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सोमवार, मार्च 21

एक हँसी भीतर जागी थी

एक हँसी भीतर जागी थी 

 

नयन टिके हैं सूने पथ पर 

किसकी राह तके जाता मन,

खोल द्वार दरवाजे बैठा

किसकी आस किये जाता मन !

 

एक पाहुना आया था कल

एक हँसी भीतर जागी थी,

हुई लुप्त फिर घट सूना है

फिर से इक मन्नत माँगी थी !

 

हर आहट पर चिहुँक ताकता 

किसकी बाट जोहता हर पल,

किसकी याद सँजोये बैठा

किसकी चाह किये जाता मन !

 

मिला बहुत पर नहीं वह मिला

बन बसंत जो साथ सदा हो,

स्वप्न नहीं बहलाते, ढूढें  

शीतल सुरमय  मधुर राग हो  !

 

किसको यह आवाज लगाये

किसकी नजरों को तरसे मन, 

फीका जग का हर रस लगता 

किसकी प्यास भरे जाता मन !


गुरुवार, नवंबर 26

आहट

आहट

अनजाने रस्तों से

कोई आहट आती है

बुलाती है सहलाती सी लगती

कौतूहल से भर जाती है

जाने किस लोक से

भर जाती आलोक से

मुदित बन जाती है

सुधियाँ जगाती

कौन जाने है किसकी

आँख पर रहे ठिठकी

शायद कुछ राज खुले

स्वयं न बताती

फिजाओं में घुल जाती है

सुनी सी पर अजानी भी

भेद क्यों न खोलती

जाने क्या कहती वह

 क्या गीत गुनगुनाती है 

सोमवार, अगस्त 18

जैसे

जैसे


उतरा हो वसंत
मन उमग रहा
उसकी आहट है !

खिले पलाश मधु बरसा
पादप-पादप सुख से सरसा
गाती कोकिल भावों का उड़ा पराग
फिर भी न जाने कैसी अकुलाहट है !

चिर प्रतीक्षा थी जिसकी
पाहुन वह घर आया
पोर-पोर में धुन बजती
ज्यों अंतर कलिका खिलती
किसलय रक्तिम ज्यों नाच रहे
तितली दल खुशबू बांछ रहे
उर में उडती सी आस लिए
यह कैसी घबराहट है !

उर्वर मन का कोना-कोना
मौन कोख माटी की ज्यों हो
बीज प्रतीक्षा का था बोया
सिंचन करने मन था रोया
 आज खिले हैं जूही, चम्पा
भूल गयी काली रातें वे
बिसर गयीं घन बरसातें वे
फिर भी न जाने क्यों
शंकित सी बुलवाहट है !


मंगलवार, अप्रैल 30

वृद्धावस्था




वृद्धावस्था 

नहीं भाता अब शोर जहाँ का
अखबार बिना खोले पड़ा रह जाता है
टीवी खुला भी हो तो दर्शक
सो जाता है
गर्दन झुकाए किसी गहन निद्रा में
आकर्षित नहीं कर पाते मनपसंद पकवान भी
नहीं जगा पाते ललक भीतर
न ही भाता है निहारना आकाश को
कुछ घटता चला जाता है अंतर्मन पर
ऊर्जा चुक रही है
शिथिल हो रहे हैं अंग-प्रत्यंग
दर्द ने अब घर बना लिया है स्थायी...
झांकता ही रहता है किसी न किसी खिड़की से तन की
छड़ी सहचरी बनी है
कमजोरी से जंग तनी है
दवाएं ही अब मित्र नजर आती हैं
रह-रह कर बीती बातें यद आती हैं
जीवन की शाम गहराने लगी है
नीड़ छोड़ उड़ गए साथी की पुकार भी
अब बुलाने लगी है
रंग-ढंग जीवन के फीके नजर आते हैं
कोई भाव भी नजर नहीं आता सपाट चेहरे पर
कोई घटना, कोई वाकया नहीं जगाता अब खुशी की लहर
क्या इतनी बेरौनक होती है उसकी आहट
इतनी सूनी और उदास होती है
रब की बुलाहट
क्यों न जीते जी उससे नाता जोड़ें
आखिरी ख्वाब से पहले उसकी भाषा सीखें
मित्र बनाएँ उसे भी जीवन की तरह
तब उसका चेहरा इतना अनजाना नहीं लगेगा
उसका आना इतना बेगाना नहीं लगेगा !






सोमवार, फ़रवरी 4

गीत आज ही गाया है


गीत आज ही गाया है

पहले तो आहट भर थी
शायद अब वह आया है,
पहले बस तुतलाहट थी  
गीत आज ही गाया है !

सोए-सोए स्वप्न देखते
किसने उसको पाया है,
तम निद्रा से जो जागा
उसे ही केवल भाया है !

देख सकें, न पड़े दिखाई
जो सर्वत्र समाया है,
सुना नहीं जाता उसका स्वर
शून्य ही उसकी छाया है !

जीवन एक लहर सागर की
सागर सा गहराया है,
इस अनंत में सांत वही है
भेद अनोखा जाया है !