रामायण यात्रा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रामायण यात्रा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, नवंबर 26

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -५

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

भाग - ५

कल रात हम जाफना पहुँचे थे।जाफ़ना श्रीलंका के उत्तरी सिरे पर एक समतल, शुष्क प्रायद्वीप पर स्थित है। यह देश के बाकी हिस्सों से सड़क और रेलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। दक्षिण भारत के साथ इसका व्यापार होता है। 

यूरोपीय लोगों द्वारा विजय प्राप्त करने से पहले सदियों तक जाफ़ना एक तमिल साम्राज्य की राजधानी थी, और इस शहर में आज भी कई विशिष्ट तमिल सांस्कृतिक विशेषताएँ मौजूद हैं। जाफ़ना नाम एक तमिल शब्द का पुर्तगाली रूपांतर है जिसका अर्थ है "वीणा का बंदरगाह"। डच काल का एक किला और एक चर्च यहाँ आज भी मौजूद है, और किले के पास एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर, कंडास्वामी कोविल है।  

यहाँ का रेलवे स्टेशन ठीक हमारे होटल के सामने है। कल रात कमरे में सामान आदि व्यवस्थित करने के बाद कुछ देर के लिए टहलने गये। मुख्य इमारत के सामने कुछ खुला स्थान है, शायद पार्किंग के लिए। हम पहुँचे तो स्टेशन बंद हो चुका था।आज सुबह पुन: उसी स्थान पर प्रात: भ्रमण किया, एक महिला मिली जो अपना स्कूटर पार्क कर रही थी, उसे स्टेशन की कोई कर्मचारिणी समझ कर हमने बात आरम्भ की, तो पता चला वह लोकल ट्रेन से यात्रा करने आयी है।सुबह नाश्ते में तमिलनाडु दोसा खाया, जो बहुत ही पतला व कुरकुरा था।

साढ़े नौ बजे हम एक फेरी से नागमणि अथवा नागपूष्णी मंदिर (इंद्राक्षी देवी) देखने गये। जो नैनातिवू  द्वीप पर स्थित अति विशाल, भव्य, ऐतिहासिक मंदिर है।नागपूष्णी अम्मन मंदिर जाफना से 36 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां माता सती की पायल गिरी थी। पार्वती को समर्पित चौसठ शक्तिपीठों से यह भी एक शक्ति पीठ है।यहाँ पार्वती को नागपूष्णी और भगवान शिव को रक्षेश्वर के रूप में पूजा जाता हैं। पार्वती देवी भुवनेश्वरी का सगुण रूप हैं। 

इस मंदिर में चार भव्य गोपुरम हैं। हर वर्ष जून और जुलाई में यहाँ  तिरुविल्ला महोत्सव मनाया जाता है।कहा जाता है कि लिंगम के साथ देवी नागपूष्णी की मूर्ति और राजा रावण की दस सिरों वाली  मूर्ति इस मंदिर के अतिरिक्त कहीं नहीं हैं।मंदिर के कक्ष में दीवारों पर सुंदर चित्र बनाए गये हैं। एक चित्र में देवी की नाभि से ब्रह्म जी का जन्म दिखाया गया है।माधवानंद जी ने इस मंदिर के बारे में कई कथाएँ भी हमें सुनायीं। गौतम ऋषि और इंद्र की कथा, जिसमें अहल्या को छलने के बाद इंद्र को शाप मिलता है। वह इसी स्थान पर तपस्या के द्वारा पार्वती देवी को प्रसन्न करता है तो देवी उसके शरीर पर हज़ार नेत्र उगने का वरदान देती हैं। इसलिए देवी को यहाँ इन्द्राक्षी नाम मिला। एक अन्य कथा के अनुसार इसी स्थान पर नाग माता सुरसा ने विराट रूप बनाकर हनुमान जी को रोका था, वह सूक्ष्म रूप धर कर उनके मुख में प्रवेश करके बाहर निकल आये थे।नागदीप में विहारया नामक महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थस्थल भी है।

