सोमवार, अप्रैल 9

टूट गया जड़ता का बंधन



टूट गया जड़ता का बंधन
कुसुम उगाया उपवन में जब
मन मकरन्द हुआ जाता है,
प्रीत भरी इक नजर फिराई
अंतर् भीग-भीग जाता है !

खंजन  ख़ुशी बिखेरें गाकर
सहज उड़ान भरा करते हैं,
स्वीकारा हँसकर जब जग को
मधुमय गीत झरा करते हैं !

राग-रागिनी जहाँ गूँजती
प्राणों में जग गया स्पंदन,
सुरभित हुई कायनात यह
टूट गया जड़ता का बंधन !

दरिया चला सौंपने स्वयं को
सागर का अनुयायी बनकर
मुक्त हुआ जा पहुँचा नभ में
सहज पवन-रवि अंक में चढ़कर !

स्वप्न सजाये भर नयनों में
सृष्टि पूर्ण करने को आतुर,
बादल दौड़े चले आ रहे
सुनी पुकार लगाये दादुर !

व्यर्थ हुई कम्पन श्वासों की
निकट स्रोत अमृत का बहता,
जगी प्रार्थना अंतर् में जब
कण विषाद का भी न रहता !

बुधवार, मार्च 28

एक नगमा जिन्दगी का


एक नगमा जिन्दगी का


एक दरिया या समन्दर
बह रहा जो प्रीत बनकर,
बाँध मत बाँधें तटों पर
उमग जाये छलछलाकर !

एक प्यारी सी हँसी भी
कैद है जो कन्दरा में,
कसमसाती खुदबुदाती
बिखर जाएगी जहाँ में !

एक नगमा जिन्दगी का
शायराना इक फसाना,
दिलोबगिया में दबा जो
बीज महके बन तराना !

एक जागी रात आये
ख्वाब नयनों में सजाये,
दूर से आती सदा को
ला निकट कुहु गीत गाये !

एक नर्तन आत्मा का
ढोल की थापें अनूठी,
बाल दे अनुपम उजाला
बाँसुरी, वीणा की ज्योति

शनिवार, मार्च 17

भीतर एक स्वप्न पलता है




भीतर एक स्वप्न पलता है



आहिस्ता से धरो कदम तुम
हौले-हौले से ही डोलो,
कंप न जाये कोमल है वह
वाणी को भी पहले तोलो !

कुम्हला जाता लघु पीड़ा से
हर संशय बोझिल कर जाता,
भृकुटी पर सलवट छोटी सी
उसका आँचल सिकुड़ा जाता !

सह ना पाए मिथ्या कण भर
सच के धागों का तन उसका,  
मुरझायेगा भेद देख कर
सदा एक रस है मन जिसका !

हल्का सा भी धुआं उठा तो
दूर अतल में छिप जायेगा,  
रेखा अल्प कालिमा की भी
कैसे उसे झेल पायेगा !

कोमल श्यामल अति शोभन जो
भीतर एक स्वप्न पलता है,
बड़े जतन से पाला जिसको
ख्वाब दीप बन कर जलता है !

गुरुवार, मार्च 15

किसने खिलकर किये इशारे



किसने खिलकर किये इशारे


पी पी कह कर कौन पुकारे
किसे खोजते नयन तुम्हारे,
अंतर सरस तान बन गूँजा
किसने खिलकर किये इशारे !

हल्का-हल्का सा स्पंदन है
सूक्ष्म, गहन उर का कम्पन है,
जाने कौन उसे पढ़ लेता
चुप हो कहती जो धड़कन है !

मधुर रागिनी सा जो बिखरा
रस में पगा स्वाद मिश्री का,
तृप्त करे फिर तृषा जगाए
जादूगर वह कौन अनोखा !

एक तिलस्म राज इक गहरा
किसके चाहे खुलता जाता,
साया बनकर साथ सदा है
कौन प्रीत का गीत सुनाता !

सिहरन कब सम्बल बन जाती
भटकन कब मंजिल पर लाती,
कौन ख्वाब बन झलक दिखाता
किसकी चाह पूर्णता लाती !


मंगलवार, मार्च 13

उम्मीद



उम्मीद 



उम्मीद है कि दुनिया एक दिन यही कहेगी 
इंसानियत सिखाये भारत की परम भूमि 

कश्मीर के जवां फिर भारत के साथ होंगे 
जन्नत बनेगा फिर से अमनोहवा बहेगी 

दिलों में बनी जो दूरी घाव की पीर ताजी
पुरनम हुईं जो आँखें फिर झूम के हँसेंगी  

केसर गुलाब महकें अंतर में ख्वाब दहकें  
जिनके उजाले में फिर धरती हरी खिलेगी 

उम्मीद की शमा को दिल में जलाये रखना 
कितन घना तमस हो सुबह नव किरण उगेगी 

कश्मीरियों के दिल में उतना ही चैन होगा 
जितनी हमारे दिल से धारा उधर बहेगी 

बुधवार, मार्च 7

महिला दिवस पर शुभकामनायें




महिला दिवस पर



कभी जो भ्रमण करती थी सावित्री की तरह
 देश-देश योग्य वर की तलाश में
गार्गी की तरह गढ़ीं वेद ऋचाएं
विवश कर दी गयी अवगुंठन में रहने को 
उड़ा करती थी जो खुले युद्ध क्षेत्र में
  शेरनी की तरह रथ की लगाम थामे
अबला की उपाधि दे चुप करा दी गयीं
अन्याय सहते हुए जब
पानी सिर से ऊपर आ गया तो
कमर कस ली उसने
और सुसजग है आज की मानुषी अति
अपने उन खोये मूल अधिकारों के प्रति
षड्यंत्र रचा गया अनजान रखने का युगों से
जिसे अपनी ही क्षमताओं से
निकल पड़ी है अप्रतिम भविष्य की ओर...
 इस बार उसके कदम आगे ही बढ़ेंगे..
हर बाधा फलांग सीढ़ी चढ़ेंगे ! 

