शुक्रवार, अप्रैल 2

तू ही वहाँ नजर आया था


जहां कुछ भी नहीं था 

वहीं सब कुछ हुआ है, 

जहां इक सोच भर थी 

 वहाँ जग ये बना है ! 

तू ही वहाँ नजर आया था

जिसकी आँखों में भी झाँका 

तू ही वहाँ नजर आया था, 

बता, उस घड़ी क्या तूने भी

मुझमें खुद को ही पाया था ?


जो करना चाहा है दिल ने 

सदा कहाँ कर पाए हैं हम, 

ना करने की जिसे कसम ली 

वहीं खड़ा खुद को पाया थम !


इससे अच्छा यह ही होता 

जो सहज घटे घटने देते, 

हम जीवन को, अपनी लय में 

अपनी धुन में बहने देते !

 

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उत्तम।
    मनोभावों का सुन्दर चित्रण।

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  2. कविता के रूप में बहुमूल्य जीवन-दर्शन को स्वर दिया है अनीता जी आपने । मुझे आपकी यह कविता बहुत पसंद आई । अभिनंदन आपका ।

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  3. इससे अच्छा यह ही होता

    जो सहज घटे घटने देते,

    हम जीवन को, अपनी लय में

    अपनी धुन में बहने देते !

    बस यही तो सार है जीवन का ... सहज सरल बहते रहें ...

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