एक अन्य किंवदंती में कहा गया है कि एक नाग  भुवनेश्वरी की पूजा के लिए अपने मुँह में कमल का फूल लेकर पास के तिवु द्वीप से नैनातिवु की ओर जा रहा था। एक गरुड़ ने नाग को देखा और उस पर हमला करके उसे मारने का प्रयास किया। चील के डर से, नाग ने नैनातिवु तट से लगभग आधा किलोमीटर दूर समुद्र में एक चट्टान के चारों ओर खुद को लपेट लिया। गरुड़ कुछ दूरी पर एक अन्य चट्टान पर खड़ा हो गया। चोल साम्राज्य के व्यापारी माणिकन, जो  भुवनेश्वरी के भक्त थे,  उन्होंने चील और सांप को चट्टानों पर बैठे देखा। उन्होंने चील से अनुरोध किया कि वह नाग को अपने रास्ते पर जाने दे। चील एक शर्त पर सहमत हुई कि व्यापारी को नैना तिवु द्वीप पर भुवनेश्वरी के लिए एक सुंदर मंदिर का निर्माण करना चाहिए और वह नागपूशनी अम्मन के रूप में उनकी पूजा का प्रचार करेगा। वह सहमत हो गया और तदनुसार एक सुंदर मंदिर बनाया। नागों के विरुद्ध अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए गरुड़ ने समुद्र में तीन बार डुबकी लगाई और इस प्रकार गरुड़ और नागों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मनमुटाव समाप्त हो गए।

मंदिर से बाहर निकले तो हवा चल रही थी, फेरी तक जाने वाले मार्ग पर चलते समय हमने विशाल सागर में उठी लहरों की कई तस्वीरें खींचीं।एक व्यक्ति हारमोनिका पर कोई धुन बजा रहा था। कुछ कुत्ते, बकरियाँ और गायें भी वहाँ घूम रहे थे, जो भारत की याद दिला रहे थे। आते समय हम नाव में नीचे कक्ष में बैठे थे पर वापसी की यात्रा में डेक पर बैठकर हवा का आनंद लिया। दोपहर का भोजन होटल वापस आकर किया। 

शाम को साढ़े चार बजे हम कंदास्वामी मंदिर देखने गये। आज वहाँ एक स्थानीय उत्सव मनाया जा रह था। हज़ारों की संख्या में लोग आये हुए थे। कई महिलाएँ छोटी-छोटी पुस्तिकाओं में स्कन्द षष्ठी पढ़ रही थीं। कुछ अन्य अग्नि में कुछ पका रही थीं। बच्चे रेत में घरौंदे बना रहे थे। मंदिर में शंख, घंटे और संगीत की ध्वनियाँ गूंज रही थीं। हमारा पूरा समूह भी उसी भीड़ में शामिल हो गया। स्वामी जी ने कई रोचक गाथाएँ सुनायीं और मूर्तियों का महत्व बताया, वापसी के समय एक महिला नहीं मिलीं, सभी जन  कुछ देर के लिए परेशान हो गये, पर बाद में ज्ञात हुआ वह पहले ही भीड़ से बचकर बस के लिए चली गयीं थीं। इतनी भीड़-भाड़ में ऐसा होना स्वाभाविक ही था। 

इसके बाद हम त्रेता युग में भगवान राम द्वारा वानरों की प्यास बुझाने के लिए बने कूप को देखने गये, जिसे अतल कुँआ कहते हैं। जिसमें उन्नीस किमी दूर किसी जल स्रोत से निरंतर जल आता है। रात्रि भोजन एक शाकाहारी भोजनालय में किया, जिसका नाम था ‘मैंगो इण्डियन वेजीटेरियन रेस्टोरें’ वहाँ मीठा आम भी खाया। पूरे श्रीलंका में हर कहीं आम के वृक्ष फलों से लदे हुए हैं। कोलंबो शब्द का अर्थ भी है, आम के वृक्षों वाला बंदरगाह ! 



सोमवार, नवंबर 24

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक - ४

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक

भाग - ४

आज सुबह हम जल्दी उठ गये थे, साढ़े पाँच बजे समुद्र तट पर सूर्योदय देखने जाना था। बादलों के कारण सूर्यदेव के दर्शन तो नहीं हुए, पर हमने समुद्र स्नान का आनंद लिया। तट पर योगासन किए और भ्रमण  के साथ दौड़ भी लगायी। वृक्ष के एक तने पर बैठे हुए एक-दूसरे की तस्वीरें खींचीं।अब समूह के कुछ लोगों से परिचय बढ़ रहा है। साढ़े नौ बजे हम होटल से निकले तो पहला पड़ाव था भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित त्रिंकोमाली का लक्ष्मी नारायण पेरूमल कोविल मंदिर, जो एक भव्य मंदिर है।यह मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है और अपनी जटिल द्रविड़ वास्तुकला और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में हिंदू पौराणिक कथाओं को दर्शाने वाली विस्तृत नक्काशीदार मूर्तियाँ हैं।मंदिर का वातावरण शांत और आध्यात्मिक था।इसके विशाल प्रांगण में हमने कुछ समय बिताया। 

