गुरुवार, मार्च 19

अपना दिल तो बंजारा है


पिछले दिनों हम भारत के उत्तर-पूर्व में घूमने गए थे, 
हमारे टूर मैनेजर की सहायता से यात्रा निर्विघ्न संपन्न हुई। आभार स्वरूप उसी के लिए लिखी गई है यह रचना 

अपना दिल तो बंजारा है 

जोरहाट में माँ का घर है 
 भाइटी का गुवाहाटी में, 
अपना दिल तो बंजारा है 
 पापा का निवास जंगल में!

मेघालय के झरनों में कुछ 
इंद्रधनुष हमने देखे हैं, 
गहन गुफाओं के भीतर जा 
सदियों से संवाद किए हैं !

दूर सघन वन अरुणाचल के 
जब मेहमानों को दिखाता, 
उनकी आँखों के विस्मय में 
मेरा अंतर भी मुस्काता !

हिमशिखरों पर रवि किरणों को 
अठखेली करते जब देखा,  
जमी हुई गहरी झीलों को 
निमिष भर में पिघलते देखा !

लाल-गुलाबी फूलों से भर 
सारी घाटी खिल-खिल जाती, 
दूर कहीं सूने जंगल से 
खग की तान-सुरीली आती !

सड़कों पर हफ़्तों  जब रहता 
माँ को कितनी चिंता रहती, 
कोई राह निहारे बैठी 
उसकी याद सचेतन रखती !

घूम रहा हूँ हर इक कोना 
वैभवशाली नॉर्थ-ईस्ट का,  
दुनिया देखे और सराहे 
दिल छोटा सा देखे सपना !


8 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति का रूप अति निराला है ,घुमक्कड़ी का सुख बहुत प्यारा है। परिचित करवाये जो अनजान राहों से ,उस साथी को स्नेह जिसने यात्राओं को संवारा है।
    सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर।
    ------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २० मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. वाह! कितनी सुंदर काव्यात्मक प्रतिक्रिया दी है आपने श्वेता जी, पाँच लिंकों का आनंद में शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार!

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