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गुरुवार, सितंबर 5

शिक्षक का यही इरादा है

शिक्षक का यही इरादा है 


शिक्षा की ज्योति जले मन में 

शिक्षक का यही इरादा है, 

पढ़-लिख कर ख़ुद को पहचाने 

उसका इतना ही वादा है !


केवल बने किताबी कीड़ा 

इससे कब कुछ भी हल होगा ?

संबंधों की गरिमा समझे 

अध्यापन तभी सफल होगा !


इस धरती से क्या रिश्ता है 

भारत भू से पावन नाता, 

विज्ञान, गणित, इतिहास,वेद   

शिक्षक श्रद्धा से सिखलाता !


विकसित हो मन, हो बुद्धि प्रखर 

 हाथ थाम वह दिशा दिखाए, 

अज्ञानता के अंधकार में 

प्रज्ज्वलित राह निकल आये !


शिक्षक संस्कृतियों  का रक्षक 

कल से जुड़ भविष्य  दिखलाए, 

कोमल पौधों को दे पोषण 

सबल बृहत् वटवृक्ष बनाये !


शनिवार, जनवरी 14

भारत का हर पर्व अनोखा

भारत का हर पर्व अनोखा 


लोहरी की पावन अग्नि  में 

सपनों के शुभ  रंग बिखरते, 

देश तरक़्क़ी करे विश्व सँग 

भारतवासी यही माँगते !


सबको साथ लिए चलना है 

वसुंधरा है एक परिवार, 

भारत का हर पर्व अनोखा 

जगा रहा हर हृदय  में प्यार !


मिलकर आज पतंग उड़ाएँ 

वितरण किए तिल गुड़ मिष्ठान, 

खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण करें  

चिवड़ा दही लगते पकवान !


थोड़े में ही सुख मिलता है 

सिखा रहा पोंगल, बीहू भी, 

फसल काटने की ऋतु आयी 

व्यक्त करें आभार कृषक भी !


सारा भारत इक ही सुर में 

पर्व मकर संक्रांति मनाए, 

धरती, सूरज, वनस्पति संग  

 मानव मिल सुर-ताल मिलाए !


संस्कृति है यह कैसी अद्भुत

  क़ीमत इसकी वही जानता, 

मानवता की ख़ुशबू जिसमें 

भारत को जो मातृ मानता !


बुधवार, नवंबर 9

भारत



भारत 

‘देने’ को कुछ न रहा हो शेष 
जब आदमी के पास 
तब कितना निरीह होता है वह 
देना ही उसे आदमी बनाये रखता है 
मांगना मरण समान है 
खो जाता जिसमें हर सम्मान है !
देना जारी रहे पर किसी को मांगना न पड़े 
ऐसी विधि सिखा रहा आज हिंदुस्तान है !
पिता जैसे देता है पुत्र को 
माँ  जैसे बांटती है अपनी सन्तानों को 
उसी प्रेम को 
भारत के जन-जन में प्रकट होना है 
ताकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ 
मानने वाली इस संस्कृति की 
बची रहे आन, आँच न आए उसे !
जहां अनुशासन और संयम 
केवल शब्द नहीं हैं शब्दकोश के 
यहां समर्पण और भक्ति
 कोरी धारणाएं नहीं हैं !
यहां परमात्मा को सिद्ध नहीं करना पड़ता 
वह विराजमान है घर-घर में 
कुलदेवी, ग्राम देवी और भारत माता के रूप में 
वह देश अब आगे बढ़  रहा है !
और दिखा रहा है सत्मार्ग 
विश्व को अपने शाश्वत ज्ञान से ! 

शनिवार, मई 16

शब्द बीज


शब्द बीज

भीतर कहीं शब्दों के बीज गिरे थे 
कुछ प्रिय और कुछ अप्रिय शब्दों के बीज 
जिनसे उगते रहते हैं नए- नए शब्द 
फिर वे बुन लेते हैं एक अदृश्य जाल
संस्कृति और सभ्यता ने सौंपे कुछ शब्द 
माता-पिता, समाज, किताबों से मिले 
चन्द भारी शब्द बो दिए जाते हैं 
बालक के मन में 
जीवन भर जिनकी फसल काटता रहता है वह
भाषा साधन है तो उसका दुरुपयोग भी बहुत हुआ है 
शब्दों ने मानव की आत्मा को ढक लिया है 
वह प्रकट होना चाहती है 
पर कोई न कोई पहरे पर खड़ा है 
जीवन हर बार किसी शब्द से टकराकर 
औंधे मुँह पड़ा  है !

शनिवार, जनवरी 25

देश अपना फले-फूले

गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें


देश अपना फले-फूले

संस्कृति अद्धभुत यहाँ की 
सृष्टि के नव राज खोले, 
पूर्वजों ने दी विरासत 
वेद की हर ऋचा बोले !

धर्म के पथ पर चलें सब 
अर्थ का भंडार भर लें, 
कामना भी पूर्ण होगी 
मोक्ष का भी स्वाद चख लें !

पांव धरती पर टिके हों 
भाव जिसके गगन छू लें, 
सृष्टि कण-कण से जुड़े रह 
मर्म जीवन का समझ ले !

सम रहे जो धीर वह है 
लक्ष्य साधे वीर वह है, 
जीत का ही स्वर सुनाई
दे रहा हर कोण से है  !

