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सोमवार, जून 6

उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है


उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है 

चाहने वालों ने ही कर के दिखाया है 

पत्थरों में भी भगवान जगाया है 


यूँ तो हर जगह समायी है नमी, लेकिन 

बादलों ने ही उसे भू पर बहाया है 


कण-कण में उसकी हाज़िरी होगी मगर 

किसी राम किसी कृष्ण में नज़र आया है 


भूल गया था यह ज़माना जब-जब हक़ीक़त 

ज्ञान गीता का फिर-फिर पढ़ाया है 


हम वह आकाश हैं जो कभी मिटता नहीं 

उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है 


आग जलती रहे भीतर इश्क़ की सदा 

रुलाया लाख पर इसने ही हँसाया है 


निरंजन डोलता रहा हवा की मानिंद

किसी ने धूप चंदन का जलाया है 




रविवार, मई 22

हर पल फूलों सा खिल महके

 हर पल फूलों सा खिल महके

धूप खिली है उपवन-उपवन

पल में  जग सुंदर कर जाये, 

जैसे हवा बँट रही कण-कण 

क्या करने से हम बँट जाएँ !


हँसी बिखेरें, प्रेम लुटा दें 

मुस्कानों की लहर उठा दें, 

हर पल फूलों सा खिल महके 

जीवन को इक खेल बना दें !


उलझ न जाएँ किसी कशिश में 

नयी ऊर्जा खोजें भीतर,

बहती रहे हृदय की धारा 

अंतर में ही बसा समुन्दर !


कुछ भी छुपा नहीं उस रब से 

यह पल भी उपहार बना लें, 

ईश्वर अंश जीव अविनाशी 

इसी सूत्र को सत्य बना लें !


रविवार, फ़रवरी 6

वासन्ती हवा

वासन्ती हवा


धूप ने पिया जब फूलों का अर्क

भर गयी ऊर्जा उसके तन-बदन में....

कल तक नजर आती थी जो कृश और कुम्हलाई

आज कैसी खिल गयी है...

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


वसुधा ने भी ली है अंगड़ाई

भर दिया सहज  वनस्पतियों में यौवन

सिकुड़ी, सूखी सी दिखती थीं जो डालें कल तक 

पल्लवों से मिल गयी है

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


पाले में ढके, कोहरे में खेत

झूमते पा परस वासन्ती हवा का

चुप सी खड़ी थी जो सरसों की हर वह कली कल 

फूल बन घर से गयी है

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


उर में हुलस उठी बाल-युवा सभी 

शीत से बेहाल घरों में क़ैदी थे  , 

हुल्लड मचाने टोली उनकी मिलजुल कर आज 

दोस्तों के घर गयी है

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


गुरुवार, दिसंबर 16

जीवन मिलता है पग-पग पर

जीवन मिलता है पग-पग पर 


एक शृंखला चलती आती 

अंतहीन युग बीत गए हैं, 

इच्छाओं को पूरा करते 

हम खुद से ही रीत गये हैं !


प्रतिबिंबों से आख़िर कब तक 

खुद को कोई बहला सकता, 

सूरज के सम्मुख ना आए 

मन पाखी मरने से डरता !


जीवन मिलता है पग-पग पर 

कब तक रहें गणित में उलझे, 

हर पूजा की क़ीमत चाहें 

दुविधा उर की क्योंकर सुलझे !


धूप, हवा, जल, अम्बर बनकर 

बँटता ही जाता है रहबर, 

आनंदित होते रहते हम 

छोटे से दामन में भरकर !


सोमवार, अप्रैल 19

ज्यों धूप और पानी


ज्यों धूप और पानी


 

दिल में लरजता जो है 

 रग-रग में कम्प भरता,  

वह भिगो रहा अहर्निश 

जो लौ को ओट देता !


सम्भालता सदा है 

पल भर न साथ छोड़े, 

वह जिंदगी का मानी

धड़कन वही है तन में !


बरसता वही हर सूं

वह चाँद बन चमकता, 

गर ढूंढना उसे चाहें 

कोई पता ना देता !


ऐसे वह बंट रहा है 

ज्यों धूप और पानी, 

छुपा नहीं कहीं भी 

नजर आये न हैरानी ! 


महसूस करे कोई 

एक पल भी न बिसरता,  

जिसे पाके कुछ न चाहा

वैसा न कोई  दूजा  !


गर मिल गया किसी को 

कुछ और न वह मांगे, 

उसके ही संग सोये 

संग सुबह रोज जागे !


उसे क्या कोई कहेगा 

वह शून्य है या पूरा, 

हर होश वह भुला दे 

कोई जान न सकेगा !


