गीत समर्पण का गाते हैं
पुलक भरे जब अपने उर में
साँझ ढले झर जाते हैं,
सँग हवा के इक झोंके पर
झूम झूम इठलाते हैं !
मनहर, कोमल, पुष्प धरा पर
गीत समर्पण का गाते हैं !
लय और गति के सँग बंधे
निज कक्षा में रह सिमटे,
जाने किस अनादि काल से
मंद मंद मुस्काते हैं !
चाँद सितारे ऊपर नभ में
गीत समर्पण का गाते हैं !