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गुरुवार, अप्रैल 24

गुलाब और वह

गुलाब और वह


पूछा गुलाब से
 उसकी ख़ुशी का राज
काँटों में भी मुस्कुराने का
देख अनोखा अंदाज
रंगो-खुशबू की कर रहा था
अनायास ही बरसात
धूप-हवा पानी में
झूमता दिन रात !

बोला, उससे पहले
हँस दिया खिलखिला कर  
हुई दिशाएं लाल
उसकी मोहक अदा पर
चाहा सदा ही गुलाब होना
होकर कभी न पछताया
नहीं कुछ अन्यथा होने का
भाव भी मन में आया
सत्य हूँ सत्य को स्वीकारता
जैसा हूँ उसे ही अपना होना मानता !

चौंका वह बात सुन गुलाब की
कुछ और हो जाने की
जो भीतर जलती थी आग
हो आई बड़ी ही शिद्धत से याद
अचानक उतर गया कोई बोझ भारी मन से
भर गया कण-कण किसी अनजानी पुलक से
एक गहरी मुस्कान भीतर से सतह पर आई
जन्मों से छिपी थी जो तृप्ति छलक आई !




गुरुवार, जनवरी 12

गीत समर्पण का गाते हैं


गीत समर्पण का गाते हैं

पुलक भरे जब अपने उर में
साँझ ढले झर जाते हैं,
सँग हवा के इक झोंके पर
झूम झूम इठलाते हैं !

मनहर, कोमल, पुष्प धरा पर
गीत समर्पण का गाते हैं !

लय और गति के सँग बंधे
निज कक्षा में रह सिमटे,
जाने किस अनादि काल से
मंद मंद मुस्काते हैं !

चाँद सितारे ऊपर नभ में
गीत समर्पण का गाते हैं !