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रविवार, नवंबर 13

जो जीवन हँसता था जग में

जो जीवन हँसता था जग में 

कल डोल रहा था खुशियों में 

अब गम की चादर ओढ़ी है,   

हर सुख के पीछे दुःख आता 

यह खूब बनायी जोड़ी है !


जब बादल से नभ ढक जाए 

चन्दा सूरज भी घबराए, 

फिर खिले चांदनी धूप उगे 

तारामंडल भी मुस्काये !


जब जन्मा ढोल बजे घर में 

फिर मातम इक दिन छाएगा, 

जो जीवन हँसता था जग में 

खामोश कहीं खो जायेगा !


जो दौड़ा फिरता था गतिमय 

अब बेबस शैया पर लेटा, 

यहाँ मौसम नित  बदलते हैं 

परिवर्तन ही सच जीवन का !


बस  वही  न बदले कभी यहाँ 

देखा करता है जो जग को, 

शून्य, पूर्ण, मौन, आनन्दमय

मन के भी पार एकरस वो !


सोमवार, अप्रैल 4

जो शून्य बना छाया जग में



जो शून्य बना छाया जग में 


जग जैसा है बस वैसा है 

निज मन को क्यों हम मलिन करें, 

जो पल-पल रूप बदलता हो 

उसे माया समझ नमन करें !

 

मन सौंप दिया जब प्रियतम को 

उन चरणों में ही झुका रहे,

फ़ुरसत है किसके पास यहाँ 

निज महिमा का ही हाथ गहें !

 

जो शून्य बना छाया जग में 

कण-कण में जिसकी आभा है, 

वह राम बना है कृष्ण वही 

उसका दामन ही थामा है !

 

जो जाग गया मन के भीतर 

वह  सिक्त सदा सुख सरिता में,

जग अपनी राह चला जाता 

वह ठहर गया इस ही पल में !


मंगलवार, मार्च 9

नीलगगन सी विस्तृत काया

नीलगगन सी विस्तृत काया 


एक शून्य है सबके भीतर

एक शून्य चहुँ ओर व्यापता, 

जाग गया जो भी पहले में 

दूजे में भी रहे जागता !


शून्य नहीं वह अंधकार मय 

ज्योतिर्मयी प्रभा से मंडित, 

पूर्ण सजग हो रहता योगी 

निज आभा में होकर प्रमुदित !


 उसी शून्य का नाम सुंदरम्

प्रेम-ज्ञान की जो मूरत है, 

परम अनादि-अनंत तत्व शिव 

अति मनहर धारे सूरत है !


रखता तीन गुणों को वश में  

मन अल्प, चंद्रमा लघु धारे, 

मेधा बहती गंगधार में 

भस्म काया पर, सर्प धारे !


नीलगगन सी विस्तृत काया 

व्यापक धरती-अंतरिक्ष में,  

शिव की महिमा शिव ही जाने 

शक्ति है अर्धांग  में जिसको !


 

मंगलवार, सितंबर 8

शब्दों के वह पार मिलेगा

 शब्दों के वह पार मिलेगा 

जब  खिलेगा भीतर मौन का पुष्प 

वहाँ न भावनाओं की डालियाँ होंगी 

न विचारों की भूमि !!

 

शब्दों की नाव तो बनानी ही होगी 

जो उतार देगी शून्य के तट पर !

 

शब्द ले जाते हैं खुद से दूर 

शब्द जगत हैं 

माया हैं !

 

सत्य की यदि चाह है 

तो उस आग से गुजरना होगा 

जहाँ जल जाता है सारा ज्ञान

उस सागर को पार करना होगा 

जहाँ दिखाई ही नहीं देता दूसरा तट

सूख जाता है हर सागर 

मौन के उतरते ही

बवंडर से गुजर भावों और विचारों के

उस शांति को करना होगा महसूस

जो मिटा देती है सबकुछ

पर जिसके बाद जन्म होता है 

एक नवीन सृष्टि का ! 


गुरुवार, अगस्त 27

आसमान निर्मल अविकारी

 आसमान निर्मल अविकारी 

 

अंबर, अधर, व्योम,  नीलाम्बर 

गगन, अनंत, अविचल, अकम्पन,

अरबों, खरबों नक्षत्रों  को

निज अवकाश किया है धारण ! 

 

शून्यवत न होता परिभाषित 

धरती को द्यौ व्याप रहा है, 

नित प्रकाश रंगों से सजता  

निज का  कोई रंग नहीं है !

 

एक विशाल चँदोवे जैसा 

तारों से मंडित यह अनुपम, 

एक तत्व है सूक्ष्म अनश्वर 

रचता है जिसे स्वयं ईश्वर !

 

सभी नाद अगास  में होते 

वायु संग आकाश मिले जब, 

भीतर तन के बाहर मन के 

ठहरे इसमें दोनों तन-मन !

