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बुधवार, सितंबर 9

गणेश पूजा

गणेश पूजा 


फिर आयेंगे गणपति 

कुछ दिनों के लिए 

घर बन जाएँगे मंदिर 

सुबह-शाम आरती के गूँजेंगे स्वर 

बूढ़े बन जाएँगे बच्चे 

बच्चे कुछ समझदार 

महिलाएं जुट जायेंगी

मीठे मोदक करने तैयार 

गणनायक की करुणा हर लेगी 

मन का सूनापन 

झर जाएगा हर विषाद 

निर्मल होगा मन का दर्पण 

आस्था की जीत होगी 

झुक जाएगा चरणों में तन !


गुरुवार, सितंबर 25

हिमालय की यात्रा के बाद

हिमालय की यात्रा के बाद 


पर्वतों को छूकर

हम लौट आये हैं 

स्वप्न जो संजोये थे 

पूर्ण कर उन्हें

यादों में समेट

लाये हैं !


कदम-कदम पर 

भय की हार

आस्था की जीत हुई

हर पीड़ा, हर चुनौती

सुख और आनंद में 

बदलते देख

 हम लौट आये हैं !


भीषण ठंड में 

पत्थर ढोती बालायें  

ढोते भारी बोझ 

टेढ़े अनगढ़ रास्तों पर 

घोड़े व खच्चर 

उन्हें चढ़ते-उतरते देख  

हम लौट आये हैं !


 मानव की शक्ति में

जुड़ जाती परम शक्ति 

वृद्ध होते जनों को 

विश्वास की डगर पर 

 कदम बढ़ाते देख

हम लौट आये हैं !




बुधवार, जून 14

करें सजदा हर कदम पर

करें सजदा हर कदम पर 


हर तरफ़  जलवा उसी का 

हर तरफ़ उसका ही नूर, 

कैसे कोई क़ैद भला 

रहे ख़ुद में ख़ुद से दूर !


बीज जैसे खोल में हो 

राज मन  ऐसे छुपाये,  

भीग जाये भावना में 

प्रेम का अंकुर उगाये !


एक दिन वह वृक्ष होगा 

आस्था के पुष्प धारे, 

दे सहारा  पंछियों को

रात-दिन जो गीत गायें !


करें सजदा हर कदम पर 

क्या हमारे पास अपना, 

चार दिन का यह सफ़र है 

बीतता ज्यों मधुर सपना !


तू चला है हाथ थामे 

सदा ही रहमत बरसती, 

तू सँवारे  ज़िंदगी को 

हर घड़ी जो है बदलती ! 


शुक्रवार, फ़रवरी 17

उर में मुक्ति राग बजें


उर में  मुक्ति राग बजें 

आशा नहीं आस्था के हम मिलकर दीप जलायें 

तज आकाश कुसुम तंद्रा के श्रद्धा पुष्प खिलायें,


हरकर तमस भरेंगे  पावन मधुर  सुवास हृदय में 

मंगल प्रीत अल्पनाओं  पर नेह घट विमल सजायें ! 


मोहपाश तोड़कर सहसा उर में  मुक्ति राग बजें 

नील गगन में भर  उड़ान  मन मयूर निर्मुक्त सजें,


पाषाणों से ढके स्रोत जो सिमटे अपने गह्वर 

सहज  प्रवाहित निर्बाधित  बह निकलें उत्ताल लहर  !


छाए बहार चहुँ ओर मिटे  तामस हर इक घट का 

झांकें गहन  रहस्य खोजें  खोलें  पट घूँघट का ! 


जो  गाए न गीत कभी ना  जिनकी लय-धुन बांधी

परिचय करें अनाम स्वरों  से  गूँजे  नयी रागिनी  !  

​​

सोमवार, जून 7

भाव-अभाव

भाव-अभाव

अभाव का काँटा जब तक चुभता रहेगा उर में 

भाव की धारा क्यों कर बहेगी 

जो ‘नहीं’ है ‘नहीं’ हो रहा है 

उस पर ही नज़र टिकी रही तो 

भय की कारा से छुट्टी क्यों कर मिलेगी 

बाहर ही बाहर यदि मन को लगाया 

तो पीड़ा और संताप दिखेगा 

अंतर गुहा में पल भर बिठाया 

तो श्रद्धा का फूल स्वयं खिलेगा 

खंडित विश्वास, टूटती आस्था की नींव पर 

नहीं टिकती भक्ति की इमारत 

पूर्ण की चाह है तो पूर्ण हो भरोसा 

तभी जीवन में सुरभि भरेगी !


