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सोमवार, अगस्त 10

सलोनी की कहानी

सलोनी की कहानी 


सलोनी का नाम पुकारा गया तो वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मंच पर गई। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। महिलाओं की अर्ध मैराथन दौड़ में उसे एक और पुरस्कार मिला था। न जाने कितने ही मैडल और ट्रॉफ़ियाँ उसके बड़े से सुंदर घर की दीवार पर बनी आलमारी में सजा कर रखी गई थीं। वह अपनी सीट पर लौटी तो साथ बैठी उसकी सहकर्मी अलका ने मुसकाते हुए बधाई दी। कार्यक्रम के बाद चाय-नाश्ते का भी प्रबंध था। वे दोनों अपनी-अपनी प्लेट्स लेकर बाहर बरामदे में आकर बैठ गयीं। सलोनी की सहकर्मी विशेष रूप से इस कार्यक्रम में उसके साथ आयी थी। उसे अपने दफ़्तर में आयी इस नयी महिला के प्रति सहज ही जुड़ाव महसूस होने लगा था। वह अपने काम में तो दक्ष थी ही, समय की पाबंद भी थी और सदा चुस्त-दुरस्त रहती थी। उसके आस-पास एक सकारात्मक ऊर्जा डोलती रहती थी, किंतु इसके बावजूद कोई बात थी जो कभी-कभी उसके चेहरे ओर एक छाया सी बन कर छा जाती थी और तब वह अपने आसपास के वातावरण से कहीं दूर चली जाती थी। उसने एक-दो बार उसके बारे में कुछ पूछना चाहा पर कभी समय इतना कम था कि सामान्य शिष्टाचार में ही समाप्त हो गया, या कभी उसने किसी तरह टाल दिया और बातों का रुख़ कहीं और मोड़ दिया। आज उनके पास बहुत समय था, वह तय करके आयी थी कि उसके पूर्व जीवन के बारे में अवश्य ही कुछ पूछेगी।  


सलोनी ने अल्पाहार समाप्त किया तो उठ खड़ी हुई, अलका ने हाथ पकड़ कर उसे बैठा दिया । सलोनी, हम कितने दिनों से एक-दूसरे को जानते हैं, पर तुमने कभी अपने बारे में कुछ नहीं बताया। तुम यहाँ की तो नहीं हो, इस शहर में कब आयीं? जरा बताओ न, तुम्हारे इस जोश भरे जीवन का राज क्या है ? सलोनी उसकी ओर देखकर मुस्कुरा दी, पर एक पल के लिए उसकी आँखों में नमी छलक आयी। झट उसने रूमाल निकल कर आँखें पोंछी और बोली तू सुनना चाहती है ? तो सुन तुझे शुरू से ही बताती हूँ।


मार्गेरिटा का नाम तो तूने सुना होगा, जी हाँ, जिसे असम की कोयला रानी भी कहा जाता है। वहीं मेरा जन्म हुआ। 


अलका ने कभी इस शहर का नाम नहीं सुना था, उसने पूछा “यह कहाँ है’? 


तिनसुकिया ज़िले में दिहिंग नदी के किनारे बसा यह एक सुंदर औद्योगिक शहर है। हरे-भरे चाय के बाग़ानों से घिरा है यह शहर। तुझे जानकर आश्चर्य होगा कि इस शहर का नाम इटली की रानी ‘मार्गेरिटा ऑफ़ सेवॉय’ के नाम पर रखा गया था। 


अलका ने उसे टोका, “पर तुम लोग तो मारवाड़ी हो न, असम में कैसे पहुँच गये’ ? 

सलोनी ने कुछ इतिहास की किताबों में पढ़ा था और कुछ अपने दादाजी से सुना था।उसने बताया, असम में मारवाड़ी समुदाय का आगमन तो अहोम राजवंश के काल में ही हो गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में मारवाड़ी लोग चाय बाग़ानों और दूरदराज़ के क्षेत्रों में बस गये। इन इलाक़ों में आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराने और नक़द अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने में लग गये। 

अलका ने रस लेते हुए अच्छा ! कहा तो सलोनी और भी उत्साह से बताने लगी। 

“तुझे पता है, गोहाटी में सौ साल से भी पुराना मारवाड़ी अस्पताल है और असम में कई शिक्षा संस्थाएँ भी मारवाड़ियों ने बनवायी हैं। मारवाड़ी परिवार अब पूरी तरह से स्थानीय संस्कृति में घुल-मिल गये हैं। असमिया भाषा बोलते हैं। कितने ही लोग साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं।पूरे असम में शायद ही कोई हो जिसने ज्योतिप्रसाद अग्रवाला का नाम नहीं सुना होगा? 

तेरे दादाजी और पिताजी क्या करते हैं ?

