पंकज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पंकज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, अगस्त 20

फिर भी अनछूया ही रहता



फिर भी अनछूया ही रहता



बन मलयज वन-वन डोल रहा
शशि मुख से बदली खोल रहा
तू पुहिन बिंदु बन कर ढुलका

जल में जीवन रस घोल रहा !

साँझ-सवेरे, विपिन घनेरे
पंकज पादप, मानुष चेहरे,
सब तेरी ही कथा सुनाते


दिवस मनोहर घोर अँधेरे !

हर शब्द तुझे इंगित करता
हर भाव तुझे मन में भरता,
हर भाषा तुझको ही गाती 
फिर भी अनछूया ही रहता !