शुक्रवार, सितंबर 4

अमर स्पर्श


अमर स्पर्श 

गतांक से आगे

आस्था और समर्पण के चरम क्षणों में कवि को अस्तित्त्व और स्वयं के मध्य जैसे कोई भेद जान नहीं पड़ता, जगत का स्वप्नवत रूप उसे प्रकट होता है और वह कह उठता है -

ओ अंतरमयि,

तुम्हारा करुणा कर ही

ध्यान बन कर

गति हीन गति से

मुझे खींचता है ।


अपने स्थान पर

मैं तुम्हें पाता हूँ ।


मन के मौन श्रृंगों पर

सुनहले क्षितिज

नव सूर्योदय की प्रतीक्षा में हैं ।


शुभ्र

अवाक्

आत्मोदय की ।

ओ विराट, चैतन्य

यह मैं क्या देखता हूँ


कि घर बाग पेड़

और मनुष्य

किसी अदृश्य पट में

चित्रित भर हैं ।

ये वास्तविक सत्य नहीं,

मोम के पुतले भर हैं ।’’


जीवन के जिन मूलभूत प्रश्नों का हल मानव सदा से खोजता रहा है, कवि पंत ने कितनी सरलता से श्रद्धा और भक्ति के भावों में उन्हें व्यक्त कर दिया है -


क्यों रहे न जीवन में सुख-दुख

क्यों जन्म-मृत्यु से चित्त विमुख?

तुम रहो दृगों के जो सम्मुख

प्रिय हो मुझको भ्रम, भय, संशय !


तन में आएँ शैशव यौवन

मन में हों विरह मिलन के व्रण,

युग स्थितियों से प्रेरित जीवन

उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!


जो नित्य अनित्य जगत का क्रम

वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,

हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,

जग से परिचय, तुमसे परिणय !


तुम सुंदर से बन अति सुंदर

आओ अंतर में अंतरतर,

तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर

वरदान, पराजय हो निश्चय !


कवि के जीवन और काव्य कर्म के बारे में जानने की इच्छा स्वाभाविक थी. ज्ञात हुआ, जन्म के कुछ घण्टे बाद ही माँ का साया उनके सिर से उठ गया था. दादी ने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया.सबसे छोटे होने के कारण परिवार में सभी का स्नेह मिला किन्तु माँ के प्रेम का अभाव उन्हें प्रकृति के सान्निध्य में ले गया. सलेटी छतों वाले पहाड़ी घर, आंगन के सामने आडू, खुबानी के पेड़, पक्षियों का कलरव, सर्पिल पगडण्डियां, बांज, बुरांश व चीड़ के पेड़ों की बयार व नीचे दूर दूर तक मखमली कालीन सी पसरी कत्यूर घाटी व उसके ऊपर हिमालय  के उत्तंग शिखरों और दादी से सुनी कहानियों  व शाम के समय सुनायी देने वाली आरती की स्वर लहरियों ने इस बालक को बचपन से ही कवि हृदय बना दिया था।

क्रमशः

रविवार, जुलाई 12

भय

भय 


भयभीत मन
 कंपता है पीपल के पत्ते की तरह 
हर आशंका के हल्के से झोंके पर 
डोल जाती है उसकी आस्था भी 
भय हर लेता है 
सारी स्थिरता और सौंदर्य अंतर का 
एक सूक्ष्म विषाणु से डरी हुई है आज मानवता
जो प्राणघातक न भी होता 
पर भयाक्रांत मन 
रोक देता है ऊर्जा का प्रवाह अपने ही भीतर
उसकी मति जकड़ जाती है ज्यों 
सद्विचार का प्रवाह रुक जाता है 
बस एक ही विचार 
खोल बना लेता है चारों ओर
भय ही नाश करता है कुछ लोगों का 
विषाणु नहीं 
सम्भवतः वे खो जाते है बेहोशी या तन्द्रा में 
भय से बचने के लिए 
जैसे शुतुरमुर्ग गड़ा लेता है 
अपनी गर्दन रेत में 
महामारी कुछ को लेने आती है 
पर उसका भय अनेकों को ले जाता है ! 

शनिवार, जुलाई 4

खेल कोई चल रहा ज्यों

खेल कोई चल रहा ज्यों 

विवश होकर आज मानव 
कैद घर में पूछता यह, 
कब कटेगी रात काली 
कब उजाला पायेगा वह ? 

