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बुधवार, अगस्त 28

शिवालय

शिवालय


कठिन है यात्रा कैलाश की

जहाँ मानसरोवर के निकट  

शिव का आवास है 

इसलिए उतर आये हैं शिव 

स्वयं काशी में 

गंगा तट पर किया प्रवास है 

सुगम है काशी जाना 

शिव को पाना 

फिर भी यदि कहे कोई 

दूर है काशी 

हर गाँव हर शहर में 

शिव बसते हैं 

मंदिर और शिवालय की चौखट भी 

यदि नहीं लांघी जाती 

तो स्वयं का मस्तक ही 

शिव का घर जान लें 

हर हर गंगे कहते 

सिर पर एक लोटा जल डाल लें 

उतर आएगी कैलाश की शीतलता 

भीतर कोई कहेगा 

ह्रदय गुफा में शिव का वास है 

जहाँ बसता परम उल्लास है !


शुक्रवार, अगस्त 23

चुपके से जब दिल की साँकल

चुपके से जब दिल की साँकल 


दिल की गहराई में शायद 

गोमुख एक छिपा रखा है, 

गंगा जिस दिन बह निकलेगी 

उस दिन सारे राज खुलेंगे !


सारे पत्थर ‘मैं’ और ‘तू’ के 

चूर चूर हो बह जाएँगे, 

छलक-छलक कर जल के धारे

रस में हमें भिगो जाएँगे !


कितनी परिचित सी है गाथा 

वह अनमोल घड़ी आयी थी,  

चुपके से जब दिल की साँकल 

तुमने आकर खड़कायी थी !


बुधवार, जून 9

नूतन तरु के गात हो रहे

 नूतन तरु के गात हो रहे 

निर्मल गंगाजल से बहते  

तुम ही श्यामल घन बन बरसे, 

चिन्मय ! चेतनता बन रहते 

है कण-कण में गति भी तुमसे !


खो, पुनः-पुनः तुम्हें पाना है 

जैसे दिन और रात हो रहे, 

नित नवीन संबंध जुड़े ज्यों 

 नूतन तरु के गात हो रहे !


शब्दों को आशय तुम देते 

वाणी के तुम संवाहक हो, 

तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं 

शुभता के शाश्वत वाहक हो !


तुम बिन रहे अधूरा सा सब 

जीवन अर्थवान हो तुमसे, 

मननशील हो मानस जिनका 

मनुज वही बन पाते ऐसे !


मंगलवार, जुलाई 7

जिंदगी खुद राज अपने

जिंदगी खुद राज अपने 

व्यर्थ जो भी छूट जाये 
सार्थक हृदय को लुभाये, 
जिंदगी खुद राज अपने 
खोल मंजिल पर बिठाये !

बस यही इक प्रार्थना हो
मौन गीतों में गुजाएँ, 
चाह का हर बीज जलकर 
रिक्त हो मन गुनगुनाये !

जो तुम्हारी कामना हो 
हाथ से वह कर्म हो अब, 
जो नचाता था अभी तक 
हुक्म मन तेरा बजाए !

विमल गंगा बन बहा है 
ज्ञान गीता का कहा है, 
धर्म तुझसे पल रहा है 
सत्य का यह ध्वज बताये !

सोमवार, जून 8

चमत्कार

चमत्कार 


कृष्ण की कथा चमत्कारों से भरी है !
पर हमारी कथा भी उनसे रिक्त है कहाँ ?
कौन करता रहा
सदा विपदाओं में सुरक्षा 
किसने संयोग रचे, जो मन के मीत मिले 
किसके इशारे पर, अंतर कमल खिले !

कौन खुद की राह पर लिए जाता है 
यह जीवन भी चमत्कार से कम नहीं 
जहाँ कोई ठान ले खुश रहना तो 
उसके लिए कोई गम नहीं रह जाता है !

