नदिया बहती जाये
यादों के कुछ कंकर
तलहट में सिमटे हैं,
हर पल वह नयी हुई
बतिया कहती जाये !
नदिया बहती जाये !
कल भी तो यह तट था
स्मृतियाँ पुरानी हुईं ,
इस पल में देखो हर
पर्यय सहती जाये !
नदिया बहती जाये !
अब क्यों वे घाव चुभें
पाहन के लहरों को,
घिस-घिस सुडौल होते
सैकत रहती जाये !
नदिया बहती जाये !
सुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंपाहन का सैकत तक के सफर में नदी के प्रवाह की अनवरतता है
जवाब देंहटाएंसाधुवाद सुन्दर सृजन हेतु
स्वागत व आभार!
हटाएंनदिया अपना कम कर रही है . करने वाला अपना काम कर रहा है ...
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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