उच्च शिखरों पर चढ़ी थी 
धूल धुसरित आज आशा, 
खेल कोई चल रहा ज्यों 
साँप-सीढ़ी की सी भाषा !

रज्जु को यदि सर्प माना
भय की दीवारें चुन ली, 
किन्तु ऐसा भी चलन है 
सर्प से ही आड़ बुन ली !

आज ऐसा ही समय है 
व्यर्थ सारा श्रम हुआ है, 
जहाँ पनपी आस्था थी 
भान होता भ्रम हुआ है !

सत्य को यदि ढूँढ पाए 
भूल से वह नहीं छिटके, 
राह अपनी जो चुनें फिर  
कदम ना उस डगर ठिठके !

बुधवार, अगस्त 28

आस्था का दीप दिल में


आस्था का दीप दिल में


कुछ नहीं है पास अपने
रिक्त है मन का समन्दर
मौन की इक गूंज है या
एक शुभ निर्वाण का स्वर

नीलिमा आकाश की भी
एक भ्रम से नहीं ज्यादा
बह रहा जो पवन अविरत
उसी ने यह जाल बाँधा

श्वास की डोरी में खिंच
चेतना का हंस आया
जाल कैसा बुन दिया इक
रचे जाता अजब माया

जिंदगी के नाम पर बस
एक सपना चल रहा है
ओढ़ कर नित नव मुखौटे
स्वयं को ही छल रहा है

भेज देता वह अजाना
एक स्मित इक हास कोमल
जो छुपा है खेल रच के
भर रहा है परस निर्मल

डोलती है धरा कब से
रात-दिन यूँ ही सँवरते
पंछियों के स्वर अनूठे
रंग अनजाने बिखरते

कौन जाने कब जला था
आस्था का दीप दिल में
या कि उसकी लपट यूँ ही
खो गयी थी बेखुदी में

शुक्रवार, मार्च 27

नेह घट सजाने हैं

नेह घट सजाने हैं

आशा के नहीं आस्था के दीप जलाने हैं
आकाश कुसुम नहीं श्रद्धा पुष्प खिलाने हैं,
हर लेंगे तम, जो भर देंगे सुवास मन में
प्रीत की अल्पना पर नेह घट सजाने हैं !

मोहपाश तोड़कर मुक्ति राग बज उठें
गगन में उड़ान भर मन मयूर गा उठें,
पाषणों से ढके स्रोत जो सिमटे थे
हुए प्रवाहित अबाधित वे बह निकलें !

छाए बहार चहुँ ओर मिटे तम घट का
झांकें क्या है पार खोल पट घूँघट का,
जो न गाए गीत कभी न राग जगे
परिचय कर लें आज नये उस स्वर का !  

बुधवार, जनवरी 1

नया वर्ष दस्तक देता है

नया वर्ष दस्तक देता है


धरती ने की पूर्ण सूर्य की, एक परिक्रमा देखो और
बीत गयीं कुछ अमावसें व, जगीं पूर्णिमाओं की भोर !

पुनः ली करवट ऋतु चक्र ने, सहज पुकारे है जीवन
हुई शोख रंगत फूलों की, सुन भ्रमरों की बढ़ती गुंजन !

अनल गगन की नव रश्मि से, हम भी तो भीतर सुलगा लें
भरकर भीतर नई ऊष्मा, कुहरा मन का छंट जाने दें !

करें पूर्ण जो रहा अधूरा, जो छूटे संग उन्हें ले लें
धूल सा झाड़ें जो अनचाहा, तज अतीत हल्के हो लें !

उम्मीदों की धूप जगाएं, ख्वाब भरें सूनी आँखों में
रब ने दी जिन्दगी जिनको, न्याय मांगते पर राहों में !

प्रेम जग दिलों में उनके, लोभ, स्वार्थ जहाँ है भारी
नये वर्ष में यही प्रार्थना, कोई न भूखा, न लाचारी !

नहीं घुले जहर मिट्टी में, हों निर्मल नदियों के जल
शुद्ध हवाएं, कटें न जंगल, तंग न हो किसी का दिल !

बेवजह गमजदा आदमी, जागे वह खुद को पहचाने
नहीं गुलामी करे किसी की, आजादी का सुख भी जाने !

एक नयी आस्था भीतर, जीवन का आधार बने
जीत सत्य की ही होगी, पुनः यही हुंकार उठे !

भय से नहीं प्रेम से जोड़ें, शुभ संस्कृतियाँ पुनः खिलें
नया वर्ष दस्तक देता है, खुशियों की सौगात मिले !