“दादा जी अब नहीं रहे, पिताजी एक व्यापारी हैं, जो अब भी बहुत व्यस्त रहते हैं। जब हम भाई-बहन छोटे थे तब तो उनकी व्यस्तता बहुत अधिक थी।” 

माँ-पिता जी दोनों अब वृद्धावस्था की दहलीज़ पर खड़े हैं। माँ परंपरागत मारवाड़ी समाज की एक गृहणी हैं, जिनका अधिकतर समय घर में ही बीता। हम दोनों भाई-बहन लाड़-प्यार से पले, मेरे माँ-पिता ने हमारे पालन-पोषण में कभी कोई भेद नहीं किया।मैं स्कूल की क्रिकेट टीम में थी और बहुत तेज साइकिल चलाती थी। जब भी घर में दादी या माँ किसी बात पर मुझे टोकतीं, तो मैं साइकिल लेकर निकल जाती।  

अलका बहुत ध्यान से उसकी बातें सुन रही थी, उसने पूछा, कॉलेज की पढ़ाई तूने कहाँ से की ?

मैंने स्थानीय कॉलेज से बीकॉम किया। छोटे भाई को पढ़ने के लिए बाहर भेजा गया। ग्रेजुएशन की डिग्री मिलते ही मेरे विवाह की बात शुरू हो गई। 

क्या ? अलका ने आश्चर्य व्यक्त किया तो सलोनी ने बताया, स्कूल व कॉलेज की मेरी सखियाँ आगे की पढ़ाई के लिए फ़ार्म भर रही थीं, पर मुझे लड़के वाले देखने आ रहे थे। आख़िर बड़े-बूढ़ों की राय से मध्यप्रदेश के मारवाड़ी परिवार के एक लड़के महेश के साथ बात पक्की हो गई। सबसे अच्छी बात थी कि होने वाले पति या ससुराल वालों को मेरी आगे की पढ़ाई से कोई एतराज नहीं था।लड़का बड़े शहर में काम करता था और देखने-सुनने में भी अच्छा था। मैं उससे पहली बार तब मिली जब वे लोग मुझे देखने आये। थोड़ी देर के लिए हमें एक-दूसरे से बात करने के लिए अकेले छोड़ दिया गया, पर मेरा मन जो पहले ही विद्रोह कर रहा था, शांत होकर किसी भी निर्णय पर पहुँचने की स्थिति में नहीं था। मैंने माँ से कहा, एक बार और मुझे मिल लेने दो। माँ ने जब मेरी दृढ़ता देखी तो इस बात के लिए पिताजी को मना लिया। हम विवाह से पूर्व एक बार और मिले, हमारे मध्य सामान्य बातें हुईं। घर लौटी तो माँ मेरे चेहरे पर आश्वस्ति के भाव देखकर संतुष्ट हो गयीं।कमाऊ और सुशील लड़का भला छोड़ा भी कैसे जा सकता था, ‘चट मँगनी और पट ब्याह’ हो जाने के बाद मैं भी उस बड़े से शहर में रहने आ गई। लड़का किराए के एक बड़े से फ़्लैट में रहता था, उसका जीवनस्तर भी अच्छा था, किसी सुविधा की कोई कमी नहीं थी। 

लेकिन दिन भर घर पर बैठे रहकर तू क्या करती थी ? क्या तूने आगे की पढ़ाई के लिए दाख़िला लिया ?

हाँ, कुछ दिन घर पर रहने के बाद मैंने अपनी रुचि के अनुसार गृह सज्जा का एक कोर्स कर लिया। पहले किसी कंपनी में नौकरी की, फिर अनुभव हो जाने के बाद अपना ख़ुद का काम शुरू कर दिया। काम चल निकला, नये बने घरों में मुझे लकड़ी का काम करवाना होता था। घर की सजावट करना मेरा शौक़ था और काम के प्रति लगन बचपन से ही घर में काम करते-करते आ गई थी। 

क्या तेरे पति को तेरे काम करने से कभी कोई एतराज नहीं हुआ ? अलका के प्रश्न में छिपी आशंका को सलोनी ने भाँप लिया था।उसने मन ही मन सोचा, वह शायद यही चाहते थे कि मैं अधिक से अधिक व्यस्त रहूँ ताकि उनके मामलों में न पड़ूँ। उसने कहना शुरू  किया। 

“मेरे भूतपूर्व पति एक ऐसी कंपनी में नौकरी करते थे, जो लोगों का धन निवेश करवाने में सहायता करती थी। पति का स्वभाव बहुत अच्छा था, वह मेरा ध्यान रखता था और घर के काम में सहायता भी करता था। यहाँ तक कि प्याज़ काटते समय मेरी आँखों में आये आँसू देखकर उसने मुझे प्याज़ काटने से मना कर दिया, स्वयं काट देता नहीं तो बिना प्याज़ के भोजन बनाने को कहता।तब मुझे लगता विवाह के समय सभी ने सच कहा था, भगवान ने तुम दोनों की कितनी सुंदर जोड़ी बनायी है, तुम बहुत भाग्यशाली हो। यह कहते हुए पल भर को सलोनी रुकी, जैसे उन दिनों को याद करके उसे अचरज हो रहा हो। क्या यह सब उसके साथ घटा था? 

