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रविवार, जनवरी 25

बहे अटूट प्रेम की धारा

77वें  गणतंत्र दिवस के अवसर पर 


भारत भू की गौरव गाथा 

आज सुनाने का दिन आया, 

 संविधान का पर्व मनाते

जिसको इस दिन था अपनाया ! 


  पावन संस्कृति अति पुरातन

विश्व साथ दे हर उत्सव में, 

भजन क्लबिंग कर युवा आज के 

भक्तिभाव जगायें उर में !


 वन्य प्रांत भी बढ़ता जाता 

नदियाँ भी नव जीवन पाएँ,

अक्षय ऊर्जा का प्रयोग कर 

ग्लोबल वार्मिंग नित घटाएँ !

 

उत्तर दिशा विराट हिमालय 

सागर तट सुंदर दक्षिण में, 

 भारत की सीमाएँ सुरक्षित 

मार्ग दिखाता नवाचार में, 


 जहाँ कहीं भारतवासी हों

विजयी तिरंगा जब फहराते, 

बहे अटूट प्रेम की धारा 

अनायास ही दिल जुड़ जाते !


विकसित राष्ट्र की नींव डल रही 

दूर बहुत अभी जाना है, 

 पाएँ सभी अधिकार समान 

यही मूल्य नित अपनाना है !


सोमवार, दिसंबर 22

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - ३

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

अंतिम भाग


४ सितंबर २०२५ 

आज सुबह साढ़े आठ बजे हम बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए। सर्वप्रथम विष्णुप्रयाग पर रुके, जो जोशीमठ के निकट ही गढ़वाल और तिब्बत सीमा पर नीति दर्रे से निकलने वाली धौली गंगा और अलकनंदा के संगम स्थल पर स्थित एक तीर्थस्थान है। गाइड ने वहाँ पैदल जाने वाला वह रास्ता भी दिखाया, जिससे आधी सदी पहले लोग जाया करते थे। बद्रीनाथ पहुँचे तो चारों और हिमालय के उच्च शिखर दिखायी दिये, जिन पर ताजी बर्फ गिरी थी, जो चाँदी की तरह चमक रही थी। मंदिर के कपाट अभी बंद थे, सो हम भारत का प्रथम गाँव ‘माना’ देखने चले गये। वहाँ व्यास गुफा, गणेश गुफा तथा सरस्वती नदी का स्रोत देखा। सब कुछ अति विस्मय से भर देने वाला था। पाँच पाण्डवों, युधिष्ठर के कुत्ते तथा द्रौपदी की मूर्तियाँ भी वहाँ लगी थीं, उन्हें स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते हुए दिखाया गया था। दोपहर के भोजन में शारदेश्वर होटल में स्वादिष्ट मक्की की रोटी व सरसों का साग ग्रहण किया। हम पुन: मंदिर पहुँचे तो पता चला तीन बजे कपाट खुलेंगे, द्वार के सामने सीढ़ियों पर हम प्रतीक्षा करते हुए बैठे रहे। जब मंदिर का द्वार खुला पुजारी जी ने घंटनाद किया, जो काफ़ी देर तक चला और उसकी ध्वनि पूरे शहर में गूँजने लगी। दर्शन के बाद वापसी की यात्रा आरम्भ की। ड्राइवर ने हनुमान चट्टी के दर्शन दूर से ही कराये। शाम को साढ़े चार बजे हम वापस निवास स्थान पर लौट आये।



