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मंगलवार, मई 5

एक रागिनी है मस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की


इक ही धुन बजती धड़कन में

इक ही राग बसा कण-कण में,

एक ही मंजिल, एक  रस्ता

इक ही प्यास शेष जीवन में !


इक ही धुन वह निज हस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की,

एक पुकार सुनाई देती

दूर पर्वतों की बस्ती की !


मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया

पंछी जैसे उड़ते गाते,

उड़ते मेघा संग हवा के

बेसुध छौने दौड़ लगाते !


खुल जायें जैसे नीलगगन 

उड़ती जैसे मुक्त पवन है,

क्यों दीवारों का कैदी है 

उर परम प्रीत की लगे लगन  !


एक अजब सा खेल चल रहा

लुकाछिपी है खुद की खुद से,

ख़ुद ही कहता ढूँढो मुझको

ख़ुद ही बंध दूर है खुद से ! 


 

शुक्रवार, फ़रवरी 17

उर में मुक्ति राग बजें


उर में  मुक्ति राग बजें 

आशा नहीं आस्था के हम मिलकर दीप जलायें 

तज आकाश कुसुम तंद्रा के श्रद्धा पुष्प खिलायें,


हरकर तमस भरेंगे  पावन मधुर  सुवास हृदय में 

मंगल प्रीत अल्पनाओं  पर नेह घट विमल सजायें ! 


मोहपाश तोड़कर सहसा उर में  मुक्ति राग बजें 

नील गगन में भर  उड़ान  मन मयूर निर्मुक्त सजें,


पाषाणों से ढके स्रोत जो सिमटे अपने गह्वर 

सहज  प्रवाहित निर्बाधित  बह निकलें उत्ताल लहर  !


छाए बहार चहुँ ओर मिटे  तामस हर इक घट का 

झांकें गहन  रहस्य खोजें  खोलें  पट घूँघट का ! 


जो  गाए न गीत कभी ना  जिनकी लय-धुन बांधी

परिचय करें अनाम स्वरों  से  गूँजे  नयी रागिनी  !  

​​

गुरुवार, मार्च 15

किसने खिलकर किये इशारे



किसने खिलकर किये इशारे


पी पी कह कर कौन पुकारे
किसे खोजते नयन तुम्हारे,
अंतर सरस तान बन गूँजा
किसने खिलकर किये इशारे !

हल्का-हल्का सा स्पंदन है
सूक्ष्म, गहन उर का कम्पन है,
जाने कौन उसे पढ़ लेता
चुप हो कहती जो धड़कन है !

मधुर रागिनी सा जो बिखरा
रस में पगा स्वाद मिश्री का,
तृप्त करे फिर तृषा जगाए
जादूगर वह कौन अनोखा !

एक तिलस्म राज इक गहरा
किसके चाहे खुलता जाता,
साया बनकर साथ सदा है
कौन प्रीत का गीत सुनाता !

सिहरन कब सम्बल बन जाती
भटकन कब मंजिल पर लाती,
कौन ख्वाब बन झलक दिखाता
किसकी चाह पूर्णता लाती !


बुधवार, फ़रवरी 21

फागुन झोली भरे आ रहा




फागुन झोली भरे आ रहा


सुनो ! गान पंछी मिल गाते
मदिर पवन डोला करती है,
फागुन झोली भरे आ रहा
कुदरत खिल इंगित करती है !

सुर्ख पलाश गुलाबी कंचन
बौराये से आम्र कुञ्ज हैं,
कलरव निशदिन गूँजा करता
फूलों पर तितली के दल हैं !

टूटा मौन शिशिर का जैसे
एक रागिनी सी हर उर में,
मदमाता मौसम छाया है
सुरभि उड़ी सी भू अम्बर में !

नव ऊर्जित भू कण-कण दमके
हलचल, कम्पन हुआ गगन में,
पवन चले फगुनाई सस्वर
मधुरनाद गुंजित तन-मन में !

भीनी-भीनी गंध नशीली
नासापुट में महक भर रही,
रंगबिरंगे कुसुमों से नित
वसुंधरा नित राग रच रही !


शुक्रवार, सितंबर 8

एक अजब सा खेल चल रहा


एक अजब सा खेल चल रहा


इक ही धुन बजती धड़कन में
इक ही राग बसा कण-कण में,
एक ही मंजिलरस्ता एक
इक ही प्यास शेष जीवन में !

मधुरम धुन वह निज हस्ती की
एक रागिनी है मस्ती की,
एक पुकार सुनाई देती
दूर पर्वतों की बस्ती की !

मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया
पंछी जैसे उड़ते गाते,
डोलें मेघा संग हवा के
बेसुध छौने दौड़ लगाते !

खुला हृदय ज्यों नीलगगन है
उड़ती जैसे मुक्त पवन है,
दीवारों में कैद न हो मन
अंतर पिय की लगी लगन है !

एक अजब सा खेल चल रहा
लुकाछिपी है खुद की खुद से,
मन ही कहता मुझे तलाशो
मन ही करता दूर स्वयं  से !

शुक्रवार, जुलाई 28

थम जाता सुन मधुर रागिनी

थम जाता सुन मधुर रागिनी

कोमल उर की कोंपल भीतर
खिलने को आतुर है प्रतिपल,
जब तक खुद को नहीं लुटाया
दूर नजर आती है मंजिल !

मनवा पल-पल इत-उत डोले
ठहरा आहट पाकर जिसकी,
जैसे हिरण कुलाँचे भरता
थम जाता सुन मधुर रागिनी !

जिसके आते ही उर प्रांगण
देव वाटिका सा खिल जाता,
हौले-हौले कदम धरे जब
मन नव कुंदन बन मुस्काता !

स्वयं ही दूर-दूर रहे हम
दुःख छाया में जन्मों बीते,
सुख बदली बन वह आता है
एक पुकार उठे अन्तर से !

रह ना पाए अनुपम प्रेमिल
पावन है वह करता पावन,
अर्पित मन को करना होगा
युग-युग से हो रहा अपावन !

आह्लादित है सृष्टि प्रतिपल
खिला हुआ वह नील कमल सा,
धरे धरा बन छाँव गगन की
पंछी सा नव सुर में गाता !

कोई उसका हाथ थाम ले
बरबस कदमों में झुक जाये,
दूरी नहीं भेद नहीं शेष
तृप्त हुआ सा डोले गाये !


सोमवार, जून 18

एक रागिनी है मस्ती की


एक रागिनी है मस्ती की

एक ही धुन बजती धड़कन में
एक ही राग बसा कण-कण में,
एक ही मंजिल, एक ही रस्ता
एक ही प्यास शेष जीवन में !

एक ही धुन वह निज हस्ती की
एक रागिनी है मस्ती की,
एक पुकार सुनाई देती
दूर पर्वतों की बस्ती की !

मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया
पंछी जैसे उड़ते गाते,
उड़ते मेघा सँग हवा के
बेसुध छौने दौड़ लगाते !

खुले हों जैसे नीलगगन है
उड़ती जैसे मुक्त पवन है,
क्यों दीवारों में कैद रहे मन
परम प्रीत की लगी लगन है !

एक अजब सा खेल चल रहा
लुकाछिपी है खुद की खुद से,
स्वयं ही कहता ढूंढो मुझको
स्वयं ही बंध कर दूर है खुद से !