अलका ने उसे स्नेह भरी नज़रों से देखा और उसके आगे बोलने की प्रतीक्षा करने लगी।सलोनी ने आगे कहा-  

“मैं जब अपने काम में ज़्यादा व्यस्त हो गई, तो खाना बनाने के लिए एक सहायिका को रख लिया।हम दोनों सुबह काम पर निकल जाते तो शाम को ही लौटते, लंच साथ ले जाते और रात का खाना घर आकर खाते। एक-दूसरे के जीवन में गहराई से झाँकने का न तो हमारे पास समय ही था और न ही हमारे स्वभावों में ऐसा था। कभी-कभी हमारे मध्य नोकझोंक भी होती, पर थोड़ी बहुत ग़लतफ़हमी तो हर रिश्ते में कभी न कभी हो जाती है। एकाध दिन में सब ठीक हो जाता और गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ने लगती। सलोनी फिर जैसे अतीत में खो गई थी। 

अलका ने उसे जगाते हुए कहा, “हाँ, कुछ न कुछ शिकायत की गुंजाइश तो हर रिश्ते में रहती है, पर ऐसा क्या हुआ कि ?

सलोनी संभल कर बैठ गई और कुछ इस तरह बताने लगी जैसे किसी और की बात कह रही हो। 

‘देखते-देखते चार वर्ष बीत गये, ऊपर-ऊपर से देखें तो सब कुछ अच्छा ही चल रहा था कि एक दिन मैं इस सपने जैसी सुंदर ज़िंदगी से जाग गई। मुझे एक विवाह में जाना था। मैंने महेश से कहा, क्या तुम बैंक से मेरे गहने ला दोगे? वह ‘हाँ’ कहकर गया पर शाम को लौटा तो गहने नहीं लाया था। पूछने पर अधिक काम होने का बहाना करके टाल गया। दूसरे दिन भी यही हुआ तो मैंने स्वयं ही जाने का फ़ैसला किया, पर लॉकर में एक-दो छोटे गहनों को छोड़कर कुछ भी नहीं था। मेरा माथा ठनका। घर आते ही मैंने अपनी आलमारी खोली, जहाँ मैं नक़द धन रखती थी जो सामान ख़रीदने के लिए ग्राहकों से मिलता था। मैंने कभी अलमारी में ताला बंद नहीं किया था। वहाँ भी कुछ रक़म ग़ायब थी। दिन भर मेरा मन काम में नहीं लगा, मुझे पति पर संदेह हो रहा था, पर उसकी पुष्टि कैसे करूँ, इसका कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। मेरा इतना ध्यान रखने वाला पति मेरे साथ छल करेगा, यह बात मैं सोच भी नहीं सकती थी। 

संयोग से उसी दिन मेरे मौसा-मौसी मिलने आये, मुझे परेशान देखकर मौसा ने कारण पूछा तो मैंने उन्हें सब बता दिया। उन्होंने मुझसे कहा, तुम फ़ौरन पति के दफ़्तर में एक इमेल भेजो और उसे घर आते समय एक प्रिंट आउट लाने को कहो। उसने ऐसा ही किया पर पता चला, वहाँ उसका कोई ईमेल एकाउंट नहीं था। शाम को रोज़ की तरह महेश घर आया, चाय आदि देकर मैंने पूछा, “एक प्रिंट आउट के लिए मेल किया था, लाए हो? वह सकपका गया, फिर बोला, “दफ़्तर का प्रिंटर ख़राब है, लाओ, बाज़ार से करवा लाता हूँ।” तब तक चुप बैठे चाचा ने उसे कड़ी नज़र से देखा और सब कुछ साफ़-साफ़ बताने को कहा। वह सीधा होकर बैठ गया और धीरे-धीरे सारी बात बतायी।तीन महीने पहले दफ़्तर में उसने किसी ग्राहक का बहुत सारा धन ग़लत जगह निवेश करवा दिया था।कहीं से उधार लेकर उसका हिसाब तो पूरा किया पर जिनसे उधार लिया था, वे लोग पीछे पड़ गये, इसलिए पत्नी के गहने भी गिरवी रखने पड़े। उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। 

मैं उसका मुँह देखती रह गई। वह बड़े आराम से सारी बातें बता रहा था। आलमारी से कितना धन उसने लिया था, इसका कोई जवाब उसके पास नहीं था। पिछले कई महीनों से वह बेरोज़गार था।जाने सारा दिन कहाँ बिताता था और पहले की तरह शाम को मुस्काता हुआ मेरा स्वागत करता था। उसने एक बार भी अपनी परेशानी में मुझे शामिल नहीं किया, शायद उसे अपनी नौकरी जाने का भी कोई ग़म नहीं था। उसी तरह मुझे बाहर ले जाता, महँगे होटलों में खाना खिलाता और उपहार भी ख़रीद कर देता रहा। दिवाली आयी तो हज़ारों के पटाखे भी वह लाया था। 

उस दिन वे सारी बातें याद करके मेरा दिल जोड़ों से धड़कने लगा था, ऐसे व्यक्ति के ऊपर भरोसा करके जैसे मैं आँखें मूँदे हुए चल रही थी। मौसा-मौसी मुझे हिम्मत रखने को कहकर चले गये। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। महेश ने एकाध बार कुछ कहा, पर मेरे कानों में उसका एक भी शब्द नहीं जा रहा था। मेरे साथ विश्वासघात हुआ था और जिसने किया था वह कितना निर्लिप्त था, जैसे उसे भरोसा था कि उसकी हर भूल क्षमा के योग्य है। रात भर मैं सोयी नहीं, अगले दिन माँ को सारी बात बतायी। मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई थी। मेरे मन में पति पर आ रहे क्रोध के साथ अपने पर भी क्रोध आ रहा था, मैं इस तरह बेख़बर कैसे बनी रही? क्या मैंने एक लापरवाह, ग़ैर ज़िम्मेदार व्यक्ति को अपने जीवन के अनमोल चार वर्ष दे दिये थे, जिसे अपने कृत्यों पर जरा भी अफ़सोस नहीं था, जिसने मुझे अँधेरे में रखा और मेरे विश्वास का ग़लत लाभ उठाया। यह कहते हुए सलोनी के चेहरे पर वही छाया उभर आयी थी, जिसे पहले भी अलका ने देखा था। उसने सलोनी का हाथ अपने हाथ में लिए और कुछ न कहकर केवल उसकी आँखों में झाँका। वह कुछ आश्वस्त होकर कहने लगी।