५ सितम्बर २०२५

आज सुबह भी साढ़े आठ बजे हम सुरजीत की गाड़ी में गोविंद घाट के लिए रवाना हुए। गोविंदघाट से जो पुल पुलना की तरफ़ जाता है, उसे पैदल ही पार करना होता है। हमारे बैग एक पिट्ठू वाले ने उठा लिए। वहाँ से एक जीप में बैठकर हम पुलना के लिए रवाना हुए। पिट्ठू वाला भी जीप में हमारे साथ ही बैठ गया। पुलना से हम घोड़े पर बैठकर घांघरिया पहुँच गये।पिट्ठू वाला सभी सामान पीठ पर टंगी टोकरी में रखकर ले आया। हमारा गाइड जेडी पैदल ही आया।रास्ते में कई पैदल यात्री भी मिले, अब उनमें से कुछ कल फूलों की घाटी में भी मिल सकते हैं। यहाँ भी हम ब्लू पॉपी के टेंट में ठहरे हैं। टेंट में सभी सुविधाएँ हैं, बिजली आ-जा रही है। दोनों समय का भोजन शंकर ने बनाया, भजन सिंह यहाँ का मैनेजर है। शाम को घांघरिया बाज़ार तक घूमने गये। कुछ फ्रिज मैगनेट ख़रीदे। कल सुबह साढ़े छह बजे हमें निकलना है। फूलों की घाटी जाने का स्वप्न साकार होने वाला है। 


 


७ सितंबर २०२५ 

कल शाम हम लौटे तो मन एक विचित्र उल्लास का अनुभव कर रहा था। फूलों से भला किसे प्रेम नहीं होगा और जब फूल ऐसे हों जो हिमालय की उच्च घाटियों में न जाने कब से अपने आप ही खिल जाते हैं। जिनके रंग और आकार सदियों से पर्यटकों और वनस्पति शास्त्र के वैज्ञानिकों को आकर्षित करते रहे हैं। लगभग चार दशक पूर्व स्कूल के दिनों में एक बार यहाँ आने का अवसर  मिला था। उस समय देखी फूलों की घाटी की स्मृति मन में कहीं गहरे बसी थी। ब्रह्म कमल की भीनी सुगंध और भोज पत्रों की छुवन मन की परतों में छिपी थी। उन पहाड़ों में की गयी यात्रायें दशकों तक बुलाती रहीं। उन दिनों हम चमोली ज़िले के गोपेश्वर नामक स्थान में रहते थे। आज वह पल पुन: आया, जब हिमालय ने अपने प्रांगण में बुलाया।बादलों की धूप-छाँव के मध्य फूलों की घाटी तक का सफ़र यादगार बन गया है, रास्ते भर अनेक झरने व तेज गति से दौड़ती पुष्पा नदी  के दर्शन हुए। पगडंडियों के किनारे फूलों के वृक्ष, हरी-भरी घाटियाँ और बर्फ से ढकी चोटियाँ अपनी छवि बिखेर रही थीं। वापस आकर हमने गर्म पानी में पैर डाले, स्नान किया और फिर जल्दी भोजन खाकर विश्राम करने चले गये। आज हमें पंद्रह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित हिंदुओं व सिखों के पवित्र तीर्थ स्थल, लक्ष्मण मंदिर व हेमकुण्ड साहब जाना है। यात्रा कठिन है, इसलिए पैदल न जाकर हमने घोड़ों पर जाने का फ़ैसला किया है। 


८ सितंबर २०२५ 

हमने सुबह जल्दी ही यात्रा आरम्भ कर दी थी। हेमकुंड तीर्थ स्थल में रात्रि को ठहरने की कोई सुविधा नहीं है इसलिए यात्रियों को दोपहर दो बजे वापस आना पड़ता है।मध्य में दो बार रुक कर लगभग चार घंटों की यात्रा के बाद हम गुरुद्वारे पहुँच गये। हेमकुंड की यात्रा भी एक बार वर्षों पूर्व की थी। मन में बर्फ से जमी एक झील और ब्रह्म कमल की याद सबसे मुखर थी। इस बार भी ब्रह्म कमल के दर्शन हुए, झील के किनारे कई गमलों में उसके पौधे लगाये हुए थे, उनमें से कुछ सूख गये थे, पर उसकी गरिमा में कोई कमी नहीं आयी थी।हमने गुरुद्वारे में कदम रखा तो देखा, वहाँ दीवार से सटे हुए कंबलों के ढेर रखे हैं, यात्री कंबल ओढ़कर ही बैठते हैं। हमने भी कुछ देर शबद कीर्तन सुना और प्रसाद का कूपन लेकर नीचे हॉल में आये, जहाँ चाय व खिचड़ी का लंगर बंट रहा था।वह गर्म प्रसाद ही हमारा दिन का भोजन था।निकट ही लक्ष्मण मंदिर था तथा नंदा देवी का मंदिर भी। लक्ष्मण को यहाँ लोकपाल माना जाता है। सतयुग में शेषनाग के रूप में और द्वापर में बलराम के रूप में उन्होंने यहीं तपस्या की थी। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म में यहाँ तपस्या की थी। कहा जाता है, जब महिषासुर औरंगज़ेब के रूप में जन्म लेने वाला था, तब उन्हें भारत में जन्म लेने के लिए कहा गया। इतिहास और पुराण की इन गाथाओं को सुनकर लगता है, न जाने कितनी अदृश्य सत्ताएँ इस विश्व को चला रही हैं।ऐसे में मानव व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता धर्ता मानता है। मन में अनेक मधुर स्मृतियों को लिए अगले दिन सुबह हम देहरादून के लिए रवाना हुए, मार्ग में कुछ स्थानों पर भू स्खलन के कारण कुछ देर रुकना पड़ा, पर शाम होने से पूर्व ही हम मंज़िल पर पहुँच गये। 





शनिवार, दिसंबर 20

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - २


फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

दूसरा भाग




२ सितंबर २०२५

आज सुबह हम पंछियों के कलरव से उठ गये थे। रात्रि के सन्नाटे में नदियों की कलकल भी आ रही थी। कमरे से बाहर निकल कर टहलने गये, हवा शीतल थी और बहुत महीन हल्की सी फुहार पड़ रही थी। पहाड़ों की शुद्ध हवा जैसे भीतर तक ताजगी भर रही थी।नौ बजे हम आज की पहाड़ी यात्रा के लिए रवाना हुए। ड्राइवर सुरजीत सिंह घुमावदार रास्तों पर गाड़ी दौड़ाता हुआ दस हज़ार फ़ीट पर स्थित औली ले गया। यहाँ भी ब्लू पॉपी का एक रिज़ार्ट है। वहाँ से एक गाइड हमारे साथ हो लिया। हमारा लक्ष्य था गॉर्सन बुग्याल।गॉर्सन बुग्याल अल्पाइन घास का एक खूबसूरत मैदान है, जो हरे-भरे परिदृश्यों, ओक और देवदार के जंगलों और बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों के मनमोहक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है, और यह गर्मियों में ट्रेकिंग व कैम्पिंग तथा सर्दियों में स्कीइंग के लिए एक लोकप्रिय स्थल है।बादलों के कारण हमें हिमशिखरों के दर्शन नहीं हुए, जिसके लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। नंदा देवी, माना पर्वत, दूनगिरी जैसी चोटियों का मनोरम दृश्य यहाँ से दिखायी देता है।चेयर लिफ्ट से हम काफ़ी ऊँचाई तक पहुँच गये, जहाँ से असली पैदल चढ़ाई की शुरुआत होनी थी। वर्षा के कारण रास्ता कीचड़ भरा था, मैदान में  पशुओं के आने-जाने से गोबर पड़ा था, वहाँ दलदल सी हो गई थी; किंतु हम इन सब बाधाओं के लिए तैयार होकर आये थे, रेनकोट, ऐसे जूते जिसमें पानी का असर न हो, बड़ी सी हैट आदि सामानों से लैस होकर हम पक्के पर्वतारोही के भाव में भरे हुए थे। प्रकृति का ऐसा साथ जिसमें आकाश, भूमि, हवा, जल और वृक्ष सभी भीग रहे हों, हमें आगे बढ़ने से कैसे रोक सकता था। फारेस्ट गेट तक पहुँचते-पहुँचते हरे-भरे घास के मैदान दिखने लगे, जो हिमाचल व कश्मीर के चारागाहों की याद दिला रहे थे। मार्ग में हमने कई अनोखे फूलों के दर्शन किए, उनके चित्र लिए। पहाड़ों से बहती हुई अनेक छोटी-बड़ी जल धाराएँ आ रही थीं, जिन्हें भी पार करना था। दोपहर बाद लगभग भीगे हुए हम वापस पहुँच गये। दोपहर के भोजन में अन्य पदार्थों के अलावा भरवाँ बैंगन की सब्ज़ी व मसूर की साबुत दाल विशेष बनी थी। शाम को भी वर्षा की छुटपुट रिमझिम जारी रही।



३ सितंबर २०२५ 

आज सुबह भी नींद चार बजे खुल गई। मन उदात्त भावों से भरा था, ‘हिमालय’ पर चार कविताएँ लिखीं। कल सुबह यदि समय मिला तो कुछ और सृजन कार्य हो सकता है। आज भी नाश्ते में पोहा था, जिसमें हरे मटर तथा मूँगफली पड़े थे। साढ़े नौ बजे हम स्थानीय मंदिर देखने निकले। सबसे पहले आदि शंकराचार्य ज्योतिर्मठ गये। जहाँ पुजारी श्री विष्णु प्रियानंद जी ने मंदिर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। इस मठ में चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ हैं, उनके नाम भी लिखे हैं। वे आदि शक्ति ललिताम्बा की अनुचरियाँ हैं। जिन्हें त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं, वह दस महाविद्याओं में से एक षोडशी विद्या हैं। ‘सौंदर्य लहरी’ में आदि शंकराचार्य ने उन्हीं की वंदना की है। नवरात्रि में पूजे जाने वाले देवी के नौ रूप पार्वती के नौ रूप हैं। हमने त्रिपुरा देवी के दर्शन भी किए तथा वह गुफा भी देखी, जहाँ आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी। बारह सौ वर्ष पुराने प्राचीन कल्पवृक्ष के दर्शन भी हुए। जिसके नीचे उन्होंने ज्ञान ज्योति पायी थी।यह मठ अद्वैत के चिंतन और अध्ययन को समर्पित है। उन्होंने शंकर भाष्य की रचना भी यहीं की थी। ‘त्रोटकाचार्य’ आदि शंकराचार्य के शिष्य थे, जो उनके जाने के बाद प्रथम आचार्य हुए। निकट स्थित महादेव के एक मंदिर में अखंड ज्योति जल रही थी, जहाँ सभी भक्तगण प्रसाद की जगह केवल तेल चढ़ाते हैं। इसके बाद नरसिंह भगवान के विशाल मंदिर में गये।मान्यता है कि नरसिंह भगवान ने यहाँ योग किया और शांत भाव को प्राप्त हुए। सदियों पूर्व कर्नाटक से आये डिमरी ब्राह्मण इस मंदिर के पुजारी हैं।इसके प्रांगण में हनुमान, गौरी शंकर, गणेश, देवी और सूर्य को समर्पित कई अन्य मंदिर भी हैं। पुजारी लक्ष्मी नारायण जी ने कहा, आगामी नवरात्र में वे हमारे लिए भी पूजा करेंगे। उन्होंने फ़ोन नंबर ले लिए है, मठ में होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी भी देते रहेंगे। हम वहाँ दर्शन कर ही रहे थे कि पुत्र का फ़ोन भी आ गया था, वीडियो कॉल के माध्यम से उसे भी मठ के दर्शन करा दिये।


उसके बाद निकट के बाज़ार से कुछ स्थानीय दालें तथा सब्ज़ियों के बीज ख़रीदे।दोपहर का भोजन वापस आकर किया। शाम को होटल के पीछे वाली सड़क से नीचे उतरते हुए नदी के कुछ चित्र लिए।मौसम ख़राब होने के कारण पिछले चार दिनों से बद्रीनाथ व अन्य पर्यटन स्थल जाने का मार्ग बंद है।शाम को ज्ञात हुआ, आज इसी रिज़ौर्ट में बद्रीनाथ से एक समूह लौटा है, शायद कल हम भी जा सकेंगे। 



गुरुवार, सितंबर 25

हिमालय की यात्रा के बाद

हिमालय की यात्रा के बाद 


पर्वतों को छूकर

हम लौट आये हैं 

स्वप्न जो संजोये थे 

पूर्ण कर उन्हें

यादों में समेट

लाये हैं !


कदम-कदम पर 

भय की हार

आस्था की जीत हुई

हर पीड़ा, हर चुनौती

सुख और आनंद में 

बदलते देख

 हम लौट आये हैं !


