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शुक्रवार, सितंबर 27

सत्य-असत्य

सत्य-असत्य 


असत्य की हल्की सी रेखा भी 

सत्य के हिमालय को छुपा देती है 

जैसे आँख में पड़ा धूल का एक कण 

विस्तीर्ण गगन को 

चाह की एक हल्की सी चिंगारी भी 

मन के चैन को जला देती है 

जैसे विष की एक बूँद 

सारे कूप को बना देती है विषैला 

उसके पास जाना हो 

तो निर्मल रखना होगा मन को 

दानवों का अधिकार हो जाता है 

यदि कपट हो ह्रदय में 

निःस्वार्थ, निष्पाप और निर्द्वंद्व 

ही मिल सकता है 

उस निसंग, निरंजन से 

और तब शांति की अजस्र धाराएँ 

चारों ओर से 

दौड़ी चली आती हैं 

उग आते हैं पुष्प उद्यान, मन प्रांगण में 

और गूंजने लगती है सरगम श्वासों में 

सत्य की ही विजय होती है 

असत्य तो पहले से ही पराजित है 

चिर पराजित ! 


शुक्रवार, मार्च 11

सत्यमेव जयते

सत्यमेव जयते 


सत्य की विजय होती है सदा 

क्योंकि सत्य ही विजय है !

सत्य अग्नि है 

जो हर झूठ को निगल जाती है अंतत: !

सत्य का दामन काँटों भरा लगता है 

पर उल्लास के पुष्प भी वहीं खिलते हैं !

कहते हैं सत्य की राह दुधारी तलवार की तरह होती है 

पर संतुलन की कला  वहीं सीखी जाती है !

सत्य हरेक शै का आधार है 

हरेक के अंतर्मन में  छिपा निर्दोष प्यार है !

असत्य भी सत्य का सहारा लेता है 

नादान रस्सी को ही साँप समझ लेता है 

और सीपी को चाँदी !

सत्य कभी मरता नहीं 

क्योंकि वह कभी जन्मता नहीं 

असत्य बनावट है, जो जन्माया जाता है  

सो एक दिन निश्चित है उसकी मृत्यु ! 


सोमवार, अप्रैल 27

हम और दुनिया

हम और दुनिया 


हम जैसे हैं, 
वैसे ही स्वीकार करे दुनिया 
चाहते हैं हम, 
क्योंकि बदलना हमें भाता नहीं 
इसमें श्रम लगता है, खुद को तराशना पड़ता है 
जो हमें  आता नहीं !
अपनी भूलें भी सहज लगती हैं 
आखिर वे किसी का क्या बिगाड़ती  हैं ?
पर... दुनिया को तो बदलना होगा 
हमारी ख्वाहिश यही है !
वहां असत्य है ( जैसे कि हम सत्य के अवतार हैं )
वहां अन्याय है ( हम तो न्याय के पुजारी हैं )
वहां अधर्म है ( जैसे कि हम धर्म का पाठ पढ़कर ही जन्मे थे )
वहाँ हमें कोई समझता नहीं (जैसे हमने हर किसी को समझने का प्रयास कर ही लिया है )
हम स्वीकारते हैं स्वयं को सारी भूलों सहित 
तो क्यों न स्वीकार लें जगत को जैसा वह है !
परमात्मा हर जगह उतना ही समाया है 
जिसे वह कमल और कीचड़ दोनों में नजर आया है 
वह जानता है
 कमल खिल नहीं सकता बिना कीचड़ के 
हाँ, उससे ऊपर उठता है जो 
वह यह राज देख पाता है 
धर्म-अधर्म दोनों के परे जाकर ही 
कोई उस एक से जुड़ पाता है !

रविवार, अगस्त 24

सत्य से पहचान

सत्य से पहचान 



झूठ से ही परिभाषित करते हैं  
‘स्वयं’ को जब हम
तब छले जाते हैं बार-बार
“जो है” जब उस पर नजर नहीं जाती
‘जो होना चाहते हैं’ की चाह में जले जाते हैं
“जो है” शुभ है, सुंदर है, सत्य है
इसे भुलाकर
घेर लेते हैं अपने चारों पर एक असत्य
व्यर्थ ही कैद होते हैं पिंजरों में
और झूठी आशा में जिए जाते हैं  
 ‘स्वयं’ को करते सीमाओं में कैद
 मन, कभी अहंकार के हाथों
अपने ही मूल को डसते हैं
जाने कैसा रोग लगा है
‘जो है’ स्वीकार करना नहीं सीखा
सच के आईने में स्वयं को अभी नहीं देखा
मृण्मय है जो माया
उसको तो हमने बहुत सजाया
सम्मान के लोभ में  
खुद को कहीं पीछे छोड़ आये
एक बेहोशी के आलम में
स्वप्नों की दुनिया बसाना चाहते हम
सत्य से हर बार बच कर निकल आये 
समिधा बनेगा अंतर का हर भाव 
यहाँ तक कि हर दुराव व छिपाव 
स्वयं की अग्नि तभी होगी दीप्त 
छा जायेंगे मेघ चिदाकाश में 
सत्य बरसेगा !
अतीत, वर्तमान, व भविष्य 
गायेंगे जब समवेत स्वरों में 
जीवन की ऋचाएं 
मन वर्तिका जलेगी ज्ञानाग्नि में 
यज्ञ पुरुष सत्य बन प्रकटेगा !