दो दिन बाद ही हमारा सारा परिवार आ गया। जिन लोगों ने विवाह करवाया था, उन्होंने लड़के वालों को भी बुला लिया। दोनों तरफ़ के बड़ों ने तय किया कि लड़के वाले गहनों को छुड़ाकर मुझे लौटायें, और तलाक़ के लिए कार्यवाही शुरू करें।मेरी माँ का रोते-रोते बुरा हाल था। मेरे बचपन की एक सखी मुझसे मिलने आयी थी, जिसने माँ को सँभाला। माँ बार-बार यही कह रहीं थीं, क्यों हमने इतनी जल्दी में विवाह कर दिया, काश ! तुझे आगे पढ़ने ही भेज देते। 

इस बीच महेश ने कई बार मुझसे संपर्क करने का प्रयत्न किया, मेरी एक स्कूल मित्र के माध्यम से उसने संदेश भी भिजवाया, पर मैं अब उस पर किसी भी हालत में विश्वास नहीं कर सकती थी।माता-पिता कुछ दिन मेरे साथ रहे और फिर उन्हें वापस जाना ही था। उन्होंने मुझे भी अपने साथ वापस घर लौटने को कहा, पर मैंने इंटीरियर डेकोरेशन का अपना बचा हुआ काम पूरा किया और एक नौकरी के लिए आवेदन पत्र भेज दिया। अब मुझे इतनी भाग-दौड़ वाले काम में कोई रुचि नहीं रह गयी थी। इस काम में अपने लिए समय निकालना बहुत कठिन था, पहले महेश भी घर देख लेता था, अब मुझे अकेले ही सब कुछ सँभालना था।लेकिन मैं टूटी नहीं, नयी नौकरी में ख़ुद को व्यस्त कर लिया। कहते हुए सलोनी ने पुनः एक गहरी श्वास ली और इस बार एक मुस्कान के साथ कहा - 

“जब स्कूल में थी तभी से मुझे खेलों में भाग लेने का शौक़ था, मैंने फिर से जिम जॉइन कर लिया। शरीर को स्वस्थ बनाना था और मन को बलवान। मैंने शहर में होने वाली मैराथन दौड़ों में भाग लेना शुरू कर दिया। ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है’ इस सूत्र को मैंने अपने जीवन का मंत्र बना लिया। 

वाह ! अलका के मुँह से यह शब्द सुनकर सलोनी हँसने लगी। पर तुझे पहाड़ों ने कैसे आकर्षित किया ! उसने पूछा। 

मैराथन के दौरान ही मेरे कुछ मित्र बने जो ट्रैकिंग के लिए आसपास के छोटे पर्वतों पर जाते  रहते थे।दो वर्षों तक इस तरह की छोटी-छोटी चढ़ाई करके मैं हिमालय पर चढ़ने के लिए ट्रेनिंग लेने गई। उन्हीं दिनों एक और स्वप्न भी मेरे  भीतर करवटें लेने लगा, एवरेस्ट के बेस कैंप तक चढ़ाई का स्वप्न! 

अलका ने आश्चर्य से कहा, इसमें तो बहुत ख़तरा है न, क्या तुझे डर नहीं लगता था ?

सलोनी ने इसके उत्तर में जो कहा, शायद अलका को उसकी उम्मीद नहीं थी। उसने कहा, “जीवन ने जो झटका मुझे दिया है उसके बाद कोई भी बात मेरे लिए किसी डर या दुख का कारण नहीं बन सकती। पर मेरे इस सपने को पूरा होने से पहले और भी कुछ झेलना शेष था।” 

ऐसा क्या हो गया ? क्या तुझे स्वीकृति नहीं मिली? अलका ने पूछा तो सलोनी का हाथ अपने पेट पर चला गया। चढ़ाई पर जाने से एक महीना पहले अचानक मेरे पेट में भयानक दर्द हुआ। फ़ौरन अस्पताल जाना पड़ा, पता चला किडनी में एक बड़ी सी पथरी  है। शीघ्र आपरेशन करना पड़ेगा, एक हफ़्ता इसी में निकल गया पर  इस कारण मैंने अपना अभियान रोका नहीं। मैं मानसिक दर्द से पार पा चुकी थी, यह शारीरिक दर्द मुझे कैसे रोक सकता था। माँ-पिता जी मुझसे मिलने आये, कुछ दिन मेरे साथ रहे। मेरे दफ़्तर में भी सब इस अभियान के बारे में जानते थे, मुझे शुभकामनाएँ देकर विदा किया।सफलता पूर्वक यह अभियान समाप्त कर जब मैं वापस आयी तो माँ-पिताजी घर पर मेरी प्रतीक्षा करते हुए मिले। उस दिन मैंने उनकी आँखों में ख़ुशी और  संतुष्टि का एक अनोखा भाव देखा। वह अपनी पुत्री की इस कामयाबी पर जैसे ख़ुद को बधाई देना चाहते थे। 