 

कभी घने बादल ढक लेते 

जैसे मन को ढके कुहासा, 

आसमान निर्मल अविकारी 

 चमके तड़ित या हो गर्जना !

 


गुरुवार, फ़रवरी 8

शून्य और पूर्ण



शून्य और पूर्ण


 तज देता है पात शिशिर में पेड़
ठूंठ सा खड़ा होने की ताकत रखता है
 अर्पित करे निज आहुति
सृष्टि महायज्ञ में
नुकीली चुभन शीत की सहता है
भर जाता कोमल कोंपलों औ’ नव पल्लवों से
 बसंत में वही खिल उठता है
त्याग देता घरबार सन्यासी
स्वागत करने को हर द्वार आतुर होता है
पतझड़ के बाद ही आता है बसंत
समर्पण के बाद ही मिलता है अनंत
शून्य हो सका जो वह पूर्ण बनता है
हीरा ही वर्षों माटी में सनता है !


बुधवार, सितंबर 13

जाने कब वह घड़ी मिलेगी

जाने कब वह घड़ी मिलेगी 

 
तुमको ही तुमसे मिलना है 
खुला हुआ अविरल मन उपवन, 
जब जी चाहे चरण धरो तुम
सदा गूंजती मृदु धुन अर्चन ! 

न अधैर्य से कंपतीं श्वासें 
शुभ्र गगन से छाओ भीतर, 
दिनकर स्वर्ण रश्मि बन छूओ
कुसुमों की या खुशबू बनकर ! 

कभी न तुमको बिसराया है 
जगते-सोते याद तुम्हारी, 
उठती-गिरती पल में झलके 
मेघों में ज्यों द्युति चमकारी ! 

जाने कब वह घड़ी मिलेगी 
कब ढ़ुलकोगे अमी कलश से, 
टूटेंगी कब सीमाएं सब 
प्रकटोगे श्यामल झुरमुट से ! 

अब जो भी बाधा है पथ में
वह भी दूर तुम्हें करनी है 
सौंप दिया जब शून्य, शून्य में 
तुम्हें कालिमा भी हरनी है ! 

बुधवार, मार्च 22

ओ रे मन !


ओ रे मन !

किस उलझन में खोये रहते 
किस पीड़ा को पल-पल सहते,
सुनो गीत जो नभचर  गाते
निशदिन  मधुर राग बहता है !

किस शून्य को भरे हो भीतर 
कण-कण में अनहत बजता है,
सपनों ने दिन-रात जलाया 
खुली आंख ही वह मिलता है !

एक विशाल वितान सजाया  
रंगमंच पर नट अनेक हैं,
सुख-दुःख के झीने पर्दे में 
सदा एकरस कुछ रिसता  है !

पाँव रुके उर की जड़ता से 
चाह अधीर करे धड़कन को,
दोनों ही के पार गया जो 
हरसिंगार चुना करता है !


गुरुवार, नवंबर 26

झर सकता है वही निरंतर

 झर सकता है वही निरंतर

यह कैसी खलिश..यह हलचल सी क्यों है
जो लौटा घर.. उर चंचल सा क्यों है

बादल ज्यों बोझिल हो जल से
पुष्प हुआ नत निज सौरभ से,
बंटने को दोनों आतुर हैं
ऐसी ही नजरें कातर हैं !

प्रेम सुधा का नीर बहाएँ  
सुरभि सुवासित बन कर जाएँ,
कृत्य किसी की पीड़ा हर लें  
वही तृप्त अंतर कर जाएँ !

चलते-चलते कदम थमे थे
पल भर ही पाया विश्राम,
पंख लगे पुनः पैरों में
यह चलना कितना अभिराम !

भर ही डाली झोली उसने
इतना भार सम्भालें कैसे,
रिक्त लुटाकर ही करना है
पुष्प और बदली के जैसे !

दे ही डालें सब कुछ अपना
फिर भी पूर्ण रहेगा अंतर,
शून्य हुआ जो अपने भीतर
झर सकता है वही निरंतर !

कैसी अद्भुत बेला आई
भीतर नयी कसक जागी है,
शीतल अग्नि कोमल पाहन
जैसे बिन ममता रागी है ! 

सोमवार, फ़रवरी 4

गीत आज ही गाया है


गीत आज ही गाया है

पहले तो आहट भर थी
शायद अब वह आया है,
पहले बस तुतलाहट थी  
गीत आज ही गाया है !

सोए-सोए स्वप्न देखते
किसने उसको पाया है,
तम निद्रा से जो जागा
उसे ही केवल भाया है !

देख सकें, न पड़े दिखाई
जो सर्वत्र समाया है,
सुना नहीं जाता उसका स्वर
शून्य ही उसकी छाया है !

जीवन एक लहर सागर की
सागर सा गहराया है,
इस अनंत में सांत वही है
भेद अनोखा जाया है !