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शुक्रवार, अप्रैल 14

आये पर्व अनोखे


आये पर्व अनोखे

जब बजे ढोल, नाचते  कृषक

झूमी फसलें, ह्रदय में पुलक ! 


‘नब बर्ष’  बंगाल में आये

‘पुत्तांडु’ सभी तमिल मनायें !


केरल में पावन  ‘पूरम विशु’

असम में ‘रोंगाली  बीहू’!


गुरूद्वारों में द्युति छायी

तब प्यारी बैसाखी आयी !


धूम मचाती भाती हर मन

जन्म खालसा हुआ इसी दिन !


अमृत छकया पंच प्यारों ने

गुरुसाहब की याद दिलाने !


भँगड़ा  गिद्दा होड़ लगाते

घर बाहर रोशन हो जाते !


सब के मन पर मस्ती छायी  

तब प्यारी बैसाखी आयी !


शनिवार, जनवरी 14

भारत का हर पर्व अनोखा

भारत का हर पर्व अनोखा 


लोहरी की पावन अग्नि  में 

सपनों के शुभ  रंग बिखरते, 

देश तरक़्क़ी करे विश्व सँग 

भारतवासी यही माँगते !


सबको साथ लिए चलना है 

वसुंधरा है एक परिवार, 

भारत का हर पर्व अनोखा 

जगा रहा हर हृदय  में प्यार !


मिलकर आज पतंग उड़ाएँ 

वितरण किए तिल गुड़ मिष्ठान, 

खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण करें  

चिवड़ा दही लगते पकवान !


थोड़े में ही सुख मिलता है 

सिखा रहा पोंगल, बीहू भी, 

फसल काटने की ऋतु आयी 

व्यक्त करें आभार कृषक भी !


सारा भारत इक ही सुर में 

पर्व मकर संक्रांति मनाए, 

धरती, सूरज, वनस्पति संग  

 मानव मिल सुर-ताल मिलाए !


संस्कृति है यह कैसी अद्भुत

  क़ीमत इसकी वही जानता, 

मानवता की ख़ुशबू जिसमें 

भारत को जो मातृ मानता !


मंगलवार, अक्टूबर 25

दिवाली की अगली भोर

दिवाली की अगली भोर 


सूर्य ग्रहण लगने वाला है 

किंतु अभी है शेष  उजाला 

उन दीयों का 

जो बाले थे बीती रात 

जगमग हुईं थी राहें सारी 

गली-गली, हर कोना भू का 

चमक उठा था जिनकी प्रभा से 

ज्योति प्रेम की झलक रही थी 

आशा व विश्वास जगाती 

नयी भोर का 

भर लें मन में नीर कृपा का 

देवी माँ का उजला मुखड़ा

उठा वरद हस्त गणपति का 

कान्हा की मोहक मुस्कान 

हर आँगन में देव उतरते

सँग मानव के क्रीड़ा करते 

विमल प्रेम, उल्लास धरा पर 

युग-युग से लाते 

वे ही चमक हैं भारत माँ की 

देवों के सँग बातें दिल की 

गुरू ज्ञान भी 

अंधकार हर रहे मिटाता 

एक वर्ष फिर करें प्रतीक्षा 

युग-युग से यह पर्व अनोखा 

भर उमंग नव राह दिखाता !




रविवार, फ़रवरी 8

शुभकामना

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,

आज ही इस वर्ष की पहली यात्रा पर निकलना है, सो आने वाले शिवरात्रि के पर्व के लिए शुभकामना के साथ दो सप्ताहों के लिए विदा.

महाशिवरात्रि

ब्रह्मा रचते, विष्णु पालक, हे शिव ! तुम हो संहारक
तीनों देव बसें मानव में तीनों जन-जन उद्धारक !

किन्तु आज शक्ति के मद में, भुला दिये मूल्य मानव ने
स्व-विनाश की करे व्यवस्था, जगह देव की ली दानव ने !

दुरूपयोग सृजन शक्ति का, व्यर्थ आणविक अस्त्र बनाये
पंचतत्व को करता दूषित, अपनी बुद्धि पर इतराए !