अलका ने ख़ुशी से सलोनी का हाथ थाम लिया, “वाक़ई इतने बड़े दुख के बाद ख़ुशी के ये पल उनके लिए बहुत अनमोल रहे होंगे। अब तो वे लोग तेरी तरफ़ से पूरी तरह निश्चिंत हो गये होंगे।”

काश ! ऐसा हो पाता, माँ का दिल कैसा होता है, क्या तुझे नहीं पता, उन्हें अब भी मेरे भविष्य की चिंता लगी रहती है। किसी तरह मेरा घर फिर से बस जाये इसकी मन्नत माँगती हैं । सलोनी ने कुछ हँसते हुए कहा।

हाँ, यह तो स्वाभाविक है, वे लोग सोचते होंगे, तेरे सामने सारा जीवन पड़ा है, अलका ने धीरे से कहा, फिर तुमने क्या कहा?

मैं हँसकर उनकी बातों को टालती रही पर एक दिन माँ ने सुबह उठते ही कहा, रात को सपने में उन्होंने सलोनी को विवाह मंडप में देखा है, क्यों नहीं वह दूसरे विवाह के लिए प्रयत्न करती। बार-बार माँ के तक़ाज़ों को सुनकर मैंने एक बार विवाह की एक वेबसाइट पर अपना बायोडाटा व चित्र अपलोड कर दिया। एक बार एक लड़के की तरफ़ से जवाब आया, बात कुछ आगे बढ़ी। 

अलका ने उत्सुकता से उसकी ओर देखा, अच्छा ! फिर क्या हुआ ? 

बताती हूँ, थोड़ा सा सब्र कर, सलोनी की हँसी फूटने को थी। 

लड़का मुझे एक होटल में मिलने आने वाला था।हम एक दूसरे की तस्वीरें देख चुके थे और सामान्य जानकारी भी फ़ोन पर ले चुके थे। मैं दफ़्तर से आकर तैयार हुई और नियत समय पर होटल पहुँची। कुछ देर बाद वह आया, सामान्य शिष्टाचार के बाद अचानक उस लड़के ने अपना फ़ोन उठाया, उसमें कुछ देखा, फिर कहा, मैं अभी एक मिनट में आता हूँ, इसके बाद वह लौट कर आया ही नहीं। मैंने किसी तरह आधा घंटा प्रतीक्षा की फिर घर लौट आयी। उस दिन तो मुझे बहुत बुरा लगा था पर बाद में जब उसका संदेश मिला, जिसमें लिखा था, फ़ोटो में जिसे देखा था, वह कोई दूसरी ही लड़की थी। तब मैं ठहाका मारकर हँस पड़ी। जो लड़का इस तरह होटल से बिना कुछ कहे भाग सकता है, वह जीवन में उसका साथ कैसे निभाएगा। 

यह सुनकर अलका का मुख आश्चर्य से खुला का खुला रहा गया।

‘जो हुआ, अच्छा हुआ’ कहकर मैंने माँ को सारी बात बतायी और कहा, अब आप मेरे  विवाह की चिंता न करें। सलोनी ने अलका के सामने खड़ी होकर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ देखा। आज मैं हर तरह से सबल हूँ, मैंने अपने भीतर के हर भय का सामना किया है।अब कभी किसी भी बाधा से घबराने वाली नहीं हूँ। मेरे जीवन में कई उतार-चढ़ाव आये पर मैं सदा डटकर खड़ी रही और अपने आप से भी ऊपर उठकर उनका सामना किया है।

अलका ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया, आज उसे अपनी इस सखी पर गर्व हो रहा था !


सोमवार, अगस्त 26

मन

मन 


मन कहानी पर पलता है 

क्षण-प्रतिक्षण नयी-नयी बुनता है 

अपनी रास न आये तो

औरों की लेकर चटखारे सुनता है !


अनादि काल से सुनते आ रहे हैं 

बच्चे कहानियाँ 

मन उनसे ही पोषित होता 

कल्पना के नगर गढ़ता है 

खो जाता भूल-भुलैयों  में 

सपनों में जगता है !


मन कहानियों का प्रेमी है 

गढ़ लेता है नायक स्वयं ही 

खलनायक भी चुनता है 

फिर क्या हुआ ?

यही चलाता है उसे 

सच से घबराता है !


ख़ुद ही सवाल उठाता 

जवाब भी बन जाता है 

मन में चलता है नाटक 

परदा कभी न गिरता है !


शब्दों का घेरा इक 

इर्द-गिर्द डाल लेता 

उस पार क्या है 

जान नहीं पाता 

अपने ही महलों में 

रात-दिन विचरता है 

मन कहानी पर पलता है !


