संध्या बेला
तमस की काली रात्रि
अथवा रजस का उजला दिन
दोनों रोज ही मिलते हैं
अंधकार और प्रकाश के
इस खेल में हम नित्य ही स्वयं को छलते हैं
चूक जाती है दोनों के
मिलन की सन्ध्या बेलायें
जब प्रकाश और तम एक-दूसरे में घुलते हैं
उस सलेटी आभा में
सत छिपा रहता है
पर कभी अँधेरा कभी उजाला
उसे आवृत किये रहता है
वही धुधंला सा उजास ही
उस परम की झलक दिखाता है
जब मन की झील स्वच्छ हो और थिर भी
तभी उसमें पूर्ण चंद झलक जाता है
न प्रमाद न क्रिया जब मन को लुभाती है
तब ही उसकी झलक मिल पाती है !