इसके बाद हम शिव का प्रसिद्ध थिरुकोनेश्वर मंदिर देखने गये, यहाँ शंकरी देवी शक्ति पीठ भी है। इस स्थान को दक्षिण कैलाश भी कहते हैं।वहाँ शिव की अति सुंदर भव्य और विशाल प्रतिमा थी। ऐसी मान्यता है कि रावण ने इसका निर्माण कराया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार पार्वती ने भवन निर्माण के लिए इस स्थान का चुनाव किया था। गृहप्रवेश की पूजा के लिए पार्वती ने रावण को आमंत्रित किया। रावण इस भव्य इमारत को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और दक्षिणा स्वरूप इस भवन की मांग कर दी। देवी पार्वती ने उसकी इच्छा पूर्ण की, पर बाद में उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने देवी से क्षमा मांगी तथा  प्रार्थना की कि वे यह स्थान छोड़ कर न जाएँ। पार्वती शंकरी देवी के रूप में यहीं स्थिर हो गयीं। भगवान शिव उनके संग यहाँ थिरुकोनेश्वर अर्थात पर्वतों के देव के रूप में निवास करते हैं।

इसी मंदिर के निकट एक ऐसी जगह और है जिसका नाम रावण से जुड़ा है।इसे रावण वेट्टा कहते हैं ।ऐसा माना जाता है कि रावण ने अपनी तलवार से इस चट्टान को काटा था। मंदिर के पीछे एक स्थान पर लकड़ी के कई छोटे छोटे पालने लटक रहे थे।माधवानंद जी ने बताया,  संतान प्राप्ति के लिए लोग यहाँ मन्नत माँगते हैं। 

शंकरी देवी मंदिर थिरुकोनेश्वर मंदिर के परिसर में ही स्थित है। वह चतुर्भुजी खड़ी मुद्रा में हैं। उनके चरणों के निकट ताम्बे का दो आयामी श्री चक्र है। वहीं उनकी प्रतिमा के सामने तीन आयामी श्री चक्र खड़ा है।ऐसी मान्यता है कि सती का एक पैर यहाँ गिरा था। आदि शंकराचार्य ने अपने एक स्तोत्र में अठारह शक्ति पीठों में सर्वप्रथम इसी शक्ति पीठ का उल्लेख किया है।हमने काफ़ी समय इस मंदिर के प्रांगण में बिताया और देवी की आरती में भी भाग लिया।दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर आकृतियाँ बनी थीं। 

कुछ आगे जाकर हमने भद्रकाली मंदिर के दर्शन भी किए, जो नगर के मध्य स्थित था। बाहर से यह किसी  दक्षिण भारतीय मंदिर के समान दिखाई दे रहा था। प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते ही कक्ष में चारों ओर तीन आयामी मूर्तियाँ दिखायी देती हैं। समूह के सभी लोग उन्हें देखकर आश्चर्य से भर गये।अनेक विचित्र आकार की मूर्तियाँ छत पर भी बनी थीं। चौखटों, दीवारों और स्तंभों पर भी रंग-बिरंगी देवी-देवताओं व प्राणियों की आकृतियाँ बनी हुई थीं। यह मंदिर चोल वंश से पूर्व का है। इसका अर्थ है, मंदिर हज़ार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।

अंत में हम कन्निया उष्ण जल-स्त्रोत देखने गये, जो प्रकृति का एक करिश्मा जान पड़ता है। वहाँ कई माताएँ अपने बच्चों को गर्म जल से स्नान करवा रही थीं। पास-पास बने कुछ सात चौकोर जल कूप थे। जिनकी गहराई अधिक नहीं थी। उनके भीतर गुनगुने से लेकर विभिन्न तापमान का जल भरा था। एक दूसरे के समीप स्थित कुल ७ चौकोर कुँए हैं जिनमें विभिन्न तापमान के गर्म जल स्त्रोत हैं। इनकी गहराई अधिक नहीं है। केवल ३ से ४ फीट हो सकती है। इन कुओं के समीप खड़े होकर भीतर झांकने पर इनके तल स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। इनके भीतर पर्यटकों ने अनेक सिक्के डाले हुए हैं।ऐसी मान्यता है कि रावण ने अपनी माँ के अंतिम संस्कार के लिए इन जल स्रोतों को उत्पन्न किया था। यह भी कहा जाता है कि रामायण में इसका उल्लेख गोकर्ण तीर्थ के एक भाग के रूप में किया गया है। त्रिंकोमाली खाड़ी का एक अन्य नाम गोकर्ण भी है। 

अभी कुछ देर पहले हम नार्थ गेट होटल पहुँचे हैं। जो जाफना में स्थित है। कई वर्षों पूर्व यहाँ गृह युद्ध चल रहा था, पर अब पूर्णत: शांति है। कल हमें एक और शक्ति पीठ नाग द्वीप देखने जाना है।