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सोमवार, मार्च 22

शिवलिंग और शालिग्राम

शिवलिंग और शालिग्राम 


सुडौल हैं दोनों 

नहीं है कोई नुकीलापन किसी भी कोने में 

कोना ही नहीं उनमें 

नदी के तल में रहते-रहते जब 

दो पत्थर आपस में टकराते हो जाते हैं चिकने 

खो जाता है हर खुरदुरापन 

तब बन जाते हैं वे छोटे-छोटे शिवलिंग 

बरसों तक साथ रहते जन भी 

जब नहीं चुभते एक दूसरे को 

नहीं कुरेदते एक-दूसरे की कमियों को 

खो जाता है अहम का नुकीलापन 

और झर जाती हैं कटंकों की बेल 

जो अपने इर्दगिर्द उगाई थी 

कभी आत्मसम्मान कभी पहचान के नाम पर 

तो वे भी बन जाते हैं सुडौल एक दूजे के लिए 

आराधना के पात्र 

उमर के अंतिम पड़ाव तक आते-आते 

मन से खो जाए हर नुकीलापन 

तो आत्मा का शिवलिंग 

भीतर प्रकट हो ही जाता है !

 

बुधवार, अप्रैल 29

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे 

जिस दिन लिखने को कुछ शेष न रहे 
कहने को कोई शब्द न मिले 
नत मस्तक हो जाना ही होगा 
उस अनाम के आगे 
जो परे है वाणी के 
मौन में वह स्वयं का पता दे रहा है 
हमसे हमारा ‘अहम’ ले रहा है 
जो निःशब्द में सहज ही मिलता है
शब्दों के अरण्य में खो जाता है 
जैसे खो जाती है सूर्य किरण घने वनों में 
जहां वृक्षों की शाखाएँ सटी हैं इस तरह 
कि सदियों से नहीं पहुँची सूर्य की कोई किरण 
नहीं छुआ वहां की माटी को अपने परस से 
जहाँ काई और नमी में डेरा बना लिया है 
कीट-पतंगों ने 
मन में शब्दों का जमघट ‘उसे’ आने नहीं देता 
जो सदा ही उजास बनकर आसपास है 
इस सन्नाटे में उसी से भरना होगा मन का कलश 
और छलक-छलक कर वही रिसेगा 
भर जायेगा कण-कण में तन के 
ऊर्जा की एक लहर बन कर समो लेगा जब 
यह सत्य तभी स्पष्ट होगा कि 
एक लहर के सिवा क्या हैं हम ....? 

गुरुवार, अप्रैल 28

खिले रहें उपवन के उपवन

खिले रहें उपवन के उपवन


रिमझिम वर्षा कू कू कोकिल
मंद पवन सुगंध से बोझिल,
हरे भरे लहराते पादप
फिर क्यों गम से जलता है दिल !

नजर नहीं आता यह आलम
या फिर चितवन ही धूमिल है,
मुस्काने की आदत खोयी
आँसू ही अपना हासिल है !

अहम् फेंकता कितने पासे
खुद ही उनमें उलझा-पुलझा,
कोशिश करता उठ आने की
बंधन स्वयं बाँधा न सुलझा !

बोला करे कोकिला निशदिन
हम तो अपना राग अलापें,
खिले रहें उपवन के उपवन
माथे पर त्योरियां चढ़ा लें !

आखिर हम भी तो कुछ जग में
ऐसे कैसे हार मान लें,
लाख खिलाये जीवन ठोकर
क्यों इसको करतार जान लें !