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गुरुवार, अक्टूबर 12

नवरात्रि का करें स्वागत

नवरात्रि का करें स्वागत 


बस दो दिनों की प्रतीक्षा 

फिर देवी का आगमन होगा 

गरबे की धूम मचेगी 

घरों में कलश स्थापन होगा 

मिलजुल कर उत्सव मनाना 

भारत की संस्कृति है 

इन दिनों पूरा वैभव लुटाती प्रकृति है 

हरसिंगार के फूल भोर में झरते हैं 

सारे आलम को दैवीय सुगंध से भरते हैं 

संग मखाने की खीर, कोटू की रोटी 

व साबूदाने की खिचड़ी की महक 

सुबह शाम धूप, अगर बत्ती 

मन्दिरों में अखंड दीपक !

व्रत, उपवास, जप, ध्यान 

दुर्गा सप्तशती का पारायण भी 

कुछ दिनों के लिए 

सोशल मीडिया से पलायन भी !

माँ के आने से खिला-खिला है धरा का मन 

राम लौटेंगे, मनेगा विजयादशमी का दिन !

है शरद का आकाश भी कितना निर्मल 

फैलता हर तरफ़ श्रद्धा का भाव अमल 

नृत्य, संगीत और कलाओं का सृजन करें 

मिलकर भजन और एकांत में मनन करें 

आत्मशक्ति को जगायें हम, माँ बताना चाहे 

उसकी शक्ति है सदा साथ, यह जताना चाहे ! 


सोमवार, अप्रैल 25

तीन विचार


तीन विचार

अब 

मंदिर तोड़े गए 

पुस्तकालय जलाए गए 

अधिकारों से वंचित किया गया 

मारा गया 

कठोरता की सीमाएँ लांघी गयीं 

ग़ुलाम बनाया गया, बेचा गया 

अब बहुत हुआ, अब और नहीं 

अब परिवर्तन अवश्यंभावी है !


मन 

शिकायतों का पुलिंदा बना अगर मन 

अपनी बस अपनी ही चलाए जाता, 

चीजें जैसी हैं वैसी कहाँ देखे 

महज ज़िद का मुलम्मा चढ़ाए जाता !


छिपा इश्क का समुंदर गहराई में

न भीगे खुद उसमें न जग को डुबाए, 

बना महरूम अपने ही ख़ज़ानों से 

अपने ही हाथों से खुद को सताए  !


परिवार 


दो में होता है प्यार 

पर तीन से बनता है परिवार 

दो बिंदु जुड़ते हैं

तो एक पंक्ति का जन्म होता है 

पर तीसरा बिंदु बना सकता है वृत्त 

जिसमें भ्रमण करती है  ऊर्जा 

माता-पिता और संतान के प्रेम की  

पिता देता है असीम प्रेम माँ को

संतान माँ के वात्सल्य से सिंचित होती है 

और देती है सारा निर्दोष प्रेम पिता को 

और इस तरह एक वलय में घूमता है स्नेह 

प्रीत का जो वृक्ष लगाया था युगों पूर्व 

शिव और पार्वती ने 

उसकी शाखाएँ आज भी पल्लवित हो रही हैं  !