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सोमवार, जुलाई 17

एक बांसुरी की सरगम दिल

एक बांसुरी की सरगम दिल 


बस कशमकश है ज़िंदगी, या 

प्रीत रागिनी मधुर बज रही, 

क्यों इसको संघर्ष बनाते 

निशदिन रस की धार बह रही !


सुरमई साँझ, केसरिया दिन 

लपटों में घिर-घिर जाते क्यों, 

एक बांसुरी की सरगम दिल 

व्यर्थ शोर में बदल रहा ज्यों !


प्रेम गुज़ारिश, एक बंदगी 

फ़रमानों की भेंट चढ़ गया, 

जहां सरसता उग सकती थी 

अरमानों का रक्त बह गया !


चंद खनकते सिक्कों आगे 

दिल का दर्द न पड़ा दिखायी, 

अहंकार की भाषा जीती 

सदा प्रीत की ही रुसवाई !


लेकिन आख़िर कब तक बोलो 

जीवन दुर्दम बोझ सहेगा, 

तोड़ बंधनों की सीमाएँ 

नव अंकुर सा उमग बहेगा !


गुरुवार, दिसंबर 23

अभी मिलन घट सकता उससे

अभी मिलन घट सकता उससे 


 ना  अतीत जंगल के उगते  

ना उपवन भावी के जिसमें, 

वर्तमान का पुष्प अनोखा 

खिलता उसी मरूद्यान में !


एक स्वप्न से क्या मिल सकता 

जिससे ज़्यादा ना दे अतीत, 

जाल कल्पना का भी मिथ्या 

भावी के सदा गाता गीत !


एक बोझ का गट्ठर लादे 

कितना कोई चल सकता है, 

यादों का सैलाब डुबाता 

भव सागर कब तर सकता है !


कल की फ़िक्र आज को खोया 

संवरे अब बने कल सुंदर, 

इस पल में हर राज छुपा है 

पहचानें  ! क्यों टालें कल पर !


अभी-अभी इक सरगम फूटी 

अभी अभी बरसा है बादल, 

अभी मिलन घट सकता उससे 

है परे काल से सदा अटल !