यहाँ बाहर जल गंगा.. भीतर वाक् गंगा
 अनवरत रहती है 
कभी चुप हो जाता मन तो जान लेता 
भीतर प्रेम धारा बहती है
जिसकी मधुर ध्वनि को बाद में वाणी 
अनुवादित करती  
प्रकृति एक नियम से चलती 
यह सृष्टि अनादि काल से 
ऐसे ही बनती-बिगड़ती है !


शनिवार, फ़रवरी 9

सरहद पर बर्फीले पर्वत



सरहद पर बर्फीले पर्वत



कण-कण में भारत धरती के
बहता एक शाश्वत सँजीवन,
दूर पूर्वी अंचल में जब
उगती नभ में अरुणाभ, नमन !

सरहद पर बर्फीले पर्वत
कहीं सिंधु, रेतीले निर्जन
रक्षित करने को तत्पर है
सेनानी का तन मन अर्पण !

जयहिन्द मधुर नाद गूँजता
अंतर में हिलोर इक उठती,
नदिया, पर्वत, कानन, अम्बर
हर कोने को छू विहंसती !

पुण्य भूमि यह पुण्य शील है
राम, कृष्ण, बुद्धों की आभा,
गंगा, कावेरी, सतलज से
सिंचित है जन-जन की आशा !

आज नवल रवि दस्तक देता
कोटि-कोटि भाारतवासी को,
 पुरुषार्थ कर इसे संवारें
अवसर मिलता सौभागी को !



शनिवार, अगस्त 5

श्रावण की पूनम

श्रावण की पूनम

गगन पर छाए मेघ
लगे हरियाली के अंबार
बेला और मोगरे की सुगंध से सुवासित हुई हवा
आया राखी का त्योहार गाने लगी फिजां !
भाई-बहन के अजस्र निर्मल नेह का अजर स्रोत
सावन की जल धाराओं में ही तो नहीं छुपा है !
श्रावण की पूनम के आते ही
याद आते हैं रंग-बिरंगे धागे
कलाइयों की शोभा बढ़ाते
आरती के शुभ थाल
अक्षत रोली से सजे भाल 
बहनों के दिल से निकलती अनमोल प्रार्थनाएं
मन्त्रों सी पावन और गंगा सी विमल भावनाएँ
चन्द्र ग्रहण कर पायेगा न कम
इस उत्सव की उजास
दिलों में बसा नेह का प्रकाश 
बहन का प्रेम और विश्वास
भाई द्वारा दिए रक्षा के आश्वास  !

सोमवार, जुलाई 24

कविता हुंकारना चाहती है

कविता हुंकारना चाहती है

छिपी है अंतर के गह्वर में
या उड़ रही है नील अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में
घूमती बियाबान मरुथलों में
या डुबकी लगाती है सागर की गहराइयों में
तिरती गंगा की शांत धारा संग
कभी डोलती बन कावेरी की ऊंची तरंग
खोज रही है अपना ठिकाना
झांकती नेत्रों में... नहीं उसके लिए कोई अजाना
 घायल हो सुबकती हिंसक भीड़ देख
पड़ जाती मस्तक पर नहीं मिटने वाली रेख
 पूछती कितने सवाल
क्यों धर्म, जाति और देश की
हदों के नाम पर इतना बवाल
तोड़ कर हर घेरा झाँकना चाहती है
जातीयता की संकीर्ण दीवारों के पार
शांति की मशाल बन जलना चाहती है
बरसना चाहती है शीतल फुहार बनकर
जला दिए जिनके स्कूल
चंद सिरफिरे वहशी दरिंदों ने
उन मासूमों के गाँव पर
उनके जमीरों के भीतर भी ढूँढना चाहती है
इंसानियत की एक खोयी किरण
सोये हुए लोगों को जगाने के लिए
अमन और चैन की हवा बहाने के लिए
आंधी बनकर घुमड़ना चाहती है
गरज-गरज कर
कविता हुंकारना चाहती है !

मंगलवार, जनवरी 24

लौट आना है उसे घर



लौट आना है उसे घर

घूम कर सारा जहाँ
लौट आना है उसे घर,
गंगोत्री से उमगी धारा
जा पहुँची जो गंगा सागर  !

