फिर भी अनछूया ही रहता
बन मलयज वन-वन डोल रहा
शशि मुख से बदली खोल रहा
तू पुहिन बिंदु बन कर ढुलका
जल में जीवन रस घोल रहा !
साँझ-सवेरे, विपिन घनेरे
पंकज पादप, मानुष चेहरे,
सब तेरी ही कथा सुनाते
दिवस मनोहर घोर अँधेरे !
हर शब्द तुझे इंगित करता
हर भाव तुझे मन में भरता,
हर भाषा तुझको ही गाती
फिर भी अनछूया ही रहता !
