शिवलिंग और शालिग्राम
सुडौल हैं दोनों
नहीं है कोई नुकीलापन किसी भी कोने में
कोना ही नहीं उनमें
नदी के तल में रहते-रहते जब
दो पत्थर आपस में टकराते हो जाते हैं चिकने
खो जाता है हर खुरदुरापन
तब बन जाते हैं वे छोटे-छोटे शिवलिंग
बरसों तक साथ रहते जन भी
जब नहीं चुभते एक दूसरे को
नहीं कुरेदते एक-दूसरे की कमियों को
खो जाता है अहम का नुकीलापन
और झर जाती हैं कटंकों की बेल
जो अपने इर्दगिर्द उगाई थी
कभी आत्मसम्मान कभी पहचान के नाम पर
तो वे भी बन जाते हैं सुडौल एक दूजे के लिए
आराधना के पात्र
उमर के अंतिम पड़ाव तक आते-आते
मन से खो जाए हर नुकीलापन
तो आत्मा का शिवलिंग
भीतर प्रकट हो ही जाता है !