सोमवार, मार्च 4

पराधीनता

पराधीनता 


उस दिन वह बहुत रोयी थी, आँगन में बैठकर ज़ोर से आवाज़ निकालते हुए, जैसे कोई उसका दिल चीर कर ले जा रहा हो। शायद उसकी चीख में उन तमाम औरतों की आवाज़ भी मिली हुई थी जिन्हें सदियों से दबाया जाता रहा था। उनकी माएँ, दादियाँ, परदादियाँ और जानी-अनजानी दूर देशों की वे औरतें, जिन्हें अपने सपनों को जीने का हक़ नहीं दिया जाता है। उसने जिस पर इतना भरोसा किया था, जिसे अपना सर्वस्व माना था, जिसे ख़ुद को भुलाकर, टूटकर प्यार किया था। उसकी एक बात उसे किस कदर चुभ गई थी। जब उसने कहा था, यदि उसने उसकी इच्छा के विरुद्ध घर से बाहर कदम रखा तो वह उसे छोड़ कर चला जाएगा, इतना सुनते ही जैसे उसके सोचने समझने की शक्ति ही जाती रही थी। उसने यह भी नहीं सोचा, उसकी नौकरी है, घर है, बच्चा है, वह कैसे जा सकता है ? ये शब्द उसके मुख से निकले ही कैसे, बस यही बात उसे तीर की तरह चुभ रही थी।वह उसे चुप कराने भी आया, पर दर्द इतना बड़ा था कि समय ही उसका मलहम बन सकता था। कुछ देर बाद ही वह अपने आप ही शांत हो गई थी, उसके मन ने एक निर्णय ले लिया था, जैसे वह उसे छोड़ने की बात सोच सकता था, तो उसे भी अपना आश्रय कहीं और खोजना होगा, ईश्वर के अतिरिक्त कोई उसका आश्रय नहीं बन सकता था। शाम तक मन शांत हो गया और अगके दिन तक वह सामान्य भी हो गई थी, पर भीतर बहुत कुछ बदल चुका था। वह जो आँख बंद करके उसके पीछे चली जा रही थी, नियति ने उसे जैसे चौंका दिया था। उस दिन के बाद वह अपने भीतर देखने लगी, जहॉं मोह के जाल बहुत घने थे, जिन्हें उसे काटना था। उसने मन ही मन कहा, आज से मैंने भी तुम्हें मुक्त किया।पहले वह उसकी एक क्षण की चुप्पी से घबरा जाती थी, जैसे उसकी जान उसमें अटकी थी। अब उसे अपने पैरों पर खड़ा होना था, ये पैर बाहर नहीं थे, मन में थे।मन जो पहले उसका इतना आश्रित बन चुका था, उसे स्वयं पर निर्भर करना था। कोई भी संबंध तभी दुख का कारण बनता है जब दो में से कोई एक हद से ज़्यादा दूसरे पर आश्रित हो। वह जैसे उसकी आँख़ों से जगत को देखती आयी थी। उसकी अपनी कोई पहचान ही नहीं थी। उसका एकमात्र काम था, उसके इशारों पर चलना, और यह भूमिका उसने ख़ुद चुनी थी, अपने पूरे होश-हवास में, वह इसे प्रेम की पराकाष्ठा समझती थी। पर अब सब कुछ बदल रहा था, आज सोचती है तो उसे लगता है, उस दिन का वह रुदन उसके नये जीवन का हास्य बनाकर आया था। अब वह उसके बिना भी मुस्कुराना सीखने लगी थी। उनके मध्य कोई कटुता नहीं थी, शायद संबंध परिपक्व हो रहे थे। शायद वे बड़े हो रहे थे। अपनी ख़ुशी के लिए किसी और पर निर्भर रहना उसकी पराधीनता स्वीकारना ही तो है। इसे प्रेम का नाम देना कितनी बड़ी ग़लतफ़हमी है। उसने यह बात सीख ली थी और अब अपने लिए छोटे-छोटे ही सही कुछ निर्णय ख़ुद लेना सीख रही थी।   


शुक्रवार, अगस्त 7

हर दिल की यही कहानी है

 हर दिल की यही कहानी है 


कुछ पाना है जग में आकर 

क्या पाना है यह ज्ञात नहीं, 

कुछ भरना है खाली मन में 

क्या भरना है आभास नहीं !

 

जो नाम कमाया व्यर्थ गया 

अब भी अपूर्णता खलती है, 

जो काम सधे पर्याप्त नहीं 

भीतर इच्छाएँ पलती हैं !

 

कर-कर के भी शमशान मिला

ना कर पाए जो पीड़ित है, 

माया मिली न ही राम मिला 

हर दिल की यही कहानी है !

 

था सार्स अभी कोरोना है 

सोयी मानवता जाग उठे, 

निज सुख खातिर दुःख न बांटें 

हर प्राण बचे जो, पाठ पढ़े !

 

क्यों भीतर झाँक नहीं देखा  

वह पूर्ण जहाँ का वासी है, 

वह दूजा न ही पराया है 

निज भाव स्रोत अविनासी है !


मंगलवार, मई 22

एक लघु कहानी



काश !

