

कभी ढूँढे नहीं मिलते शब्द पर 

भीतर घन बन उमड़ती हैं भावनाएँ 

या सागर में उठे ज्वार सी 

कभी फुर्सत है शब्द गढ़ने की, तो 

सूने सपाट आकाश सा तकता है मन 

फिर कैसे कोई गुनगुनाए 

इस मरुथल में शब्द पुष्प उगाए 

कभी-कभी ही होता है मेल 

सोने में सुहागे सा 

जब भाव और शब्द दोनों समीप हों 

काव्य की सरिता सहज बहती जाए 

निज सुवास और रस से 

सुहृदों को छूती जाए 

जैसे अंतर को तृप्त करें 

किसी के नेह भरे बोल 

वैसे रख देती है दिल के द्वार खोल 

कभी सुख की बरखा बन बरस जाती 

कभी नयनों में सावन-भादों  भर जाती 

कविता जीवन का फूल है 

उसकी हर अदा क़ुबूल है ! 


मंगलवार, जनवरी 4

अब लौट मुझे घर आना है

अब लौट मुझे घर आना है 

हर भाव तुझे अर्पित मेरा 

हर सुख-दुःख भी तुझसे संभव, 

यह ज्ञान और अज्ञान सभी 

तुझ एक से प्रकटा है यह भव !


तू बुला रहा हर आहट में 

हर चिंता औ' घबराहट में, 

तूने थामा है हाथ सदा 

आतुरता नहीं बुलाहट में !


हो स्वीकार निमंत्रण तेरा

तेरे आश्रय में सदा रहूँ, 

अब लौट मुझे घर आना है 

तुझ बिन किससे यह व्यथा कहूँ !


‘​​मैं’ तुझसे मिलने जब जाता 

मौन मौन में घुलता जाये, 

जिसकी गूंज अति प्यारी है 

कोई मनहर राग गुंजाये !


‘मैं’ खुद को कभी लख न पाता

मौन हुआ जब मिलने जाए, 

शब्द हैं सीमित मौन असीम 

वही मौन ‘तू’ को झलकाए !


नदिया ज्यों नदिया से मिलती 

सागर में जा खो जाती है, 

‘मैं’ ‘तू’ में सहज विलीन हुआ  

कोई खबर नहीं आती है !


सोमवार, अक्टूबर 4

अनंत के दर्पण में

अनंत के दर्पण में 


अंतर के तनाव को 

आत्मा के अभाव को 

भावों का रूप बनाकर  

कविता रचती है !

मानो पंक में कमल उगाती  

जीवन में कुछ अर्थ भरती है !

इस अंतहीन दुनिया में 

अरबों मस्तिष्कों के 

 साथ, एक नाता बांधती  

ज्यों अधर में ठहरती है !

अनंत के दर्पण में 

अनायास ही संवरती

बार-बार सच का सामना कराती  

जो अवाक कर दे 

वही बात सुनाती है !

अनावृत हो आत्मा 

गिर जाएँ सारे आवरण 

तभी वह उतरती  

डोलते हुए भंवर में 

टिकने को थल देती है !