टूट गया जड़ता का बंधन
कुसुम उगाया उपवन में जब
मन मकरन्द हुआ जाता है,
प्रीत भरी इक नजर फिराई
अंतर् भीग-भीग जाता है !
खंजन ख़ुशी बिखेरें गाकर
सहज उड़ान भरा करते हैं,
स्वीकारा हँसकर जब जग को
मधुमय गीत झरा करते हैं !
राग-रागिनी जहाँ गूँजती
प्राणों में जग गया स्पंदन,
सुरभित हुई कायनात यह
टूट गया जड़ता का बंधन !
दरिया चला सौंपने स्वयं को
सागर का अनुयायी बनकर
मुक्त हुआ जा पहुँचा नभ में
सहज पवन-रवि अंक में चढ़कर !
स्वप्न सजाये भर नयनों में
सृष्टि पूर्ण करने को आतुर,
बादल दौड़े चले आ रहे
सुनी पुकार लगाये दादुर !
व्यर्थ हुई कम्पन श्वासों की
निकट स्रोत अमृत का बहता,
जगी प्रार्थना अंतर् में जब
कण विषाद का भी न रहता !










