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रविवार, अक्टूबर 14

तुम ही हो नव भक्ति स्वरूपा



तुम ही हो नव भक्ति स्वरूपा



नाम हजारों जग जननी के
है अनंत शुभ शक्ति स्वरूपा,
दया रूपिणी ! उर अंतर में
तुम ही हो नव भक्ति स्वरूपा !

सारा जग तुमसे प्रेरित हो
गतिमय निशदिन स्पंदित होता,
तुम्हीं सृष्टि जन्माती हो माँ
तुमसे जग विस्तार पा रहा !

अष्ट भुजाओं वाली देवी
समृद्धि, सुख दे शांति भर रही,
अविरल, अविरत बहे पावनी
कृपा तुम्हारी सदा झर रही !

तुम्हीं भैरवी, रुद्राणी भी
विद्या दात्री माँ भवानी,
महालक्ष्मी, पार्वती माता
गंगा, तुलसी, तुम्हीं शिवानी !

कुष्मांडा, शैल पुत्री भी
गौरी, भद्रा, दुर्गा काली,
चन्द्र घंटा व ब्रह्मचारिणी
तुम्हीं वैष्णवी शेरों वाली !

दया, क्षमा, करुणा व सरलता
लज्जा, कांति, तुम्हीं हो मेधा,
क्षुधा, पिपासा रूप में रहो
यज्ञ तुम्हीं तुम से ही समिधा !

जागो ! हे जगदम्बा ! उर में
मर्म साधना का हम जानें,
ज्योति जगे अंतर में दिपदिप
जीवन रहते ही पहचानें !


शुक्रवार, अगस्त 2

सदियों से थिर थे जो पर्वत

सदियों से थिर थे जो पर्वत

उतरी है गोमुख से गंगा
गंगोत्री में तनिक ठहरती,
हिम शिखरों से ले शीतल जल
 चट्टानों में मार्ग बनाती !

भीम वेग, सौन्दर्य अनोखा
लख ऋषियों ने गाए स्त्रोत,
उर जल राशि अपार समेटे
करती भूमि को ओत प्रोत !

आज हुई है रुष्ट क्यों जाने
बहा ले गयी जड़-चेतन सब,
मन्दाकिनी, जो प्राण दायिनी
नाचे काल भैरवी सी अब !

जान्हवी की पावन धारा
बनी साक्षी इस विनाश की,
सदियों से थिर थे जो पर्वत
बिखरे ज्यूँ इमारत ताश की !

गंगा की सप्त धाराएँ
मिलकर एक हुईं जिस जगह,
आज बनी श्मशान बिलखती
देव भूमि अनाथ की तरह !

किन्तु थमेगा तांडव शिव का
नर-नारायण पुनः मिलेंगे,
शेष रहा जो पनपेगा फिर
गंगा के तट पुनः बसेंगे !