भीषण ठंड में 

पत्थर ढोती बालायें  

ढोते भारी बोझ 

टेढ़े अनगढ़ रास्तों पर 

घोड़े व खच्चर 

उन्हें चढ़ते-उतरते देख  

हम लौट आये हैं !


 मानव की शक्ति में

जुड़ जाती परम शक्ति 

वृद्ध होते जनों को 

विश्वास की डगर पर 

 कदम बढ़ाते देख

हम लौट आये हैं !




बुधवार, दिसंबर 11

मिलन


मिलन 


जैसे कोई अडिग हिमालय 

मन के भीतर प्रकट हो रहा, 

उससे मिलना ऐसे ही था 

उर उसका ही घटक हो रहा ! 


छूट गयी हर उलझन पीछे 

सम्मुख था एक गगन विशाल, 

जिससे झरती थी धाराएँ 

भिगो रही थीं तन और  भाल !


डूबा था अंतर ज्यों रस में 

भीतर-बाहर एक हुआ था, 

एक विशुद्ध चाँदनी का तट 

जैसे चहूँ ओर बिखरा सा !




सोमवार, फ़रवरी 19

कैंची धाम की यात्रा

नैनीताल की एक छोटी सी यात्रा - २

कैंची धाम की यात्रा 


२० नवम्बर 

सुबह नाश्ते के बाद दस बजे हम नैनीताल से रवाना हुए।सबसे पहले शहर की चहल-पहल से लगभग तीन किलोमीटर दूर  स्थित ‘लवर्स पॉइंट’ नामक स्थान  देखा, जिसे सुसाइड पॉइंट भी कहते हैं। घाटी का दृश्य मनोरम था, यहाँ से खेत, झील और कई सुंदर पहाड़ियाँ दिखाई पड़ती हैं।हमने यादों के रूप में यहाँ की कई तस्वीरें कैमरे में क़ैद कर लीं।सूर्यास्त व सूर्योदय का दृश्य देखने भी लोग यहाँ आते हैं। जीप के ड्राइवर कम हमारे गाइड ने इस स्थान से जुड़ी एक कहानी बतायी। गाँव के एक लड़के और एक अंग्रेज लड़की की प्रेम कहानी; जो ब्रिटिश काल में घटी थी। इस दुखांत कहानी में लड़के को मरवा दिया जाता है, बाद में लड़की भी आत्महत्या कर लेती है। इसी जगह से घोड़े वाले एक अन्य प्रसिद्ध जगह टिफ़िन टॉप के लिए जाते हैं। इसके बाद हमारी कार चीना पीक पर रुकी, जहाँ से हिमालय के हिम शिखर दिखायी पड़ते हैं। शहर से छह किलोमीटर दूर स्थित चीना (नैना) पीक नैनीताल की सबसे ऊँची चोटी है। यहाँ हमने हिम से ढके हुए त्रिशूल, नंदा देवी तथा तीन अन्य शिखर देखने के लिए दूरबीन का उपयोग किया, बहुत ही सुंदर दृश्य था।इस पर्वत की चोटी से नैनीताल शहर की सुंदरता का विहंगम दृश्य भी देखाई देता है । यहाँ से थोड़ी दूर यात्रा करने पर पर ही सूखातल में स्थित इको केव गार्डन आ गया। इस स्थान को वर्ष 1990 में खोजा गया था। प्राकृतिक गुफाओं का उपयोग करके तथा सुंदर बाग-बगीचों द्वारा सुसज्जित यह पार्क एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल बन गया है।कई सुंदर मूर्तियाँ और विभिन्न आकर्षक आकार भी इसकी शोभा बढ़ाते हैं। गुफाओं के नाम टाइगर, पैंथर, बैट, उड़ने वाली लोमड़ी और साही जैसे जानवरों के नाम पर रखे गये हैं। कुछ गुफाओं में बैठकर जाना पड़ता है। टाइगर तो नहीं दिखा, पर उसकी आवाज़ें निरंतर आ रही थीं। यहाँ अनेक पर्यटक आये हुए थे। 

