अनायास ही
अनंत की उड़ान भर रहा
मन का पंछी अनायास ही
कृपा का बादल बरस रहा हो
जैसे नभ से बिन प्रयास ही
कोई अद्भुत खेल चल रहा
शांति बिछी है पग-पग ऐसी
उग जाती ज्यों दूब धरा पर
पावस ऋतु में बिन आयास ही
जैसे कोई द्वार खुला हो
अंतर गह्वर से खिसका हो
कोई पाहन
बह निकली हो धार प्रेम की
कल-कल छल-छल अनायास ही
अथवा नील गगन में उड़ता
राजहंस हो
निर्मल धवल शिखर को छूकर
पा लेता हो तृप्ति अनोखी
या फिर कोई हाथ पकड़ कर
ले जाता हो
निज आश्रय में बिन प्रयास ही !
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