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बुधवार, मई 6

लॉक डाउन में ढील

लॉक डाउन में ढील


ग्रीन, रेड और ऑरेंज जोंस में 
अब  बंट गए हैं लोग 
लगता है, विभाजन ही मानव की नियति है 
ग्रीन में आजादी अधिक है 
जिंदगी पूर्ववत होने का आभास दे रही है 
अति उत्साह में लोग भूल जाते हैं 
चेहरे पर मास्क लगाना 
और दो गज की दूरी बनाये रखना 
वे इस तरह बाहर निकल आये हैं 
जैसे पिंजरों से पंछी 
सब्जी-फल की दुकानों से ज्यादा 
लगी हैं लंबी-लंबी कतारें 
उन दुकानों पर, 
जहाँ मस्ती और चैन के नाम पर 
जहर बिकता है 
पर नशे का व्यसन उन्हें विवश करता है 
अथवा वे डूब जाना चाहते हैं 
जीवन की वास्तविकताओं को भुलाकर 
किसी ऐसे लोक में 
जहाँ न नौकरी जाने का गम है 
न कोरोना से ग्रस्त हो जाने का 
वे चैन की नींद सो सकेंगे चंद घण्टे शायद बेहोशी में 
काश ! कोई उन्हें बताये 
एक चैन और भी है, जो बेहोशी में नहीं 
होश में मिलता है 
जिसे पाकर ही दिल का कमल पूरी तरह खिलता है 
जहाँ टूट जाती हैं सारी सीमाएं 
मन उलझनों से पार... खुद से भी दूर लगता है 
यह अनोखा नशा ध्यान का 
ऊर्जा से भरता है 
और यह बिन मोल ही मिलता है !


रविवार, अगस्त 24

सत्य से पहचान

सत्य से पहचान 



झूठ से ही परिभाषित करते हैं  
‘स्वयं’ को जब हम
तब छले जाते हैं बार-बार
“जो है” जब उस पर नजर नहीं जाती
‘जो होना चाहते हैं’ की चाह में जले जाते हैं
“जो है” शुभ है, सुंदर है, सत्य है
इसे भुलाकर
घेर लेते हैं अपने चारों पर एक असत्य
व्यर्थ ही कैद होते हैं पिंजरों में
और झूठी आशा में जिए जाते हैं  
 ‘स्वयं’ को करते सीमाओं में कैद
 मन, कभी अहंकार के हाथों
अपने ही मूल को डसते हैं
जाने कैसा रोग लगा है
‘जो है’ स्वीकार करना नहीं सीखा
सच के आईने में स्वयं को अभी नहीं देखा
मृण्मय है जो माया
उसको तो हमने बहुत सजाया
सम्मान के लोभ में  
खुद को कहीं पीछे छोड़ आये
एक बेहोशी के आलम में
स्वप्नों की दुनिया बसाना चाहते हम
सत्य से हर बार बच कर निकल आये 
समिधा बनेगा अंतर का हर भाव 
यहाँ तक कि हर दुराव व छिपाव 
स्वयं की अग्नि तभी होगी दीप्त 
छा जायेंगे मेघ चिदाकाश में 
सत्य बरसेगा !
अतीत, वर्तमान, व भविष्य 
गायेंगे जब समवेत स्वरों में 
जीवन की ऋचाएं 
मन वर्तिका जलेगी ज्ञानाग्नि में 
यज्ञ पुरुष सत्य बन प्रकटेगा !