हुई वाष्पित उडी गगन में
बरसी जा पहुँची शिखरों पर,
पिघली, बही पुनः लौटी
यही चक्र चलता है अविरत !

कुछ बूंदें रह गयीं जमीं ही
कुछ ने सागर को घर माना,
वंचित हैं बहने के सुख से
नीलगगन का सुख न जाना !

एक यात्रा अनजानी सी
शेष सभी तय करती हैं,
काट पत्थरों, चट्टानों को
गहन गुफाओं में बहती हैं !

तपकर सोख ऊष्मा रवि की
मीलों चलकर मिलतीं घन से,
सृष्टि चक्र अनोखा कितना
चले अहर्निश युगों-युगों से !

मंगलवार, अक्टूबर 18

मन

मन

भर जाता भीतर उत्साह
गायत्री मन्त्र का उच्चार
स्यात् सवितादेव की तरह बंटना चाहता है 
करता आह्लादित युगों-युगों से
गंगा की लहरों का स्पर्श अंतर को
आत्मसागर की ओर बहना चाहता है 
थम जाते कदम देख फूलों का झुरमुट
बियाबान जंगल में भी
बन सुगंध दिग-दिगंत में उड़ना चाहता है 
लुभाती हर दीप की लौ 
 बनकर ज्योति की सुवास मिटना चाहता है
बिखरना सीखा पारिजात से जिसने
सदा ताजा ही रहेगा बन
तोड़ दी सीमाएं, पंछी सा 
 गगन में उड़ेगा ही वह मन !

गुरुवार, जुलाई 23

नया नया सा लगा था सूरज


नया नया सा लगा था सूरज

जाने कितने युग बीते हैं
जाने कबसे जलता सूरज,
आज सुबह जब ताका उसको
नया नया सा लगा था सूरज !

क्या जाने किस बीते युग में
गंगा की लहरों संग खेले,
आज अंजुरि में भर छूआ
याद आ गये लाखों मेले !

जीवन की आँखों में झाँका
अपना ही प्रतिरूप झलकता,
एक सहज लय में गुन्थित हो
श्वासों का यह ताँता ढलता !


शनिवार, मई 23

वाराणसी – एक अंतहीन उत्सव


वाराणसी – एक अंतहीन उत्सव

हम अर्धरात्रि दो बजे वाराणसी रेलवे स्टेशन पर उतरे. मुख्यद्वार से सटा हॉल खचाखच भरा था, पुल पर भी बोरिया-बिस्तर लिए सैकड़ों व्यक्ति थे, कुछ बैठे, कुछ लेटे हुए सोए थे. उनमें से कई तीर्थयात्री रहे होंगे जो आस-पास के गावों तथा कस्बों से गंगा मैया तथा बाबा विश्वनाथ के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने हर पर्व पर वाराणसी आते हैं. कुछ मेडिकल कॉलेज में इलाज करने आये होंगे. स्टेशन से बाहर निकले तो सड़क पर भी चहल-पहल थी. ऑटो रिक्शा वाले ताजा-तरीन मूड में थे, कोई भी उनींदा नजर नहीं आया. कहते हैं एक अजीब सी मस्ती या खुमारी यहाँ की हवा में है, जिसमें हर तबके के लोग डूबे रहते हैं. वाराणसी, जिसे बनारस और काशी भी कहते हैं, के बारे में कहा जाता है कि ‘सात वार और नौ त्यौहार’, अर्थात यहाँ किसी दिन एक से अधिक पर्व भी मनाया जाता है. यहाँ स्थान-स्थान पर आस्था के प्रतीक स्थल हैं, शहर के हर मुख्य तिराहे या चौराहे पर हनुमानजी, शिवजी अथवा देवी के मन्दिर हैं, कहते हैं काशी के कंकर-कंकर में शंकर का वास है. अगले एक सप्ताह तक हम बनारस के इसी रूप को निकट से महसूस करने की ख्वाहिश लेकर आये थे.