जन्म से कोई न ब्राह्मण 
कर्म ही यह तय करेगा, 
परम भी यदि अवतरित हो 
कर्म का वह फल भरेगा !

अमर ऐसा देश अपना 
नभ की ऊँचाई छू ले, 
गा रहा हर देशवासी 
देश अपना फले-फूले !

शुक्रवार, जनवरी 26

जैसे चन्द्र चमकता नभ में



गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित 

जैसे चन्द्र चमकता नभ में


भूमंडल पर देश सैकड़ों
भारत की है बात निराली,
जैसे चन्द्र चमकता नभ में
दिपदिप भारत की फुलवारी !

जिओ और जीने दो’ का यह   
मन्त्र सिखाता सारे जग को,
योग शक्ति से खुद को पायें
राह दिखाता हर मानव को !

प्रकृति का सम्मान करें सभी
शांति पाठ का गायन निशदिन,
मूषक, मोर, बैल वन्दित हैं
हर प्राणी का स्थान है उचित !

गौरवशाली परंपरा है
देवों से साहस पाता है,
सृष्टि के कई भेद जानता
युद्धों में गीता गाता है

मेधा, प्रज्ञा, समझ जगाता
सुप्त चेतना परम जगाकर,
दुनिया में परचम लहराता
वैदिक संस्कृति को पुनः लाकर !

भारत देश जवानों का है
श्रमिकों और किसानों का है,
जागरूक महिलाओं का भी
अलबेले दीवानों का है !

शनिवार, जनवरी 2

नया साल मुबारक हो

नया साल

घड़ी की सुईयां जब आधी रात को मिलेंगी
विदा हो जायेगा वक्त का एक वह टुकड़ा
जिसे नाम दिया है हमने ‘दो हजार पन्द्रह’
...और सुगबुगा कर आँख खोलेगा एक नया कालखंड
दिखाकर अपना सुनहरा मुखड़ा !

नये वर्ष में होंगे नए दिन और नयी रातें
नये सूर्योदयों और नव चन्द्रमा से होंगी मुलाकातें
आज तक नहीं घटा सृष्टि में
नया वर्ष उन दिनों, हफ्तों और महीनों को घटायेगा
नये वर्ष में हर फूल पहली बार मुस्कुराएगा
नया इरादा फिर क्यों न करें
नया वादा भी अपने आप से
नये संकल्प कर मनों में
नव शक्ति भरें शुभ जाप से !

पुरानी पर स्वयं के लिए नव, संस्कृति से पहचान करें
जिनसे नहीं मिले बरसों से
उन इतिहास के पन्नों से जान-पहचान करें
नया परिचय हो अपने पुराने देश से
डाल आँखों में आँख मिलें चहूँ परिवेश से
बरसों से भूले हैं काम वे नये करें
नये कुछ मित्र बनें, नये कुछ रंग भरें
आदतों में कैद जो जीवन घट रीत रहा
नये संकल्प भर इसमें नव राग भरें !

बीत गया वक्त जो यादों में बोझ बना
रख दें उतार पल में
अंतर को खाली करें
नये स्वप्नों का करने स्वागत
 लायेगा जो वर्ष आगत  
नव वर्ष कुछ नया तो लायेगा
जीवन कुछ और ढंग से गुनगुनाएगा
धरा उसी तरह चक्कर लगाएगी सूर्य का
पर सूर्य कुछ और वृद्ध हो जायेगा
नये इरादों के पहन कवच
क्यों न उतरें समय की इस भंवर में
नये वर्ष में सराबोर हो जाएँ
उत्साह और उमंग की लहर में !

शुक्रवार, अगस्त 26

तब और अब


तब और अब

जब छोटा सा था जीवन अपना
दुनिया बहुत बड़ी लगती थी
जीवन का विस्तार हो गया
दुनिया छोटी हुई जाती है
कालाहांडी की बस्ती में
बैठ एक ग्रामीण भी देख सकता है
आज फुटबाल का विश्व कप  
घर बैठे पा सकता है सब कुछ
दुनिया छोटी हुई जा रही है
और सिकुड़ता जा रहा है
आदमी का कद भी
उसी अनुपात में !
 बंधती जा रही है
उसके दिल की सीमा भी
अब नहीं समाते एक ही घर में
दादी, बुआ, चाचा
चचेरे, ममेरे भाई-बहन नहीं खेलते एक आंगन में
छोटे हो गए हैं दिल सबके
और जेबें हैं कि भरती जातीं
दूर विदेश में बैठ दिल्ली (या मुंबई) के होटल
को उड़ा सकता है आतंकवादी
और एक बटन दबाते ही फट सकते हैं बम
बौनी होती जा रही संस्कृति में
सब कुछ कितना पास आ गया है
हाथ बढ़ाकर ले लो
जापान की घडियां, कारें और
मिल जाएँगी मोह्हले की दुकान में हर देश की वस्तुएं
पर नहीं मिलेंगे मानव
जो समेटे थे सागर सी गहराई
 और हिमालय सी ऊंचाई
जिनमें समा जाता था पूरी मानवता का दर्द
जिनके सीने थे इतने विशाल
कि मिल जाती थी पूरे मुल्क की पीड़ा को पनाह
आज नेता अपने परिवार को नहीं सम्भाल पाते
देश की कौन कहे...
दुनिया छोटी हुई है जबसे, दिल भी...