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मंगलवार, मई 19

अभी और यहाँ

अभी और यहाँ 


क्या तुम हो? 

हाँ, इससे कौन इंकार करेगा 

अपना होना तो सबने जाना है !


क्या तुम यहाँ हो ?

इसमें शक है 

तुम कहीं भी हो सकते हो 

चंद्रमा पर, समुद्र के किनारे, बाज़ार में या घर पर ! 


क्या तुम अभी हो ?

इसमें भी शक है 

तुम कल रात में अटके हो सकते हो 

या पिछले साल 

या दस साल पहले की 

किसी बात को याद करके 

आज भी रो सकते हो 

उतनी ही शिद्दत से !


यहाँ और अभी होने के लिए 

बस एक ही शर्त है

अपने केंद्र में रहना सीख लो 

तब कहीं और कभी भी रहो 

तुम सदा ही 

अभी और यहाँ हो !!

 

मंगलवार, मई 17

अभी

अभी

अभी खुली हैं आँखें
तक रही हैं अनंत आकाश को
अभी जुम्बिश है हाथों में
 लिख रही है कलम प्रकाश को
अभी करीब है खुदा
पद चाप सुनाई देती है
अभी धड़कता है दिल
उसकी झंकार खनखनाती है
अभी शुक्रगुजार है सांसें
भीगी हुईं सुकून की बौछार से
अभी ताजा हैं अहसास की कतरें
डुबाती हुई सीं असीम शांति में
अभी फुर्सत है जमाने भर की
बस लुटाना है जो बरस रहा है
अभी मुद्दत है उस पार जाने में
बस गुनगुनाना है जो छलक रहा है  



(वर्तमान के एक क्षण में अनंत छुपा है)