सुबह उठकर हम विश्व प्रसिद्ध घाट देखने निकले. जो हजारों वर्षों से काशी की शोभा बढ़ा रहे हैं. वर्तमान में यहाँ अठाहरवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में निर्मित पत्थर की असंख्य सीढ़ियों वाले घाट तथा उन पर स्थिर अनेक भव्य मन्दिर, महल, आलीशान द्वार तथा हवा का आनंद लेने के लिए बने गई खास इमारतें हैं. हम रिक्शे से सीधे दशाश्वमेध घाट आये, जो सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा स्वच्छ घाट है. बड़े-बड़े श्वेत व गुलाबी आभा लिए पत्थरों द्वारा बनाये गये घाटों तथा जल तक उतरती सीढ़ियों ने हमारा मन मोह लिया तथा कल-कल बहती गंगा का नीला जल हृदय को भीतर तक शीतल कर गया. काशी में गंगा नदी का नहीं आस्था का नाम है. गंगा के प्रति लोगों की भक्ति यहाँ देखते ही बनती है. बांस की छतरी लगाये, लकड़ी के तख्तों पर अपना आसन बिछाए पंडे-पुजारी दूर प्रदेशों से आये यात्रियों को पूजा करवा रहे थे, तथा उनके सामान की सुरक्षा भी कर रहे थे. एक स्थान पर हमें दक्षिण भारत से आया एक परिवार मंत्रोच्चारण करता हुआ दिखा. जल को श्रद्धा से मस्तक पर छुआते, आचमन करते तथा डुबकी लगाते सैकड़ों यात्री सुंदर दृश्य उत्पन्न कर रहे थे. कहीं कोई बालक तैरने का अभ्यास कर रहा था तो कहीं कोई महिला किनारे पर बैठ लोटे से सिर पर जल उडेंल रही थी. नौका भ्रमण कराते हुए नाविक ने बताया कि बरसात में जब पानी सीढ़ियों को ढक लेता है नाव चलाना जोखिम भरा काम होता है. सर्दियों में जब गंगा का शांत रूप देखने को मिलता है, अंतिम सीढ़ी तक उतर कर जल में प्रवेश मिलता है.

गंगा की शोभा प्रातःकाल से रात्रि तक कई रूपों में परिलक्षित होती है. गंगा जो नित्य नई है और हजारों वर्ष पुरानी भी, साक्षी है अनेक राजवंशों की, जो अपने समय में उन्नति के शिखर पर पहुंचे थे. जिसके स्मृति चिह्न घाटों के रूप में आज भी मौजूद हैं. उनमें अहल्याबाई होल्कर हैं, जयपुर के महाराजा जयसिंह, मराठा सरदार पेशवा अमृतराव हैं. त्रिपुराभैरवी घाट दक्षिण भारतीय लोगों का निवास स्थल है, जहाँ हजारों की संख्या में आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक से यात्री आते हैं.

हमने देखा हर घाट चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अपनी अलग पहचान लिए है. लगभग सौ घाटों में से कुछ समय के साथ ढह गये हैं, कुछ पूरी आन-बान के साथ हर सुबह स्नानार्थियों का स्वागत करते हैं. कुछ का नवीनीकरण हुआ है. कितनों के किनारे आधुनिक होटल बन गए हैं, कुछ में बनारसी साड़ियों की दुकानें व कारखाने भी हैं. कई घाटों पर योगकेंद्र भी तथा कुछ पर लोगों ने अपना निवास भी बना रखा है. यहाँ नित्य एक उत्सव का माहौल बना रहता है. नगर के दक्षिणी छोर पर स्थित है अस्सी घाट, गंगा व असी नदी के संगम स्थल पर स्थित यह घाट बनारस के प्राचीनतम स्थलों में से है. इसके बाद तुलसी घाट, हनुमान घाट हरिश्चन्द्र घाट तथा केदार घाट हैं. हरिश्चन्द्र तथा मणिकर्णिका दोनों श्मशानघाट हैं, वहाँ जाकर जीवन की नश्वरता का बोध हमें गंभीर बना गया. काशी को मुक्ति स्थल माना गया है, यह पंच तीर्थों में से एक है. नौकावाहक ने जो हमारे गाइड का काम भी कर रहा था, कई घाटों से जुडी कथाएं भी सुनायीं. राजा हरिश्चन्द्र का महल, डोम के रूप में उनका निवास स्मृति रूप में अभी तक सुरक्षित है. जहाँ तुलसी ने रामचरितमानस लिखी थी, जहाँ कबीर को गुरू मिले थे, वे स्थान तथा जहाँ शंकर का कर्णफूल गिरा था और पार्वती का मणि, वह कुंड आज भी मौजूद है. काशी में समय जैसे ठहर गया है, चाहे दुनिया कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, यहाँ के मन्दिर तथा घाट अपनी प्राचीन भव्यता को सुरक्षित रखे हुए हैं.

