श्वासों की समिधा को
अंतर की हवि कर दें,
पल-पल में जी लें फिर
सुंदर की छवि भर लें !
उर के घट पावन में
प्रियतम जो बसता है,
अर्पण कर भाव सभी
मन मयूर तकता है !
पावक है शीतल सी
छुवन बड़ी कोमल सी,
हर पल का साक्षी वह
स्मृतियाँ अति श्यामल सी !
श्वासों की माला को
हर पल ही याद रखें,
उसको ही कर अर्पित
मुक्ति का स्वाद चखें !
अर्थहीन सा जीवन
क्रीड़ा इक बन भाए,
कृत्यों का करना ही
उनका फल बन जाये !
जैसे वह बाँट रहा
दोनों ही हाथों से,
भर झोली बिखराएं
हम कुछ सौगातों से !
दाता वह दानी बन
ज्ञाता वह ज्ञानी बन,
उसकी ही थाती को
चरणों पर कर अर्पण !
उसकी महाशक्ति को
जगकर हम पहचानें,
उसकी महाभक्ति को
जीवन का फल मानें !
भीतर जो रहता है
युग-युग का है साथी,
मौनी जब होता मन
झलकाता शुभ ज्योति!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें