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रविवार, अगस्त 1

टूटी अंतर की हर कारा

टूटी अंतर की हर कारा 

जिस क्षण तजा प्रमाद मनस ने 
एक उमंग सहज भर जाती, 
कुछ पाने की मिटी चाह जब 
हर दुविधा भी संग मर जाती !

लोभ-लाभ की भाषा भूली 
प्रतिद्वंद, स्पर्धा भी छूटे, 
चित्त उदार बनेगा, उस क्षण 
आनंद घट हृदय में फूटे !

कंपित था भयभीत हुआ मन 
खो जाए ना प्रेम किसी क्षण, 
अभय मिला बाँटा भी सबको 
शुभ  का निर्झर फूटा उर में !

भय की इक चट्टान पड़ी थी 
रोक रही थी प्रेमिल धारा, 
 राह उसी की चला दो कदम 
टूटी अंतर की हर कारा !

दुःख के बादल सदा घिरे थे 
सुख का सूरज कब दिखता था, 
जब से झुका हृदय चरणों पर 
मिटा विषाद अमोद बहा था !


बुधवार, जून 24

योगी

योगी 

प्रमाद की नींद पर 
कभी सुदिन खड़ा नहीं होता 
यह सही है, जब जाग जाए मन 
तभी उसके लिए सवेरा होता !

वे  विलग हैं,अनोखे हैं 
 स्वार्थ उन्हें नहीं चलाता
उनकी ऊर्जा का स्रोत अहंकार से नहीं 
परमात्मा से है आता !

भय से भाग खड़े हों
या क्रोध से करें सामना 
यह सामान्य जन करते होंगे 
विपदा आने पर, 
वे योगारूढ़ हो 
शांत मन से करते हैं मुकाबला 
भीतर ठहर कर !

न लाभ की चिंता है उन्हें 
लोभ नहीं डुलाता
निमित्त बने हैं किसी के, कर्ता वही है 
 उसका काम करना भाता !

ध्यान और समर्पण की गंगा 
जहाँ दिन-रात बहती है, 
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के पीछे 
तुरीया स्वतः ही रहस्य खोल देती है !
अँधेरे में जग जल रहा हो 
जब अज्ञान के हाथों 
ज्ञान की आँख ही उसको 
बचा सकती है !  

गुरुवार, दिसंबर 29

मन में है अपार ऊर्जा


नए वर्ष के लिये कुछ और संकल्प


श्रेष्ठ का चुनाव सदा हो, कुछ भी हेय न हो जीवन में
प्रेय मार्ग पर बहुत चल लिये, श्रेय सधे अब तो जीवन में

मन में है अपार ऊर्जा, सुप्त कहीं न रह जाये
जहाँ पहुंचने की ठानी है, स्वप्न भी उसका ही आये

जो भी जिस क्षण जीवन दे दे, सहज सदा स्वीकार रहे
कोई नहीं कामना व्यापे, परम का ही आधार रहे

भाग्य बना करता है उनका, जो प्रमाद नहीं करते
एक भूल छोटी सी ही हो, देती घाव, नहीं भरते

आगे बढ़ते-बढ़ते जीवन, पीछे लौट नहीं आये
भीतर कोई जाग गया हो, पुनः कभी न सो जाये