उसी मूल से मन आया है
नीलगगन पर तिरते मेघा
सूर्य-चन्द्र, तारागण अनुपम,
धार अनूठी, नीर सुवासित
कुदरत की यह महिमा मधुरिम !
अभिनव किसी स्रोत से उपजे
उसी मूल से मन आया है,
मधुराधिपति का भव अष्टधा
मन से ही उपजी काया है !
वही चेतना सुंदर बनकर
बिखर गयी कण-कण में जग के,
सत्यम शिवम सुंदरम् की ही
अभिव्यक्ति हो बस जीवन में !
हास्य मधुर हो, वाणी मीठी
रसमय चितवन, याद अनूठी,
शब्द-शब्द रस से भीगा हो
एक खानि है भीतर रस की !
आत्मस्रोत चैन का उद्गम
गंगा सा निर्मल बह जाए,
सृजन घटे छाया है उसकी
वही सदा अंतर को भाए !