संध्या काल में होने वाली गंगा आरती में शामिल होने के लिए हमने पुनः नाव का आश्रय लिया. नाविक ने अनेक छोटी-बड़ी नौकाओं के साथ अपनी नाव भी स्थिर कर ली. आस-पास के सभी स्थान लोगों से भर गये थे, कुछ चबूतरों व सीढ़ियों पर बैठकर प्रकाश के इस उत्सव का आनंद उठा रहे थे. धूप, दीप, लोहबान, कपूर, पुष्प तथा कई सामग्रियों के द्वारा सात पुजारियों ने जब मंत्रोच्चार करते हुए आरती की तब सभी मंत्रमुग्ध हो गये. जल में दीपों का प्रतिबिंब तथा नदी की धारा के साथ बहते पत्तों की नाव में तैरते दीपक जाने किस लोक की खबर दे रहे थे.

अगले दिन मन्दिर दर्शन का कार्यक्रम था. सबसे पहले हमारा रिक्शा रुका, महा मृत्युंजय मन्दिर पर, जहाँ दर्शनार्थियों की कतार पहले से ही लगी थी, हमने बाएं द्वार से शिव पिंडी के दर्शन किये. हमें आगे पैदल ही जाना पड़ा, संकरी गली में दो ट्रक आमने-सामने आ जाने से आगे नहीं जाया जा सकता था. रास्ता पूछते-पूछते हम काशी के प्रसिद्ध काल भैरव मन्दिर पहुंचे. काशीवासी इन्हें काशी का कोतवाल मानते हैं, सर्वप्रथम इनके दर्शन का विधान है. संकटादेवी के मन्दिर में हम सीढियाँ चढ़ते हुए पहुंचे तो श्वास फूल रही थी, घाट पर स्थित अनेक मन्दिरों में से यह एक है. इसके बाद भूल-भुलैया गलियों में चलते-चलते हम विश्वनाथ गली पहुंचे जहाँ विश्वप्रसिद्ध विश्वनाथ मन्दिर है. कई बार हुए आतंकवादी हमलों के कारण तथा विवादित क्षेत्र होने के कारण यहाँ पुलिस का सख्त पहरा था. इस मन्दिर का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने अठाहरवीं शताब्दी में करवाया था. इसके शिखर पर महाराजा रणजीत सिंह ने लगभग बाइस टन सोना लगवाया था.

उसी दिन संध्या के समय नगर के तीन प्रसिद्ध मन्दिर – बिरला मन्दिर, जो बनारस हिंदू विश्व विद्यालय में स्थित है, संकट मोचन हनुमान मन्दिर, जो संतकवि तुलसीदास को समर्पित है, तथा श्री दुर्गा मन्दिर देखने गये. नवरात्रि के कारण हर जगह भीड़ थी. दुर्गा मन्दिर के सामने तो व्रती स्त्रियों की लम्बी-लम्बी कतारें लगी थीं, जो हमें धर्म के बदलते हुए रूप पर सोचने को विवश कर रही थीं. अगले दिन मौसम गर्म था सो हमने सुबह-सवेरे ही नाव से गंगा के दूसरे तट पर जाकर, जहाँ पानी अपेक्षाकृत स्वच्छ था तथा भीड़ भी कम थी, स्नान किया, गंगा का रेतीला तट मीलों तक पसरा हुआ था.