कैंची धाम पहुँचे तो बारह बज गये थे। ​​कैंची धाम  नैनीताल से लगभग 17 किलोमीटर और भवाली से 9 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। इस आधुनिक तीर्थ स्थल पर बाबा नीब करौली महाराज का आश्रम है । प्रत्येक वर्ष की 15 जून को यहां पर बहुत बड़े  मेले का आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश के श्रद्धालु भाग लेते हैं।अल्पायु में ही बाबा नीब करौली को ईश्‍वर के बारे में विशेष ज्ञान प्राप्त हो गया था. वे हनुमानजी को अपना आराध्य मानते थे. मंदिर में कई सुंदर मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। काफ़ी भीड़ थी, लोग बैठकर बाबा से अपनी मनोकामनाएँ बता रहे होंगे अथवा पूरी हो जाने पर कृतज्ञता व्यक्त करने आये थे। मन्दिर के सम्पूर्ण वातावरण में एक दिव्य ऊर्जा का अनुभव हो रहा था। नीब करौली बाबा की शिष्या सिद्धि माँ के बारे में एक पुस्तक ख़रीदी।

भवाली से कुछ आगे ही बढ़े होंगे की ड्राइवर ने कहा, चाय पीते हैं। मोड़ पर ही एक दुकान भी दिख गई। वहीं बैठे हुए उस रिज़ौर्ट के मैनेजर से बात की जहाँ हमें रुकना था। उसने बताया, यह रिज़ौर्ट मुक्तेश्वर में नहीं बल्कि चाँफी में है। ड्राइवर ने ईश्वर का धन्यवाद दिया कि कैसे उसे चाय के लिए रुकने की प्रेरणा जगी और उसने पता पूछा, वरना हम मुक्तेश्वर पहुँच गये होते। 



‘मचान’ रेस्तराँ में भोजन करने के बाद हम लगभग दो जगह से नदी पार करके बीस-पच्चीस मिनट कच्चे रास्ते पर पैदल चलकर चाँफी के जंगलसे सटे एक गाँव  में स्थित इस रिज़ौर्ट में आ पहुँचे हैं, जिसका नाम सॉलिट्यूड यानी एकांत बिलकुल सार्थक है। हमारा  सामान पहले ही एक महिला व एक पुरुष कुली ले आये थे।निकट ही कलसा नदी बह रही है, जिसकी आवाज़ एक मधुर धुन सी बज रही है । यहाँ माल्टे, संतरे और नींबू के कई बगीचे हैं।अनेक पक्षियों, झींगुरों और अन्य कीटों की आवाज़ें आ रही हैं। दो परिवार और रह रहे हैं।सामने ही हिम से ढकी चमकती हुई चोटियाँ एक स्वर्गिक अनुभव सी प्रतीत हो रही हैं।हमने रात्रि भोजन में सूप पिया और कुमाऊँनी खिचड़ी खायी। कल शिव धाम तथा मंदिर देखने मुक्तेश्वर जाना है। 

क्रमश:



बुधवार, मार्च 16

कश्मीर गाथा


कश्मीर गाथा 


कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है 

पर इसने नरक से भी बदतर हालात देखे हैं 

जहाँ ऋषियों की वाणी गूंजती थी 

जहाँ के संस्कार, आचार, विहार 

गवाही देते थे एक विकसित सभ्यता की 

साहित्य, संगीत, कला और अध्यात्म की 

ऊँचाइयों को छुआ था जिसने 

शिव की वह पावन भूमि 

जहाँ ज्ञान की अविरल सरिता बहती आ रही थी युगों से 

हिमालय के उत्तंग शिखरों के सान्निध्य में 

जहाँ अनेक ग्रंथों की रचना हुई 

पर जिसे नरक बना दिया चंद लुटेरों ने 

तलवार के बल पर धर्मांतरण कराया 

कट्टरपंथी शैतानों ने 

बेइंतहा दहशत फैलायी 

दरिंदगी और हैवानियत का सुबूत दिया 

धर्म के नाम को रुसवा किया

कश्मीर  का इतिहास 

निर्दोष शांति प्रिय पंडितों के खून से रंगा है 

जिसके धब्बे आज भी वहाँ की वादियों से  मिटे नहीं हैं 

मुखर हुई इस सच्चाई को देखकर 

किसका दिल नहीं दहल जाएगा 

किसकी रूह नहीं काँपेगी भीतर तक 

कौन खून के आँसू नहीं रोएगा 

सम्पूर्ण मानवता का दर्द समाया है इसमें 

आज शामिल हुआ है 

हर भारतीय का दिल भी उनके दर्द में 

जिनकी आवाज़ को दबा दिया गया 

जो अपने ही घरों से भागने  पर मजबूर किए गये 

जिन्हें अपने ही वतन में जलावतन होना पड़ा 

यह पीड़ा दिनों, हफ़्तों, महीनों शायद जीवन बाहर रुलाती रहे 

जगाए ज़मीर उनका जो ज़िम्मेदार हैं इसके लिए 

या उनका जो कुछ कर सकते थे, पर नहीं किया 

कहाँ थी भारतीय सरकार उस काली रात को 

कहाँ थे कानून के रखवाले 

कितना बेबस नज़र आता था हर कोई 

शायद तब कमजोर था देश 

हर तरह से कमजोर 

जो आज तक छिपाए रहा अपने दर्द को 

पर आज दिखा सकता है हर कटु सत्य को 

 हर विरोध का सामना करने की ताक़त है आज

आज पूरा देश खड़ा है 

अन्याय के ख़िलाफ़ इस युद्ध में 

कम पड़ते हैं शब्द कहने को वह पीड़ा 

जो भीतर टीस जगाती है 

जिन पर गुजरी उनकी याद करके 

कैसा  हौल उठता है  

एक चुप सी भर जाती है कभी 

और कभी रह-रह कर 

दिल काँप उठता है 

लेकिन यह दर्द मरहम बनेगा 

यकीनन कश्मीर का हाल बदलेगा 

फिर से गूँजेगीं वहाँ वेद की ऋचाएँ 

और घरों से सुर संगीत की धारा बहेगी 

हम देखंगे 

हाँ ऐसा होगा, हम देखेंगे !


शुक्रवार, जुलाई 3

द्रष्टा

द्रष्टा 

कवि द्रष्टा है 
उसने सत्य देखे हैं 
भुला देने दो सारे शास्त्र 
वह स्वयं शास्त्र है 
भुला देने तो सारा अतीत 
वह नया इतिहास रचेगा 
उससे झरते हैं शब्दों के झरने 
जहां से बनती है सृष्टि 
उसने चुना है वह 
जो कोई अन्य नहीं चुनता !
राही है वह अनजान राहों का 
अनसुलझे रहस्यों का 
बिना चढ़े ही नापी हैं उसने हिमालय की चोटियां 
रोया है उसका मन 
उस कृषक के साथ 
सुख गए हैं जिसके खेत 
वह मुस्काया है वर्षा की पहली बून्द पर 
उस तरह जैसे मुस्काये न कोई 
कोहिनूर मिलने पर !


शुक्रवार, अगस्त 1

स्वपति है सृष्टि अनंत यह


स्वपति है सृष्टि अनंत यह



हेम बरसता नभ से भू पर
ह्र्तल विकसित होता लखकर,
शुभ्र हिमालय धवल चोटियाँ
हिम किरीट धारें मस्तक पर !

हिमकर ज्योत्स्ना बिखराता
हारीत दुबका निज नीड़,
स्वाति बूंद टपकी सीपी में
स्वरति में प्रकृति है लीन !

स्वयंमेव ही घटता सबकुछ
स्वयंप्रभा से मंडित दिनकर,
स्वपति है सृष्टि अनंत यह
व्यर्थ जताते स्वत्व यहाँ नर !

स्रोत एक अजस्र शक्ति का
अस्यूत जिसमें है कण-कण,
होकर विस्मित नयन निरखते
प्रतिपल नवजीवन का स्फुरण !

स्फीत गगन का चंदोवा है
स्नात उजास में नित्य धरा,
स्तवन कर रहे अविरत नभचर
सौरभ महिमा का चहुँ बिखरा !