कान्हा ! तेरे नाम का जादू
माखन-मिश्री सी मृदु-कोमल
छवि तेरी अति मधुरिम श्यामल,
ग्वाल-बाल, गोपी, राधा संग
भ्रमण किया वृंदावन-गोकुल !
नंद-यशोदा का वह आँगन
कुंज गली, यमुना तट, पनघट,
वृक्ष कदंब का, व्रज की भूमि
अब भी सुनते तेरी आहट !
गूँज रही वंशी की वह धुन
धरती के कोने-कोने में,
नित गायी जाती है गीता
भूली हुई वह स्मृति जगाने !
कान्हा ! तेरे नाम का जादू
अब भी दिल वालों पर चलता,
डूब रहे मस्ती में निशदिन
जिनके अंतर में तू बसता !
