गुरुवार, दिसंबर 16

जीवन मिलता है पग-पग पर

जीवन मिलता है पग-पग पर 


एक शृंखला चलती आती 

अंतहीन युग बीत गए हैं, 

इच्छाओं को पूरा करते 

हम खुद से ही रीत गये हैं !


प्रतिबिंबों से आख़िर कब तक 

खुद को कोई बहला सकता, 

सूरज के सम्मुख ना आए 

मन पाखी मरने से डरता !


जीवन मिलता है पग-पग पर 

कब तक रहें गणित में उलझे, 

हर पूजा की क़ीमत चाहें 

दुविधा उर की क्योंकर सुलझे !


धूप, हवा, जल, अम्बर बनकर 

बँटता ही जाता है रहबर, 

आनंदित होते रहते हम 

छोटे से दामन में भरकर !


11 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(१७-१२ -२०२१) को
    'शब्द सारे मौन होते'(चर्चा अंक-४२८१)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. प्रतिबिंबों से आख़िर कब तक

    खुद को कोई बहला सकता,

    सूरज के सम्मुख ना आए

    मन पाखी मरने से डरता !...मन को छूती सुंदर रचना ।

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  3. बहुत खूब अनीता जी, आध्‍यात्‍म को अलग ही उच्‍चस्‍तर पर ले जाती कव‍िता ...
    प्रतिबिंबों से आख़िर कब तक

    खुद को कोई बहला सकता,

    सूरज के सम्मुख ना आए

    मन पाखी मरने से डरता !

    जवाब देंहटाएं
  4. पूरी करते करते जीवन बीत जाता है ... पर अंकुश लगाने से भी तो मन रीत जाता है ...
    ये दुविधा ही शायद कम्जोरी है जिसे साधना होता है ...
    बहुत भाव पूर्ण ...

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  5. बहुत ही सरहानीय सृजन आदरणीय मैम

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  6. दिगम्बर जी, अनुराधा जी, विकास जी और मनीषा जी, आप सभी का स्वागत व आभार !

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