वाराणसी से मात्र दस किमी दूर बौद्धों का पवित्र विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थल सारनाथ स्थित है. शाम सारनाथ के हरे भरे बगीचों में हिरणों को बेफिक्री से घूमते हुए देखने तथा शीतल हवा का आनंद लेने में बितायी. भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम पांच शिष्यों को जिस स्थान पर उपदेश दिया था वहाँ सुंदर भव्य मूर्तियों द्वारा बना स्मारक सभी दर्शनार्थियों को आकर्षित करता है. विभिन्न देशों के पर्यटक बौद्ध लामाओं द्वारा दिए गये प्रवचन को सुनने के लिए एक मन्दिर के पास लॉन में कतार बद्ध बैठे थे. एक अन्य समूह मौन धारण किये किसी साधना कक्ष से निकल रहा था. महात्मा बुद्ध के अवशेषों को समेटे स्तूप जो तेतीस मीटर ऊंचा है और लाल इंटों व पत्थरों से बना है, हमें दूर से बुला रहा था. सारनाथ संग्रहालय में सम्राट अशोक की भव्य लाट तथा पुरानी मूर्तियाँ, लेख तथा बर्तन देखकर किसे भारत के स्वर्णिम अतीत पर गर्व नहीं होगा. हमने पैदल घूमते हुए चीनी, जापानी व तिब्बती बौद्ध मन्दिर देखे. अपने पड़ाव के अंतिम दिन हम वरुणा नदी के तट पर नये बने लाल बहादुर शास्त्री घाट को देखने गये. कई सुखद स्मृतियाँ लेकर हमने उसी रात्रि वापसी की यात्रा आरम्भ की.

बुधवार, मार्च 4

विपासना का अनुभव

विपासना का अनुभव

ग्यारह फरवरी की एक शांत दोपहरी को दो बजे कोलकाता के IIM से सोदपुर स्थित विपासना केंद्र ‘धम्म गंगा’ के लिए रवाना हुई. तीन दिन पहले ही हम वहाँ आए थे. पतिदेव की ट्रेनिंग दो दिन पहले ही शुरू हो चुकी थी और मुझे अगले दस दिनों के लिए मन की ट्रेनिंग के लिए जाना था. विपासना के बारे में कई वर्षों से सुनती आ रही थी. यह ध्यान की एक गहन प्रक्रिया है जिसमें मन को गहराइयों तक जाकर देखते हैं और भीतर छिपे संस्कारों में परिवर्तन सम्भव होते हैं. गोयनका जी को वर्षों पहले टीवी पर सुना था, तब से इस कोर्स के बारे में एक छवि मन में बसा ली थी और जब ऐसा अवसर आया कि दो हफ्तों के लिए कोलकाता में रहना था तो झटपट नेट पर कोर्स के स्थान के बारे में आवश्यक जानकारी लेकर अपना नाम लिखवा दिया था. जाने से पहले एक अनजाना सा भाव मन में था, पर विश्वास था कि कठिन नहीं होगा दस दिनों का यह साधना काल. कोलकाता से लगभग तीस किमी दूर गंगा के तट पर स्थित केंद्र तक पहुंचने में दो-ढाई घंटे लग गये. वहाँ पहुँचकर एक मूढ़तापूर्ण कार्य किया, जिसने सिद्द कर दिया कि इस कोर्स को करने की कितनी अधिक जरूरत है. ड्राइवर को बाहर छोड़कर लोहे के गेट के बायीं तरफ से अंदर पता करने के लिए चली गयी कि कार अंदर जा सकती है या नहीं, लौटी तो कार नदारद थी, जिस गली से हम आये थे, उसमें कहीं नजर नहीं आ रही थी. मन के भीतर छिपा भय का संस्कार सामने आ गया, गोयनका जी कहते हैं कोई भी विकार जगा कि दुख का कारण ही बनता है. अब भय जगा तो झट प्रतिक्रिया हुई, पतिदेव को फोन कर दिया बिना यह सोचे कि इतनी दूर से वह क्या सहायता करेंगे, खैर उनके आशाजनक शब्दों ने विश्वास दिलाया, ड्राइवर दूसरी गली में जाकर गाड़ी मोड़ने चला गया था. वह वापस आया तो मन ही मन उससे क्षमा मांगी. धैर्य का दामन छोड़कर जो मन झट प्रतिक्रिया करने में जुट जाता है वह गलत निर्णय पर ही पहुंचता है. यह पाठ आते ही सीख लिया था.