बुधवार, फ़रवरी 28

गीत उपजते अधरों से यूँ






गीत उपजते अधरों से यूँ


रंग बिखेरे जाने किसने
उपवन सारा महक रहा है,
लाल, गुलाबी, नीले, पीले
कुसुमों से दिल बहक रहा है !

एक सुवास नशीली छायी
मस्त हुआ है आलम सारा,
रँगी हुई है सारी धरती
होली का है अजब नजारा !

फगुनाई भर पवन बह रही
उड़ा रही है पराग गुलाल,
सेमल झूमी, महुआ टपका
फूले कंचन, कनेर, पलाश !

कण-कण वसुधा का हर्षित है
किसने आखिर किया इशारा,
मधुमास में चहकते पंछी
जाने किसने उन्हें पुकारा !

रस टपके मुदिता भी बरसे
कुदरत सारी नई हुई है,
गीत उपजते अधरों से यूँ
जैसे वर्षा बूंद झरी है !

मौसम का ही असर हुआ है
मन मयूर दिनरात नाचता,
बासंती यह पवन सुहाना
अंतर्मन में प्यास जगाता  !

होली रंग बहाती सुखमय
तन के संग-संग मन भीगे,
सारे जग को मीत बना लें
पिचकारी से प्रीत ही बहे !

शनिवार, फ़रवरी 24

राग अनंत हृदय ने गाया


राग अनंत हृदय ने गाया



मन राही घर लौट गया है
 पा संदेसा इक अनजाना,
नयन टिके हैं श्वास थमी सी
एक पाहुना आने वाला !

रुकी दौड़ तलाश हुई पूर्ण
आनन देख लिया है किसका,
निकला अपना.. पहचाना सा
जाने कैसे बिछड़ गया था !

कदर न जानी जान पराया
व्यर्थ दर्द के दामन थामे,
एक ख़ुशी भीतर पलती थी
जाने क्यों मुख मोड़ा उससे !

रसभीनी ज्यों पगी मधुक में
इक मनुहार छुपी थी मन में,
जिसकी खातिर आँखें बरसीं
वह झंकार बसी कण-कण में !

द्वार खुले अब दिल के ऐसे
भरा समन्दर, गगन समाया,
सिमट गयीं सारी सीमाएं
राग अनंत हृदय ने गाया !

नयन न खुलते जग फीका सा
मदिर-मदिर रस कोई घोले,
मौन की गूँज सुनी है जबसे 
चुप रहें अधर भेद न खोलें ! 

बुधवार, फ़रवरी 21

फागुन झोली भरे आ रहा




फागुन झोली भरे आ रहा


सुनो ! गान पंछी मिल गाते
मदिर पवन डोला करती है,
फागुन झोली भरे आ रहा
कुदरत खिल इंगित करती है !

सुर्ख पलाश गुलाबी कंचन
बौराये से आम्र कुञ्ज हैं,
कलरव निशदिन गूँजा करता
फूलों पर तितली के दल हैं !

टूटा मौन शिशिर का जैसे
एक रागिनी सी हर उर में,
मदमाता मौसम छाया है
सुरभि उड़ी सी भू अम्बर में !

नव ऊर्जित भू कण-कण दमके
हलचल, कम्पन हुआ गगन में,
पवन चले फगुनाई सस्वर
मधुरनाद गुंजित तन-मन में !

भीनी-भीनी गंध नशीली
नासापुट में महक भर रही,
रंगबिरंगे कुसुमों से नित
वसुंधरा नित राग रच रही !


बुधवार, फ़रवरी 14

इश्क की दास्ताँ





इश्क की दास्ताँ


उसने दिए थे हीरे हम कौड़ियाँ समझ के
जब नींद से जगाया रहे करवटें बदलते

ओढ़ा हुआ था तम का इक आवरण घना सा
माना  स्वयं  को घट इक जो ज्ञान से बना था

गीतों में प्रेम खोजा झाँका न दिल के भीतर
दरिया कई बसे थे बहता था इक समुन्दर

गहराइयों में दिल की इक रोशनी सदा है
उतरा नहीं जो डर से उस शख्स से जुदा है 

तनहा नहीं किसी को रखता जहाँ का मालिक
हर दिल में जाके पहले वह आप ही बसा है

जिस इश्क के तराने गाते हैं लोग मुस्का
मरके ही मिलता सांचा उस इश्क का पता 

उस एक का हुआ जो हर दिल का हाल जाने
सबको लगन है किसकी यह राज वही जाने