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शुक्रवार, सितंबर 27

सत्य-असत्य

सत्य-असत्य 


असत्य की हल्की सी रेखा भी 

सत्य के हिमालय को छुपा देती है 

जैसे आँख में पड़ा धूल का एक कण 

विस्तीर्ण गगन को 

चाह की एक हल्की सी चिंगारी भी 

मन के चैन को जला देती है 

जैसे विष की एक बूँद 

सारे कूप को बना देती है विषैला 

उसके पास जाना हो 

तो निर्मल रखना होगा मन को 

दानवों का अधिकार हो जाता है 

यदि कपट हो ह्रदय में 

निःस्वार्थ, निष्पाप और निर्द्वंद्व 

ही मिल सकता है 

उस निसंग, निरंजन से 

और तब शांति की अजस्र धाराएँ 

चारों ओर से 

दौड़ी चली आती हैं 

उग आते हैं पुष्प उद्यान, मन प्रांगण में 

और गूंजने लगती है सरगम श्वासों में 

सत्य की ही विजय होती है 

असत्य तो पहले से ही पराजित है 

चिर पराजित ! 


शनिवार, जून 1

कितना झूठ हक़ीक़त कितनी

विजय माल कौन पहनेगा 


अबकी बार चार सौ पार 

चला यह नारा बारम्बार, 

लोकतंत्र के भवसागर से 

यही करेगा बेड़ा पार !


दुनिया देख रही भौंचक्की 

बना चुनाव एक त्योहार, 

नेताओं का बड़बोलापन 

शब्दों की दुधारी तलवार !


कितना झूठ हक़ीक़त कितनी 

चाहे परखना हर पत्रकार, 

किंतु अजब पहेली इसकी 

कोई न पाये पारावार !


दिवस-रात्रि एक कर डाले 

सोना-जगना भी दुश्वार,

अब जाकर आराम मिला है 

जब से पकड़ी थी रफ़्तार !


छुपा हुआ है इवीएम में 

राज बना चुनाव का रार, 

विजय माल कौन पहनेगा 

किसको मिली करारी हार !


बुधवार, जून 21

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं




दोराहे हर मोड़ खड़े हैं



कहीं प्रज्ज्वलित अग्नि शिखा सी
कहीं धुँए से ढकी सुलगती,
कहीं सुगंधित अनिल बह रही
कहीं घुटन से फिजां रुँधी सी !

जीवन मिले बिछाय बिसातें 
चाहे जिस पाले में जाएँ,
पल-पल चुनना स्वयं को यहाँ
किसे सहेजें किसे लुटाएं !

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं
निज हाथों में ही गेंद सदा,
हों स्वतंत्र हर दांवपेंच में
काटेंगे खुद का ही बोया !

एक ही नियम एक सदुपाय
जागे-जागे कदम बढ़े हर,
सूत्र यही इस खेल का सहज
यही बहे बन विजय का सुस्वर !

शुक्रवार, दिसंबर 18

सृष्टि भरपूर है

सृष्टि भरपूर है


आज जो पंक है वही कल कमल बनेगा
अश्रु जो झरता है.. मन अमल बनेगा
अभी जो खलिश है भीतर वही कल स्वर्ग रचेगी
आज के जागरण से.. कल गहन समाधि घटेगी
सृष्टि भरपूर है प्रतिपल लुटाती है
जिसकी आज चाह उपजी कल उसे भर जाती है
बेमानी है अभाव की बात
यहाँ बरसता है पल-पल अस्तित्त्व
बस खाली कर दामन पुकारना है एक बार
रख देना मन को बना सु-मन उसके द्वार
माना कि शंका के दस्यु हैं, दानव भी भय के
पर विजय का स्वाद.. नहीं चखेंगे वे
निकट ही है उषा ज्ञान सूर्य उदित होगा
नजर नहीं आयेंगे तब भय और शंका
मुस्कुराएगी सारी कायनात संग में
आँखों में अश्रु भरे हर्ष और उल्लास के !



गुरुवार, जुलाई 3

मन हिरणी पर कब ठहरी थी


 मन हिरणी पर कब ठहरी थी 

कितनी बार द्वार तक आया
पर पहचान नहीं पाए हम,
उसने अपना वचन निभाया
लेकिन जान नहीं पाए हम !

दस्तक दी, पुकार लगाई
अपनी नींद बड़ी गहरी थी,
उसने खतो-किताबत भी की
मन हिरणी पर कब ठहरी थी !

वृन्दावन से आया जोगी
झोली फैलाई थी उसने,
कृपण बड़ा मन नादां जिसने
किये कपाट बंद हृदय के !

पीरों से संदेश सुनवाये
फिर भी न जागे, न देखा,
विजय दिलाने को आतुर था
बंद पड़ी किस्मत की रेखा !

अब बैठा बस सिर धुनता है
अपनी भूलों को गुनता है,
नजर लगी हर पल द्वार पर
आयेगा सपने बुनता है !