ओह ! फिर बिजली चली गयी
गूंज रही मधु सम इक कूक
भोर सुहानी, तपती धूप,
जाने किस मस्ती में ड़ूबे
नन्हें शावक, सुंदर रूप !
बिजली-बिजली करता मानव
वे तपती दोपहर में गाते,
सर्दी, गर्मी, हो बहार या
सारे मौसम इनको भाते !
अभी जुड़े हैं शायद उससे
हम बिछड़े हैं जाने कब से,
भीतर कोई स्रोत खो गया
कितना दुर्बल मनुज हो गया !
किस-किस का यह हुआ गुलाम
रहा नहीं मेहनत के काम,
कैसे उसे नचाता है मन
पल-पल करता उसे सलाम !
सादा जीवन, हल्का सा मन
देह भी फूल सी महक उठेगी,
भीतर छिपी आत्मज्योति जो
कण-कण से फिर स्वयं झलकेगी !