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शुक्रवार, सितंबर 4

कान्हा ! तेरे नाम का जादू


कान्हा ! तेरे नाम का जादू 
माखन-मिश्री सी मृदु-कोमल 
छवि तेरी अति मधुरिम श्यामल, 
ग्वाल-बाल, गोपी, राधा संग 
भ्रमण किया वृंदावन-गोकुल !

नंद-यशोदा का वह आँगन 
कुंज गली, यमुना तट, पनघट, 
वृक्ष कदंब का, व्रज की भूमि 
अब भी सुनते तेरी आहट ! 

गूँज रही वंशी की वह धुन 
धरती के कोने-कोने में, 
नित गायी जाती है गीता
भूली हुई वह स्मृति जगाने ! 

कान्हा ! तेरे नाम का जादू 
अब भी दिल वालों पर चलता, 
डूब रहे मस्ती में निशदिन
जिनके अंतर में तू बसता !