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शुक्रवार, अगस्त 22

जब

जब



औघट राह टूटा कगार
थाह नहीं पाए कोई,
कंटक पथ पथराये नैना
पार कहाँ जाये कोई !

मति कुंठित सोया विवेक
जब, कुंद हुई दृष्टि सबकी,
हित अनहित भी नहीं सूझता
क्षार हुई सृष्टि मन की !

हृदय भ्रमित गान अधूरा
स्वप्न खंडित सा कोई,
कहाँ जाना ? किसे जाना ?
जानता यह कहाँ कोई !