एक बांसुरी की सरगम दिल
बस कशमकश है ज़िंदगी, या
प्रीत रागिनी मधुर बज रही,
क्यों इसको संघर्ष बनाते
निशदिन रस की धार बह रही !
सुरमई साँझ, केसरिया दिन
लपटों में घिर-घिर जाते क्यों,
एक बांसुरी की सरगम दिल
व्यर्थ शोर में बदल रहा ज्यों !
प्रेम गुज़ारिश, एक बंदगी
फ़रमानों की भेंट चढ़ गया,
जहां सरसता उग सकती थी
अरमानों का रक्त बह गया !
चंद खनकते सिक्कों आगे
दिल का दर्द न पड़ा दिखायी,
अहंकार की भाषा जीती
सदा प्रीत की ही रुसवाई !
लेकिन आख़िर कब तक बोलो
जीवन दुर्दम बोझ सहेगा,
तोड़ बंधनों की सीमाएँ
नव अंकुर सा उमग बहेगा !
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