उसे भूलना न सम्भव 

अनोखा निगेहबां हैं, 

मधुरिम वह स्वप्न देता 

हर दिल में आ बसा है !

 

सोमवार, मई 25

साँझा नभ साँझी है धरती

साँझा नभ साँझी है धरती 


दोनों के पार वही दर्शन 
जो दृश्य बना वह द्रष्टा है, 
जल लहरों में सागर में भी 
जो सृष्टि हुआ वह सृष्टा है !

हर दिल में इक दरिया बहता 
क्यों दुइ की भाषा हम बोले, 
साँझा नभ साँझी है धरती 
इस सच को सुन क्यों ना डोलें !

नीले पर्वत पीली माटी
हरियाली की छाँव यहीं है !
 तेरा मेरा नहीं सभी का 
दूजा कोई जहान नहीं है, 

हवा युगों से सबने बाँटी
तपिश धूप की, दावानल की, 
जल का स्वाद कभी ना बदला  
पीने वाला हो कोई भी !

सबको इक दिन जाना मरघट 
और निभाना फर्ज एक सा,
किसकी खातिर युद्ध हो रहे 
रिश्तों में है दर्द एक सा ! 


शुक्रवार, मई 8

भोर में


भोर में 


जब कूकती है कोकिल अमराई में 
तो मन का कमल खिलने लगता है, 
शीतल मन्द पवन की छुअन 
सहला जाती है हौले से 
हाँ, शायद उस स्पर्श  के द्वारा 
वही कोई सन्देश भेजता है ! 
दूर नारंगी रग का वृत्त 
जब रंग  रहा होता है 
 क्षितिज को 
तो मन के सागर में  
मानो नृत्य कर रही हों 
लहरों का आंदोलन यूँ लगता है !
हर सुबह कितनी अलग होती है 
जो कण-कण को प्रतिदिन 
 जीने के लिए अमृत से भर देती है 
तभी कहते हैं इसे अमृत बेला  !
अगर भोर की मासूमियत नहीं देखी तो 
दोपहर की चिलचिलाती धूप से 
सीधा वास्ता पड़ेगा 
और सहना कठिन होगा, बन्धु ! उसे 
मोर की केयाँ और 
मंदिरों से आती घण्टियों के स्वर 
सजा देते हैं भोर को कुछ और !

मंगलवार, सितंबर 3

झक्क उजाले सा



झक्क उजाले सा


रेशमी धूप सा जो सहलाता है अंतर
वही सूरज पांव मरुथलों में जलाता है

मीठी सुवास सा बहलाता है जो मन को
नुकीले पथ सा वही प्रेम चुभे जाता है

झक्क उजाले सा जो भर देता है आकाश
घन अँधेरे का सबब वही तो बन जाता है

सिवाय हँसने के क्या कहें इन अदाओं पर
 दे एक हाथ दूजे हाथ लिए जाता है


शुक्रवार, दिसंबर 15

कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितना नीर बहा अम्बर से
कितने कुसुम उगे उपवन में,
बिना खिले ही दफन हो गयीं
कितनी मुस्कानें अंतर में !

कितनी धूप छुए बिन गुजरी
कितना गगन न आया हिस्से,
मुंदे नयन रहे कर्ण अनसुने
बुन सकते थे कितने किस्से !

कितने दिवस डाकिया लाया
कहाँ खो गये बिन बाँचे ही,
कितनी रातें सूनी बीतीं
कल के स्वप्न बिना देखे ही !  

नहीं किसी की राह देखता
समय अश्व दौड़े जाता है,
कोई कान धरे न उस पर
सुमधुर गीत रचे जाता है !

शनिवार, फ़रवरी 25

चार कदम पर ही है होली


चार कदम पर ही है होली

मधु टपके बौराया उपवन
जाने कहाँ से रस  भरता है,
गदरायीं मंजरियाँ महकें 
संग समीरण के बहता है !

हुई नशीली फिजां चहकती 
फगुनाई सिर चढ़ कर बोली,
रंग-बिरंगी बगिया पुलके 
चार कदम पर ही है होली !

नन्ही चिड़िया हरी दूब पर 
नई फुनगियाँ  हर डाली पर,
कोई भेज रहा  है शायद
 पाती  गाता  पंछी सुस्वर !

हर पल जीवन उमग रहा है 
कभी धरा से कभी गगन से,
अंतर में यूँ भाव उमड़ते 
धुंधलाया हर दृश्य नयन से !

धूप और छाँव हर पल हैं 
दिवस-रात्रि, सुख-दुःख का मेला,
हास्य-रुदन दोनों घटते हैं
प्रीत बहाए दुई का रेला !

