जो जीवन हँसता था जग में
कल डोल रहा था खुशियों में
अब गम की चादर ओढ़ी है,
हर सुख के पीछे दुःख आता
यह खूब बनायी जोड़ी है !
जब बादल से नभ ढक जाए
चन्दा सूरज भी घबराए,
फिर खिले चांदनी धूप उगे
तारामंडल भी मुस्काये !
जब जन्मा ढोल बजे घर में
फिर मातम इक दिन छाएगा,
जो जीवन हँसता था जग में
खामोश कहीं खो जायेगा !
जो दौड़ा फिरता था गतिमय
अब बेबस शैया पर लेटा,
यहाँ मौसम नित बदलते हैं
परिवर्तन ही सच जीवन का !
बस वही न बदले कभी यहाँ
देखा करता है जो जग को,
शून्य, पूर्ण, मौन, आनन्दमय
मन के भी पार एकरस वो !

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