आज फिर मीता मुँह फुलाए बैठी थी. भाभी ने उसे स्कूल न जाने पर डाँटा था. आजकल उसे स्कूल जाने से ज्यादा सुंदर वस्त्र पहन कर शीशे में स्वयं को निहारना अच्छा लगने लगा था. उसने भाभी को भाई से कहते सुना था, मीता अब बड़ी हो रही है उसे इधर-उधर यूँही नहीं घूमना चाहिए. तब से भाभी की हर बात उसे बुरी लगने लगी थी. पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता तो वह क्या करे. माँ की आँखों की रौशनी कम होने लगी थी, उनकी एक आँख तो पहले से ही खराब थी अब दूसरी से भी कम दिखाई देता था. पिता अधिकतर समय के बाहर ही बिताते थे, वह एक छोटे से व्यापारी थे. घर की सारी जिम्मेदारी भाभी की थी. उनकी गोद में एक नन्हा सा पुत्र भी था पर वह सास-ससुर, दोनों देवरों और ननद की देखभाल भी ठीक से कर रही थी. यह उन दिनों की बात है जब भारत देश नया-नया आजाद हुआ था.

छमाही परीक्षा में जब वह पास नहीं हुई तो भाई ने उसे बुलाकर पूछा. मीता ने स्पष्ट कह दिया, अब वह आगे नहीं पढ़ेगी. चाहें तो उसका ब्याह करवा दें. अभी वह पन्द्रह वर्ष की भी नहीं हुई थी, आठवीं में ही पढ़ रही थी. भाई ने दफ्तर के एक सहकर्मी से बात की तो उसने कहा, मेरा भाई अभी-अभी नौकरी से लगा है, हम भी उसके लिए लड़की देख रहे हैं. बात पक्की हो गयी और विवाह हो गया. मीता के पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे. पर पति का काम ऐसा था जिसमें उसे टूर पर जाना पड़ता था. एक महीना साथ रहकर वह बाहर चला गया, मीता की तबियत खराब रहने लगी. पहले-पहल उसे कुछ समझ में नहीं आया पर बाद में पता चला वह गर्भवती थी. वर्ष पूरा होने से पहले ही एक कमजोर और सांवली सी बालिका को उसने जन्म दिया. वह स्वयं गोरी-चिट्टी थी, पहले तो बच्चे की उसने चाहना ही नहीं की थी, उसे तो सज-धज कर घूमना था, अब इस सांवली बच्ची को देखकर उसे लगा, शायद अस्पताल में किसी अन्य के साथ यह बदल गयी है. अपनी उपेक्षा से दुखी होकर दिन भर रोती रहने  वाली उस बच्ची की देखभाल वह ठीक से नहीं कर पाती थी. समय बीतता रहा, एक पुत्र और हुआ, फिर पांच वर्षों के बाद दूसरा पुत्र, जो बचपन से ही किसी न किसी रोग का शिकार होता रहा. इसके बाद भाभी ने ही अस्पताल ले जाकर मीता का ऑपरेशन करवा दिया. अपना बचपन छिन जाने का दुःख था या कौन सा क्रोध था, वह अपना गुस्सा बच्चों पर निकालने लगी. उन्हें रगड़-रगड़ कर नहलाती जब तक कि उनका तन लाल न हो जाता. साबुन लगाने से कहीं त्वचा का रंग बदलता है पर इन्सान के मन को कौन समझ पाया है. बच्चे पढ़ाई में भी कमजोर ही रहे, माँ यदि स्वयं पढ़ी-लिखी या समझदार न हो तो बच्चों की सहायता नहीं कर सकती. हाईस्कूल में बेटी असफल रही तो उसे घर बैठा दिया, और प्राइवेट परीक्षा देने को कहा. डिग्री तक आगे की सभी पढ़ाई उसने घर से ही की.  उसी समय से उसके लिए लड़का भी देखा जाने लगा. पुत्र भी कालेज में आ गया था तभी एक जगह बात पक्की हो गयी और बिटिया को विदा कर दिया. ससुराल में बेटी बहुत खुश थी, उसके भी तीन बच्चे हुए पर पचास की होने से पहले ही वह स्वर्ग सिधार गयी. उसे अपने पिता और भाई के देहांत का दुःख सता रहा था जो दस वर्ष का बेटा और पत्नी को छोड़कर अचानक ही स्वर्ग सिधार गया था. मीता पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, पुत्र की मौत का गम न सह पाने के कारण ही शायद पतिदेव ने भी वही राह पकड़ ली थी. अभी उसके पति की मृत्यु हुए ज्यादा समय नहीं गुजरा था, कि पहले बेटी की असाध्य बीमारी और फिर मृत्यु का समाचार उसे मिला. उसे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि इतना दुःख पाने के बाद भी वह सही-सलामत है. बड़ी बहू, पोता, छोटा पुत्र और उसका परिवार साथ में था. वे सभी उसकी देखभाल करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे. उसका मन अब संसार से ऊबने लगा था और ज्यादा समय वह सत्संग में बिताने लगी थी. सुबह हो या शाम जब भी समय मिलता वह आस-पास होने वाले किसी न किसी कथा सम्मेलन में पहुंच जाती. इसी तरह एक दिन जीवन की शाम आ गयी थी. अस्वस्थता ने उसे अस्पताल पहुंचा दिया था. सफेद दीवारों वाले सूने कमरे में अकेले बिस्तर पर लेटे हुए उसे अपना बचपन याद आ रहा था. काश ! वह पढ़ाई के महत्व को समझती होती तो उसका जीवन कुछ और ही होता. उसके बच्चे भी शायद इसी कारण उच्च अध्ययन नहीं कर पाए. परिवारजनों को याद करते हुए और उन्हें मंगल कामनाएं देते हुए उसने आखें मूँद लीं.

