टूटी अंतर की हर कारा
जिस क्षण तजा प्रमाद मनस ने
एक उमंग सहज भर जाती,
कुछ पाने की मिटी चाह जब
हर दुविधा भी संग मर जाती !
एक उमंग सहज भर जाती,
कुछ पाने की मिटी चाह जब
हर दुविधा भी संग मर जाती !
लोभ-लाभ की भाषा भूली
प्रतिद्वंद, स्पर्धा भी छूटे,
चित्त उदार बनेगा, उस क्षण
आनंद घट हृदय में फूटे !
प्रतिद्वंद, स्पर्धा भी छूटे,
चित्त उदार बनेगा, उस क्षण
आनंद घट हृदय में फूटे !
कंपित था भयभीत हुआ मन
खो जाए ना प्रेम किसी क्षण,
अभय मिला बाँटा भी सबको
शुभ का निर्झर फूटा उर में !
खो जाए ना प्रेम किसी क्षण,
अभय मिला बाँटा भी सबको
शुभ का निर्झर फूटा उर में !
भय की इक चट्टान पड़ी थी
रोक रही थी प्रेमिल धारा,
राह उसी की चला दो कदम
टूटी अंतर की हर कारा !
रोक रही थी प्रेमिल धारा,
राह उसी की चला दो कदम
टूटी अंतर की हर कारा !
दुःख के बादल सदा घिरे थे
सुख का सूरज कब दिखता था,
जब से झुका हृदय चरणों पर
मिटा विषाद अमोद बहा था !
सुख का सूरज कब दिखता था,
जब से झुका हृदय चरणों पर
मिटा विषाद अमोद बहा था !