खैर, भीतर पहुंच कर काफी समय औपचारिकताओं में बीतता गया. फार्म भरवाया गया, प्यास भी लग रही थी और लम्बे सफर से सिर में हल्का दर्द भी था. आखिरकार कमरा मिला, कमरे का नम्बर आठ था, जो अगले दस दिनों के लिए आवास बनने वाला था. एक युवा बंगाली लड़की जो बैंगलोर में रहकर जॉब करती है, पर उसका घर कोलकाता में है, उस कमरे में पहले से ही थी. उसने दो-चार बातें ही की होंगी कि पता चला ऑफिस में जाकर मोबाइल व अन्य कीमती सामान लॉकर में रखवाने हैं. वहीं पता चला छह बजे घंटा बजेगा तब नाश्ता व चाय मिलेगी, जो आज का अंतिम भोजन होगा. शाम का वक्त था, सूर्यास्त का समय. केंद्र का बगीचा जहाँ खत्म होता था, वहाँ बरगद के एक विशाल वृक्ष के चारों तरफ एक बड़ा चबूतरा था. जिसपर चढ़कर गंगा का चौड़ा पाट देखा. नदी का शांत पानी और उस पर नाचती हुई छोटी-छोटी लहरें, सूर्य की लाल रश्मियाँ उन लहरों के साथ नृत्य करती हुई बहुत आकर्षक लग रही थीं. अगले कुछ दिनों तक रोज ही शाम को बल्कि दिन में कई बार गंगा को निहारना मेरा प्रिय कार्य बन जायेगा यह उस वक्त मालूम नहीं था. उसी वृक्ष के नीचे तितलियों से गुफ्तगू भी रोज का हिस्सा बन जाएगी यह भी नहीं जानती थी. जैसे ही शाम के वक्त वहाँ जाती, हवा चल रही होती और जाने कहाँ से उड़ती-उड़ती दो काली तितलियाँ आ जातीं और कभी सिर कभी बांह पर बैठ जाती थीं, आश्चर्य होता था, भरोसा भी होता था कि परमात्मा ही उनके द्वारा संदेश भेजता है. कुछ पंक्तियाँ तभी एक दिन जेहन में आई थीं-

तितलियाँ परमात्मा की दूत होती हैं
पुष्प उसके चरणों की शोभा बढ़ाते हैं
उन पुष्पों पर मंडराती हैं
तितलियाँ परमात्मा का संदेश ले आती हैं

क्रमशः

शुक्रवार, जनवरी 23

वसंत पंचमी पर शुभकामनायें

सरस्वती पूजा



गा रही है वाक् देवी  
गूँजती सी हर दिशा है,
शांत स्वर लहरी उतरती
शुभ उषा पावन निशा है !

श्वेत दल है कमल कोमल
श्वेत वसना वीणापाणि,
राग वासन्ती सुनाये
वरद् हस्ता महादानी !

ज्ञान की गंगा बहाती
शांति की संवाहिका वह,
नयन से करुणा लुटाये
कला की सम्पोषिका वह !

भा रही है वाग् देवी
सुन्दरी अनुपम सलोनी,
भावना हो शुद्ध सबकी
प्रीत डोरी में पिरोनी !

जग उठे मेधा जो सोयी
अर्चना तब पूर्ण होगी,
ताल-लय जीवन में प्रकटे
साधना उस क्षण फलेगी !