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शनिवार, जून 1

कितना झूठ हक़ीक़त कितनी

विजय माल कौन पहनेगा 


अबकी बार चार सौ पार 

चला यह नारा बारम्बार, 

लोकतंत्र के भवसागर से 

यही करेगा बेड़ा पार !


दुनिया देख रही भौंचक्की 

बना चुनाव एक त्योहार, 

नेताओं का बड़बोलापन 

शब्दों की दुधारी तलवार !


कितना झूठ हक़ीक़त कितनी 

चाहे परखना हर पत्रकार, 

किंतु अजब पहेली इसकी 

कोई न पाये पारावार !


दिवस-रात्रि एक कर डाले 

सोना-जगना भी दुश्वार,

अब जाकर आराम मिला है 

जब से पकड़ी थी रफ़्तार !


छुपा हुआ है इवीएम में 

राज बना चुनाव का रार, 

विजय माल कौन पहनेगा 

किसको मिली करारी हार !


मंगलवार, जून 27

जीवन एक पहेली जैसा !



जीवन एक पहेली जैसा !

जीवन यह संदेश सुनहरा !


छोटा  मन  विराट हो  फैले

ज्यों बूंद बने सागर अपार,

नव कलिका से  कुसुम पल्लवित 

क्षुद्र बीज बने वृक्ष विशाल !


जीवन कौतुक एक अनोखा  !


मन यदि अमन बना सुध भूले

खो जाएं बूँदें सागर  में,

रूप बदल जाए कलिका का

मिट कर बीज मिलें माटी में I


जीवन अवसर एक आखिरी  !


किंतु कोई न मिटना चाहे

मन सुगीत सदा दोहराए

मानव ‘मै’ होकर ही जग में

कैसे आसमान छू पाए I


जीवन एक पहेली जैसा !


हो जाएँ यदि रिक्त स्वयं से

बूंद बहेगी बन के सरिता

स्वप्न सुप्त कलिका खिलने का

पनपेगा फिर बीज अनछुआ