एक से ही उपजे हैं दोनों 
पतझड़ और बसंत अनूठे,
विस्मय से भर जाता अंतर 
दोनों के ही ढंग अनोखे !





बुधवार, दिसंबर 14

कितना सा था चाहत का घट

कितना सा था चाहत का घट 


श्वासें  भर जाएँ भावों से 
हो कृतज्ञ झुक जाये अंतर 
जीवन का उपहार मिला है 
बहता जैसे महा समंदर !

धूप नेह की खिली सघन जब 
प्रीत ऊष्मा मेघ बन गयी,
हुई  शुष्क जो नदिया उर की  
 बरस-बरस हो मगन  बह गयी !

कितना सा था चाहत का घट 
भर-भर कर ढुलका जाता है,
 दिशा-दिशा में वही समोया 
कितने दामन भर जाता है !

एक अतल सोता हो जैसे 
अंतहीन या कोई गह्वर,
जाने कहाँ से दे संदेशे 
सुनते ही आ जाते हैं स्वर !

खोलें तो हर द्वार है उसका 
उढ़काया तो वह ही बाहर,
हर आवाज उसी तक जाती 
लिए अनसुने उसके ही स्वर !



बुधवार, दिसंबर 7

राह देखता कोई भीतर


राह देखता कोई भीतर 

बाहर धूप घनी हो कितनी 
घर में शीतल छाँव घनेरी,
ऊबड़-खाबड़ पथरीला मग
दे आमन्त्रण सदा वही  !

लहरें तट से टकरा घायल 
घर जा पुनः ऊर्जित होतीं,
मन लहरों सा सदा डोलता 
घर जाने की सुध न आती !

राह देखता कोई भीतर 
मीलों विस्तृत नीलगगन सा,
क्लांत बटोही पा जाये ज्यों 
चिर आश्रय सुखद बसेरा !

किंतु स्वप्न में खोया अंतर 
घर से दूर निकल आया है,
भूल-भुलैया में जगती की 
स्वयं ही स्वयं को भटकाया है !










बुधवार, अगस्त 6

वह

वह


चहका कूक बनकर
महका फूल बनकर,
उमगा दूब सा वह
विहंसा धूप सा वह !

खिलता हर कली में
फिरता हर गली में,
रचता नीड़ सुंदर
बहता नीर बनकर !

जलता तारिका बन
उड़ता सारिका बन
गिरता निर्झरों सा
पलता नव शिशु सा !

भजता भक्त बनकर
रचता कवि बनकर
गढ़ता बुत नये नित
बढ़ता उषा संग नित !



सोमवार, जून 2

घट-घट में आकाश बंट रहा


घट-घट में आकाश बंट रहा


धूप बंट रही पोखर-पोखर
भर जाती खेतों को छूकर
हवा बंट रही अनगिन उर में
जाती खिल-खिल जीवन बनकर
जल बंटता अवनि अम्बर में
धरा बंट रही पादप रचकर
घट-घट में आकाश बंट रहा
फिर क्यों हम अनबंटे रह गये
सीमाओं में छंटे रह गये ?
जो बंट जाता वही बचा है
ऐसा ही यह खेल रचा है
एक अनेकों रूप बनाये
हर इक स्मित में मुस्का जाये !

शुक्रवार, मार्च 14

वही


वही  


अस्तित्त्व की गहनतम पुकार
हवा और धूप की तरह जो
 बिखरा है चारों ओर
पर फिसल-फिसल जाता है
मुट्ठी से जलधार की तरह..
सूक्षतम इकाई भी अस्तित्त्व की
 जो सीख लेता है देना
 जान ही लेगा वह पाने का राज भी
 जीत की चाह गिर जाती है जिस क्षण
हार भी छोड़ देती है रास्ता
सुख की तलाश खत्म होते ही  
हो जाता है हर दुःख बेगाना....

बुधवार, फ़रवरी 5

लो आ गया वसंत

लो आ गया वसंत


धूप रानी हो गयी
रुत सुहानी हो गयी
बाग में कलियाँ खिलाता
छा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

खुशबुएँ तन पर लपेटे
रंग अनगिन भी समेटे
भू सजाता मुस्कुराता
भा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

भ्रमर गूँजते विकल
तितलियों के उड़ें दल
कुम्हलाया मुरझाया मन
खा गया वसंत
लो आ गया वसंत !

मंजरी मदहोश हुई
मस्तियों की कोष हुई
आम्र वन में खिलखिलाता
सा गया वसंत
लो आ गया वसंत !