पालन करना भूल गया वह, विष्णु को है दिया सुला
असुरों का ही खेल चल रहा, देवत्व को दिया भुला !

हे शिव ! प्रकटो, मृत हो कण-कण, नव जीवन पुनः पाये
सड़ा गला जो भी है बासी, हो पुनर्गठित खिल जाये !

हे काल पुरुष ! हे महाकाल ! हे प्रलयंकर ! हे अभयंकर !
कर दो लीला, जड़ हो चेतन व्यापे विप्लव, हे अग्निधर !

सदियों से जो लगी समाधि, तोड़ नेत्र खोलो अपना   
कल्याणमय हे शिव शम्भु ! परिवर्तन न रहे सपना !  

तुम महादेव ! हे देव देव ! कर तांडव सृष्टि को बदलो
जल जाये लोभ का असुर आज, चेतना अंतर की बदलो !

हे पशुपति ! पशुत्व मिटाओ मानव की गरिमा लौटे
अज्ञान मिटे, अमृत बरसे गुमी हुई महिमा लौटे !

सर्प धर ! हे सोमेश्वर ! प्रकटो हे सौम्य चन्द्रशेखर !
मुंडमाल, जटा धारी, हे त्र्यम्बकम ! हे विश्वेश्वर !

तुम शमशान की राख लपेटे वैरागी भोले बाबा !
हे नीलकंठ ! गंगाधारी ! स्थिर मना, हे सुखदाता !

तुम करो गर्जना आज पुनः, हो जाये महा प्रलय भीषण  
हे बाघम्बर ! डमरू बोले, हो जाये विलय हर एक दूषण !  

शुभ शक्ति जगे यह देश बढ़े सन्मार्ग चलें हर नर-नारी
हे अर्धनारीश्वर ! हे महेश ! हे निराकार ! हे त्रिपुरारी !

धर्म तुम्हारा सुंदर वाहन, नंदी वाहक ! हे रसराज !  
हे अनादि ! अगम ! अगोचर ! काल भैरव ! हे नटराज !

बुधवार, अक्टूबर 12

एक बार दीवाली ऐसी


एक बार दीवाली ऐसी


बाहर दीप जलाये अनगिन
भीतर रही अमावस काली,
ज्योति पर्व मने कुछ ऐसा
मन अंतर छाये उजियाली !

तन का पोर-पोर उजला हो
फूट-फूट कर बहे ऊर्जा,
सुगठित, स्वच्छ, स्वस्थ देह में
दीप जले इक नव उमंग का !

प्राण में न कम्पन होता हो
सधा, सहज वह आये जाए,
श्वासों की सुंदर माला से
हृदय गुफा में देव रिझाएँ !

मन प्रांगण को भाव से लीपें
तृप्ति का अमृत जल छिडकें,
सत्य शिला पर शिव बैठे हों
सुंदर गीत रचें भक्ति के !

प्रज्ञा की इक बेल उगी हो
शील, समाधि के फल आयें,
भीतर इक उजास बिखरी हो
वाणी में भी जो छलकाए !

तब बिखरेगी हँसी फुलझड़ी
आनंद का अनार फूटेगा,
मुस्कानों के दीप जलेंगे
झर-झर कर आलोक बहेगा !

सिहर-सिहर जायेगी कालिमा
तमस रात्रि उजियारी होगी,
प्रेम सुरभि महका कर शोभित
ज्योति की फुलवारी होगी !

नयनों से फूटेंगी किरणें
अधरों से इक खनक नशीली,
मन से प्रेम प्रकाश बहेगा
वाणी से इक दुआ रसीली !

दीवाली का अर्थ यही है
मन का तमस विदा हो जाये,
तृष्णा कीट जलें अग्नि में
अंतर से अकुलाहट जाये !

पंचकोश पावन हों भीतर
नव द्वार फिर आलोकित हों,
दशम द्वार से परिचय पालें
उस पाहुन का स्वागत हो !

एक बार दीवाली ऐसी
जगमग जग अपना कर देगी,
सदा-सदा को मन मंदिर में
ज्योतिर्मय सपना भर देगी !