युग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
युग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, जनवरी 18

यह पल

यह पल 


माना अनंत युग पीछे हैं 

और इतने ही आगे हमारे 

किंतु यह क्षण 

न कभी हुआ न होगा दोबारा 

हर दिन नया है 

हर घड़ी पहली बार भायी है 

चक्र घूम चुका हो चाहे कितनी बार 

पर हर बार बरसात 

किसी और ढंग से आयी है 

स्मृतियों का बोझ न रहे सिर पर 

न भावी का कोई डर 

इस पल में ही जी लें और मरना पड़े तो जाएँ मर 

हर क्षण हमें पूरा ही चाहता है 

पूर्ण होकर ही पूर्ण से मिला जा सकता है 

हरेक फूल द्वारा 

अपनी तरह से ही खिला जा सकता है 

इसलिए यह पल दर्द का है या ख़ुशी का 

अनमोल है 

वक्त के लम्बे दौर में 

न इसका कोई मोल है ! 


गुरुवार, दिसंबर 16

जीवन मिलता है पग-पग पर

जीवन मिलता है पग-पग पर 


एक शृंखला चलती आती 

अंतहीन युग बीत गए हैं, 

इच्छाओं को पूरा करते 

हम खुद से ही रीत गये हैं !


प्रतिबिंबों से आख़िर कब तक 

खुद को कोई बहला सकता, 

सूरज के सम्मुख ना आए 

मन पाखी मरने से डरता !


जीवन मिलता है पग-पग पर 

कब तक रहें गणित में उलझे, 

हर पूजा की क़ीमत चाहें 

दुविधा उर की क्योंकर सुलझे !


धूप, हवा, जल, अम्बर बनकर 

बँटता ही जाता है रहबर, 

आनंदित होते रहते हम 

छोटे से दामन में भरकर !