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गुरुवार, जुलाई 16

नदिया बहती जाये

नदिया बहती जाये 


यादों के कुछ कंकर 

तलहट में सिमटे हैं, 

हर पल वह नयी हुई 

बतिया कहती जाये !


नदिया बहती जाये ! 


 कल भी तो यह तट था 

स्मृतियाँ पुरानी हुईं , 

इस पल में देखो हर

पर्यय सहती जाये ! 


नदिया बहती जाये ! 


अब क्यों वे घाव चुभें 

पाहन के लहरों को,

घिस-घिस सुडौल होते 

सैकत रहती जाये !


नदिया बहती जाये !

 

शनिवार, अगस्त 9

भीतर एक नदी बहती है



भीतर एक नदी बहती है

भीतर एक नदी बहती है
लेकर कितने भेद हृदय में,
अंतर को सिंचित करती है !

उद्गम कहाँ ? कौन जानता
अंत भी अनदेखा ही रहता,
निर्मलता उर में भरती है !

तट पर कितने दुर्ग बनाये
युद्ध लड़े हारे जितवाए,
अनथक वह गतिमय रहती है !

सुर सरिता है यूँ भासता
देवलोक से आई भू पर,
मृत अतीत संग ले जाती है !

भावों की हाला भर उर में
मृदु मद्धिम गाती इक सुर में,
मंथर गति से इतराती है !



मंगलवार, मई 6

नदी मन की

 नदी मन की


संकल्प और विकल्प
 दो तटों के मध्य
नदी बहती है
हम किनारों पर ही बैठे बैठे
देखते रहते, जान नहीं पाते
वह क्या कहती है !

कभी घने जंगलों से गुजरती
कभी कठोर स्थलों से फिसलती
हम लुटते-कटते, अंजान से बिंधते
देख नहीं पाते
वह क्या सहती है 

गुरुवार, नवंबर 1

जीवन की नदी




जीवन की नदी

सुख और दुःख के दो तटों के मध्य
जीवन की नदी बहती है
कभी उथली, कभी गंदली
कभी दीपों, फूलों से भरी
जाने कितने जीवन आए, चले गए
वक्त के थपेडों में छले गए
कभी कोई जीवन थम कर निहारता है खुद को
तो सुख-दुःख के तटों पर नहीं उतरता अब
बहता ही चला जाता है
अनजान राहों पर.. अनंत की तलाश में
वही पाता है कि
श्वास और मौन के तट उग आए हैं
उसके दोनों और
जिनके बीच मन की नदी बहती है...

(यह कविता मन की नदी का पूर्वार्ध है, पर यह बाद में लिखा गया)