शुक्रवार, अप्रैल 20

अनगाया गीत एक





अनगाया गीत एक 


हरेक के भीतर एक छुपी है अनकही कहानी
और छुपा है एक अनगाया गीत भी
एक निर्दोष, शीतल फुहार सी हँसी भी
कैद किसी गहरे गह्वर में
बाहर आना जो चाहती
आसमान को ढक ले
एक ऐसा विश्वास भी छुपा है
और... प्रेम का तो एक समुन्दर है तरंगित
किन्तु हरेक व्यस्त है कुछ न कुछ करने में
अथवा तो कुछ न कुछ बटोरने में..
कहानियाँ और गीत सबके हिस्से में नहीं आते
हँसना भी भला कितनों के लिए जरूरी है
प्रेम और विश्वास की भली कही
प्रेम पर भी किसी का विश्वास नहीं रहा अब तो
तो कौन खोजेगा उसे
जो भीतर छिपा है एक खजाने सा अनमोल
पर जिसका नहीं है कइयों की नजरों में कोई मोल !


बुधवार, जुलाई 12

गाना होगा अनगाया गीत

गाना होगा अनगाया गीत


गंध भी प्रतीक्षा करती है
उन नासापुटों की, जो उसे सराहें
प्रसाद भी प्रतीक्षा करता है
उन हाथों की, जो उसे स्वीकार लें
जो मिला उसे बांटना होगा
होने को आये जो हो जाना होगा
गाना होगा अनगाया गीत
लुटाना होगा वह कोष भीतर छुपा   
पलकों में बंद ख्वाबों को,
रात्रि का अँधकार नहीं सुबह का उजाला चाहिए
अंतर में भरी नर्माहट को शब्दों का सहारा चाहिए
गर्माहट जो सर्दियों की धूप गयी थी भर 
अलस जो भर गयी तपती दोपहर,
उन्हें उड़ेंलना होगा
बचपन में मिले सारे दुलार को
किस्सों में सुने परी के प्यार को
चाँद पर चरखा कातती बुढ़िया
रोती-हँसती सी जापानी गुड़िया
देख-देख कर जो मुस्कान की कैद हृदय में
उसे बिखराना होगा
बारिश की पहली-पहली बौछार में
भीगने का वह सहज आनंद
हृदय में लिए नहीं जाना होगा
इस जग ने कितना-कितना भर दिया है
मनस को उजागर कर दिया है
पिता की कहानियों का वह जादूगर
जो उगाता था सोने के पेड़ और चाँदी के फल
जीवन में पाए अनायास ही वे अमोल पल
अंतहीन वक्त की कोरी चादर पर
कुछ अमोल बूटे काढ़ने हैं
राह दिखाएँ भटके हुओं को
ऐसे कई और दीपक बालने हैं !

रविवार, जून 18

बूँद यहाँ हर नयना ढलकी


बूँद यहाँ हर नयना ढलकी


जाने क्या पाने की धुन है
हर दिल में बजती रुनझुन है,
किस आशा में दौड़ लगाते
क्षण भर की ही यह गुनगुन है !

दिवस-रात हम स्वप्न देखते
इक उधेड़बुन जगते-सोते,
चैन के दो पल भी न ढूँढे
जीवन बीता हँसते-रोते !

जाने कितनी बार मिला है
फूल यही हर बार खिला है,
स्रोत खोज लें इस सौरभ का
क्यों आखिर मन करे गिला है !

करुणा भरी कहानी सबकी
एक वेदना ही ज्यों छलकी,
सुख भी मिलता साथ दुखों के
बूँद यहाँ हर नयना ढलकी !  

खुला रहस्य, राज इक गहरा
रब पर लगा न कोई पहरा,
खुली आँख भी वह दिखता है
मिलने उससे जो भी ठहरा !

सोमवार, जुलाई 20

खुदा यहीं है !


खुदा यहीं है !

नहीं, कहीं नहीं जाना है
कुछ नहीं पाना है
गीत यही गाना है
खुदा यहीं है !
एक कदम भी जो बढ़ाया
एक अरमान भी जो जगाया
एक आँसू भी जो बहाया
झपकाई एक पलक भी
तो दूर निकल जायेंगे  
इतना सूक्ष्म है वह कि
सिवा उसके, उसकी जात में
कुछ भी नहीं है
खुदा यहीं है !
अब कोई गम तो दूर
ख़ुशी की बात भी बेगानी है
अब न कोई फसाना बचा
 न ही कोई कहानी है
वह जो होकर भी नहीं सा लगता है
अजब उसकी हर बयानी है
उसको जाना यह कहना भी
मुनासिब नहीं है
खुदा यहीं है !
अब कोई सफर न कोई मंजिल बाकी
दामन में बस यह एक पल  
और कुछ भी नहीं है
खुदा यहीं है !
नहीं चाहत किसी को समझाने की
 बेबूझ सी इस बात पर
करता कौन यकीं है
खुदा यहीं है !